Home धर्म और आस्था जानिए क्यों हिन्दू शास्त्रों द्वारा ब्राह्मणों को मदिरापान करना मना है

जानिए क्यों हिन्दू शास्त्रों द्वारा ब्राह्मणों को मदिरापान करना मना है

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देवताओं और असुरों के बीच भयंकर युद्ध को देख कच्छ का स्वेच्छा से आगे कदम बढ़ाना

कच्छ, बृहस्पति देव जो सभी देवताओं के गुरु थे, के सबसे बड़े पुत्र थे। यह दिखने में बेहद ही खूबसूरत थे‌। कच्छ, उस समय युवा बालक की अवस्था में थे जब देवताओं और असुरों के बीच भयंकर युद्ध हुआ। देवताओं ने शिकायत की, कि असुर गुरु शुक्र देव असुरों को हर तरह से बचाने के बेहतर प्रयास कर रहे हैं। शुक्र देव को भगवान शिव के महामृत्युंजय मंत्र की जानकारी थी, जिसका इस्तेमाल करके वह मरे हुए असुरों में वापस जीवन ला रहे थे। देवता भी इस मंत्र को सीखना चाहते थे, कच्छ ने देवताओं की मदद करने के लिए स्वेच्छा से आगे कदम बढ़ाया।

कच्छ और देवयानी की दोस्ती

कच्छ, खुद से शुक्रदेव के पास गए और उनका छात्र बनने की इच्छा जताई। शुक्र देव ने भी सहर्ष उनकी इच्छा स्वीकार कर ली और उन्हें पढ़ाना शुरू कर दिया। शुक्रदेव की एक बहुत प्यारी पुत्री थी, जिनका नाम था देवयानी। देवयानी और कच्छ लगभग एक ही उम्र के थे, इसलिए बहुत जल्दी अच्छे दोस्त बन गए। असुरों ने इस दोस्ती पर संदेह हुआ, उनको लगा कच्छ का वास्तविक उद्देश्य केवल ज्ञान प्राप्त करना नहीं अपितु शुक्र देव द्वारा महामृत्युंजय मंत्र को सीखना है। इसलिए जब कच्छ, शुक्रदेव के घर के मवेशियों को चराने जंगल में गए, तो उन्होंने कच्छ को मार दिया और शुक्रदेव से कहा कि उसे भेड़िया खा गया।

शुक्रदेव द्वारा कच्छ को बार बार जीवन दान देना

जब काफी समय बीत जाने के बाद भी कच्छ नहीं लौटे, तो देवयानी रोने लगी। अपनी प्रिय पुत्री को इस तरह रोते देखकर शुक्रदेव ने उनसे कारण पूछा और कारण जानने के बाद कच्छ को वापस लाने के लिए महामृत्युंजय का जाप किया। कच्छ, भेड़िए के पेट को चीरकर जीवन जीने के लिए वापस आ गए। असुर यह सब देख कर बहुत दुखी हुए साथ ही उन्हें बहुत क्रोध भी आया। इसलिए जब अगले दिन कच्छ नदी में स्नान करने गए तो असुरों ने उनको वही मार डाला और उनकी राख को समुद्र में मिला दिया। फिर से वही सब हुआ, अर्थात देवयानी रोने लगी और अपनी प्यारी पुत्री को खुश करने के लिए शुक्र देव ने मंत्रोच्चारण कर के कच्छ को जीवन दिया, इस बात से असुरों के क्रोध की सीमा न रही।

कच्छ एवं देवयानी द्वारा एक दूसरे को दिया गया श्राप

इसलिए अगली बार जब असुरों ने कच्छ को पकड़ा तो उसे मार डाला और एक मादक में उसकी राख को मिलाकर अपने ही शिक्षक शुक्रदेव को दिला दिया। शुक्रदेव इस बात से अनजान थे कि उस मादक में कच्छ की राख मिली हुई है, पी ली। अब जब देवयानी कच्छ को ना पाकर रोने लगी और शुक्रदेव ने महामृत्युंजय मंत्र का जाप किया तो शुक्र देव को एहसास हो गया कि कच्छ उनके पेट में हैं। यदि कच्छ बाहर आऐ तो वह मर जाएंगे। यह जानकर कि शुक्र देव की मृत्यु निश्चित है, उन्होंने कच्छ को महामृत्युंजय मंत्र अपने पेट के भीतर ही सिखाया, इसके बाद उन्होंने महामृत्युंजय का जाप करके कच्छ को जीवनदान दिया और कच्छ ने बाहर आकर महामृत्युंजय मंत्र का सही उच्चारण करके अपने गुरु अर्थात शुक्रदेव को वापस जीवित किया। इतना सब हो जाने के बाद कच्छ ने अपने गुरु से कहा कि अब वह वापस जाना चाहते हैं। इस समय देवयानी ने कहा कि वह उनसे प्रेम करती हैं और उनसे शादी करना चाहतीं हैं। परंतु कच्छ ने मना कर दिया उन्होंने कहा क्योंकि वह शुक्र देव के पेट से बाहर आए हैं और इस तरह उनके पुत्र समान हुए और देवयानी उनके लिए एक बहन की तरह हुईं। यह सुनकर देवयानी को बहुत क्रोध आया और उन्होंने को शाप दे दिया कि जो मंत्र उन्होंने सीखा है वह कभी प्रभावी नहीं होगा। कच्छ ने भी देवयानी को श्राप दिया कि वह कभी किसी देवता के पुत्र से विवाह नहीं कर सकेगी।

शुक्रदेव का ब्राह्मणों को मदिरापान मना करना

कच्छ खुशी-खुशी वापस आ गए और जो मंत्र उन्होंने शुक्रदेव से सीखा था, वह दूसरे देवताओं को सिखा दिया। इसके बाद देवयानी का विवाह ययाति नामक एक राजा से हो गया। यह सारी मुश्किलें शुक्रदेव के शराब पीने के कारण हुई थी, इसीलिए उन्होंने सभी ब्राह्मणों को शराब पीने से मना कर दिया।

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