क्या होता है कोलेस्ट्रॉल और हमें इसकी क्या ज़रुरत है?

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High cholesterol is bad for health

कोलेस्ट्रॉल (Cholesterol) के बारे में ज़्यादातर नकारात्मक बातें ही सुनी या पढ़ी होंगी आपने. आपको ये जान कर ताज्जुब होगा कि हमारे जीवन के सुचारू रूप से चलने के लिए कोलेस्ट्रॉल का विशेष महत्त्व है. यदि कोलेस्ट्रॉल न हो तो शरीर के कई बेहद ज़रूरी कार्य रुक जायेंगे.

आखिर क्या है कोलेस्ट्रॉल?

कोलेस्ट्रॉल शरीर के अन्दर लिवर द्वारा बनाया जाने वाला एक वसा-युक्त पदार्थ है जो इंसानी जीवन के लिए ज़रूरी है. हम इसको भोजन द्वारा भी प्राप्त कर सकते हैं. पर यह समाहना ज़रूरी है कि पौधों द्वारा प्राप्त भोजन में कोलेस्ट्रॉल नहीं होता. मांस मछली खाने से, दूध और घी का सेवन करने से कोलेस्ट्रॉल की सीधे सीधे प्राप्ति हो सकती है.

कोलेस्ट्रॉल के कार्य क्या हैं?

हमारे शरीर में कोलेस्ट्रॉल के मुख्य रूप से तीन कार्य हैं.

(1) शरीर के अन्दर ऊतक (कोशिकाओं का एक निश्चित समूह) बनाने में. कई ऊतकों से मिलकर एक अंग बनता है, जैसे कि पेट, आँख, पित्ताशय, ह्रदय इत्यादि.

(2) सेक्स हॉर्मोन को बनाने में

(3) लिवर के अन्दर पित्त बनाने में

ज़्यादातर लोगों को मालुम नहीं होता कि विटामिन A, D, E, K शरीर में तभी काम में आ सकते हैं जब वो वसा (फैट) में घुलें. यदि आहार में वसा की मात्रा या शरीर में कोलेस्ट्रॉल की मात्रा बिलकुल नहीं होगी तो इन विटामिन की कमी हो सकती है.

एल डी एल (LDL) और एच डी एल (HDL) क्या है?

कोलेस्ट्रॉल के बारें में बात होती है तो लोग HDL और LDL का नाम लेते हैं. ये दोनों ही वस्तुतः लिपोप्रोटीन हैं (वसा और प्रोटीन से मिश्रित पदार्थ). कोलेस्ट्रॉल (वसा-युक्त पदार्थ) को रक्त में एक स्थान से दुसरे स्थान तक जाने के लिए लिपोप्रोटीन को वाहन के रूप में इस्तेमाल करना पड़ता है.

एच डी एल (HDL): इसका अर्थ है ‘हाई-डेंसिटी लिपोप्रोटीन’. इसको अच्छा कोलेस्ट्रॉल भी कहते हैं (जबकि यह कोलेस्ट्रॉल नहीं है बल्कि उसका वाहन है). ऐसा इसलिए क्योंकि ये कोलेस्ट्रॉल को रक्त से लिवर में ले जाता है. लिवर कोलेस्ट्रॉल को ख़त्म कर देता है (हानि-रहित, छोटे पदार्थों में तोड़ कर) और इस प्रक्रिया से शरीर पर अधिक कोलेस्ट्रॉल का दुष्प्रभाव नहीं पड़ता.

एल डी एल (LDL): इसका अर्थ है ‘लो-डेंसिटी लिपोप्रोटीन’. इसको बुरा कोलेस्ट्रॉल भी कहते हैं (जबकि यह कोलेस्ट्रॉल नहीं है बल्कि उसका वाहन है). ऐसा इसलिए क्योंकि इसकी अधिक मात्रा होने से यह कोलेस्ट्रॉल के साथ मिलकर ‘प्लाक’ बनता है, जो रक्त की नलियों के अन्दर जम जाता है. इससे नलियों में सिकुडन आ जाती है और रक्त को बहने में मुश्किल होने लगती है. जब ह्रदय को रक्त पहुँचाने वाली नलियाँ प्रभावित होती हैं तो हार्ट अटैक हो सकता है.

प्लाक दो तरह से शरीर को नुक्सान पहुंचा सकता है:

(1) खून की नलियों को संकरा कर देना. इससे ऑक्सीजन से भरपूर रक्त अंगों तक ठीक से नहीं पहुँच पता जिससे अंग-प्रत्यंग पर दुष्प्रभाव पड़ने लगता है.

(2) इसकी वजह से खून की नलियों में थक्के बन सकते हैं. जब ये थक्के अपनी जगह से हट कर नली में बहते बहते किसी संकरी जगह पर पहुँच कर नाली को अवरुद्ध कर देते हैं तो उस अंग पर प्रभाव पड़ता है. अगर ह्रदय की नली को अवरुद्ध किया तो हार्ट अटैक, अगर दिमाग की नली को अवरुद्ध किया तो ब्रेन स्ट्रोक हो सकता है.

एच डी एल (HDL) को अच्छा क्यों मानते हैं?

