जानिये द्रौपदी के पुत्रों की हत्या सोते समय क्यों की गयी थी?

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महाभारत में द्रौपदी के पुत्रों का सोते हुए, निहत्थी हालत में अश्वत्थामा के द्वारा वध किया गया था जो कि गुरु द्रोणाचार्य का पुत्र था। पांडव युधिष्ठिर ने गुरु द्रोणाचार्य के पूछे जाने पर कि ‘क्या अश्वत्थामा मारा गया?’ उन्होंने धीमे स्वर में हां कह दिया था, जिसके उपरांत ही गुरु द्रोणाचार्य ने अपने शस्त्रों का त्याग कर दिया था और अर्जुन ने अपने बाणों से उनका वध कर दिया था। इसी प्रतिशोध में अश्वत्थामा ने द्रौपदी के पुत्रों का सोते हुए वध कर दिया।

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ऋषि विश्वामित्र द्वारा राजा हरिश्चंद्र से यज्ञ करने की याचना करना

एक बार मुनि विश्वामित्र ने राजा हरिश्चंद्र को विचलित करने की सोची। उन्होंने ऐसा राजा हरिश्चंद्र के राजगुरु मुनि वशिष्ठ के साथ चली आ रही अपनी वर्षों पुरानी वैमनस्यता के कारण किया था। वह राजा हरिश्चंद्र की सत्यता और ईमानदारी के लिए प्रसिद्ध छवि को कसौटी पर परखना चाहते थे। जिस कारण ऋषि विश्वामित्र राजा हरिश्चंद्र के पास पहुंचे और उन्हें एक यज्ञ करने की प्रार्थना की। राजा हरिश्चंद्र इसके लिए राजी हो गए।

ऋषि विश्वामित्र द्वारा राजा हरिश्चंद्र से दक्षिणा की मांग करना

विश्वामित्र ने राजा से कहा कि वह यह मान ले कि यज्ञ हो चुका है जिसे विश्वामित्र ने पूरा करने में उनकी सहायता की है। अतः अब वह उन्हें उनकी गुरु दक्षिणा प्रदान करें। राजा हरिश्चंद्र ने मुस्कुराते हुए विश्वामित्र को कहा कि वह यज्ञ में हुए खर्चे को तथा विश्वामित्र की दक्षिणा को उन्हें चुकाने के लिए पूर्ण रूप से तैयार है। इस पर विश्वामित्र ने कहा कि दक्षिणा वह होती है जो गुरु मांगे और स्वीकार कर सके। चूंकि राजा हरिश्चंद्र ने उन्हें दक्षिणा देने का वादा किया है तो इसलिए वे उनसे पूरा उनका राज्य मांगते हैं जिसमें उनकी पत्नी संध्या और उनके पुत्र रोहिताश्व भी शामिल है। विश्वामित्र ने स्पष्ट किया कि यह सभी दक्षिणा का भाग है। इससे राजा हरिश्चंद्र विचलित हो गए पर वह मुनि को वचन दे चुके थे इसलिए उन्होंने अपना पूरा राज्य मुनि को सौंप दिया। लेकिन मुनि की दक्षिणा चुकाने के लिए उनके पास अब कुछ नहीं बचा था इसलिए वह मुनि के कर्जदार हो गए। ऋषि विश्वामित्र ने राजा हरिश्चंद्र को उनका राज्य छोड़कर चले जाने को कहा जिसमें कि वाराणसी का वह घाट भी शामिल था जिस पर भगवान शिव का मंदिर का। मुनि बार-बार राजा के सामने उपस्थित होकर उनसे अपना दक्षिणा का बचा हुआ भाग मांगने लगे।

ऋषि विश्वामित्र द्वारा सातों लोकपालों को श्राप देना

दक्षिणा को भाग भाग में चुकाते चुकाते राजा हरिश्चंद्र बुरी तरह से आहत हो चुके थे। इस पर सातों लोकों के लोकपाल ने उपस्थित होकर मुनि विश्वामित्र को ऐसा ना करने के लिए कहा। इससे क्रोधित होकर विश्वामित्र ने उन सातों लोकपालों को श्राप दिया कि वह मानव के रूप में जन्म लेंगे। सातों लोकपाल बुरी तरह से घबरा गए और वह मुनि से अपने शाप के विमोचन का उपाय पूछने लगे। इससे मुनि का क्रोध कुछ शांत हुआ और उन्होंने उन्हें बताया कि लोकपालों को जन्म के उपरांत संसार के सांसारिक भोगों को भोगना नहीं होगा। जैसे ही उनका का जन्म होगा उसके कुछ ही समय के उपरांत सोती हुई अवस्था में ही उनकी मृत्यु हो जाएगी।

लोकपालों का द्रौपदी के पुत्रों के रूप में जन्म लेना

विश्वामित्र के इसी श्राप के कारण द्रौपदी के सातों पुत्रों की सोती हुई अवस्था में हत्या की गई क्योंकि द्रौपदी के वह सातों पुत्र सात लोकपाल थे, जो विश्वामित्र के श्राप के कारण मानव के रूप में धरती पर पैदा हुए थे। इन का वध अश्वत्थामा के द्वारा किया गया था जो कि गुरु द्रोणाचार्य का पुत्र था। अश्वत्थामा युधिष्ठिर का वध करना चाहता था क्योंकि युधिष्ठिर ने उसके पिता गुरु द्रोणाचार्य के पूछे जाने पर कि क्या अश्वत्थामा का वध हो गया है उन्होंने धीमे स्वर में हां कह दिया था, जिसके उपरांत ही गुरु द्रोणाचार्य ने अपने शस्त्रों का त्याग कर दिया था और अर्जुन ने अपने बाणों से उनका वध कर दिया था।

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