इसको अच्छा इसलिए मानते हैं क्योंकि ये कोलेस्ट्रॉल को लिवर के अन्दर ले जाता है, जहां ये हानिकारक कोलेस्ट्रॉल छोटे छोटे पदार्थों (हानि-रहित) में तोड़ दिया जाता है और शरीर से बाहर कर दिया जाता है.  एच डी एल की अधिक मात्रा कोलेस्ट्रॉल  की अधिकता से होने वाले दुष्परिणामों को कम करती है, जैसे हार्ट अटैक और स्ट्रोक की सम्भावना कम होती है. यदि एच डी एल की मात्रा कम है तो इन बीमारियों की सम्भावना बढ़ जाती है.

नेशनल इंस्टिट्यूट ऑफ़ हेल्थ के अनुसार, एच डी एल (HDL) की मात्रा 60 मिलीग्राम/डेसीलिटर या और अधिक होना अच्छा माना जाता है. जबकि यदि इसकी मात्रा 40 मिलीग्राम/डेसीलिटर से कम हो तो ह्रदय रोग की सम्भावना बढ़ जाती है.

HDL is good cholesterol and LDL is bad cholesterol

वी एल डी एल (VLDL) क्या है?

एल डी एल के समान ही यह भी एक हानिकारक लिपोप्रोटीन है जो हानिकारक कोलेस्ट्रॉल से मिलकर प्लाक बनता है और खून की नालियों को संकरा बनता है.

टोटल कोलेस्ट्रॉल कितना होना चाहिए?

आदर्श रूप से टोटल कोलेस्ट्रॉल की मात्रा 200 मिलीग्राम/डेसीलिटर से कम होनी चाहिए. 200-239 के बीच इसको बॉर्डर-लाइन मानते हैं, और 240 के ऊपर इसको अधिक माना जाता है.

‘ट्रायग्लीसराइड’ क्या है?

कोलेस्ट्रॉल की ही तरह शरीर के अंदर रक्त में एक और वसा-युक्त पदार्थ होता है जिसे ‘ट्रायग्लीसराइड’ (TRIGLYCERIDE) कहते हैं. कोलेस्ट्रॉल की ही तरह इसकी अधिक  मात्रा शरीर के लिए हानिकारक होती है.

अधिक कोलेस्ट्रॉल से बचाव कैसे करें?

कोलेस्ट्रॉल और ट्रायग्लीसराइड की मात्रा नियंत्रित रखने के लिए नियमित रूप से व्यायाम करना चाहिए, संतुलित आहार लेना चाहिए और वजन बढ़ने नहीं देना चाहिए. आनुवंशिकी (जेनेटिक्स) भी कोलेस्ट्रॉल की मात्रा के बढ़ने में अपना रोल निभा सकती है. आहार में मीठे, जंक फ़ूड और वसा का इस्तेमाल कम करना चाहिए. समय समय पर (यदि आप में कोलेस्ट्रॉल के बढ़ने के आसार हैं तो) खून की जांच करा कर कोलेस्ट्रॉल की मात्रा चेक करते रहे. डॉक्टर के संपर्क में रहे. यदि ज़रूरत होगी तो डॉक्टर आपको कोलेस्ट्रॉल कम करने की दावा भी दे सकते हैं. मानसिक तनाव से दूर रहे. सिगरेट, शराब इत्यादि मादक पदार्थों का सेवन न करें.

शरीर का कोलेस्ट्रॉल नियंत्रित रखने के लिए 2015-2020 डाइट गाइडलाइन्स फॉर अमेरिकन्स ने ये पैमाने स्थापित कर रखे हैं:

कोलेस्ट्रॉल: आहार में जितना कम खाएं उतना अच्छा.

सैचुरेटेड फैट: जितनी कैलोरी ले रहे हैं उसका 10% से कम ही सैचुरेटेड फैट के रूप में लें. ये ज़्यादातर मांस, दूध और दूध से बने खाद्य में पाया जाता है.

अनसैचुरेटेड फैट:  जितना हो सके तो सैचुरेटेड फैट की बजाय अनसैचुरेटेड फैट लें. स्वास्थ्य-वर्धक, प्राकृतिक अनसैचुरेटेड फैट अधिक मात्रा में भी लिया जा सकता है. ये ज़्यादातर सोयाबीन ऑयल, कॉर्न ऑयल, फ्लैक्स ऑयल, मछली, पीनट आयल, सीसेम (तिल) आयल, केनोला आयल और सनफ्लावर ऑयल में पाया जाता है.

ट्रांस-फैट: जहां तक हो सके इसका सेवन न करें. ट्रांस फैट एक प्रकार का असंतृप्त वसा अम्ल है जो धीमें जहर के सामान है, और हृदय और गुर्दा समेत शरीर के कई अंगों को प्रभावित कर मौत का कारण बनता है. यह रिफाइंड खाद्य तेल से बनाया जाता है. ट्रांस फैट को तरल वनस्पति तेल में हाइड्रोजन गैस मिलाकर तैयार किया जाता है. ऐसा करने से उसे और भी ठोस बनाया जा सकता है और खाद्य पदार्थ की शेल्फ लाइफ बढ़ाई जा सकती है. ट्रांस फैट मुख्य रूप से वनस्पति तेल, कृत्रिम मक्खन और बेकरी के खाद्य पदार्थो में पाया जाता है.

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