जानिये महाभारत के महारथी अश्वत्थामा के जीवन के अनकहे तथ्य

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अश्वत्थामा गुरु द्रोण के पुत्र और ऋषि भारद्वाज के पौत्र थे। इतिहास के अनुसार अश्वत्थामा एक महारथी थे, जिन्होंने कुरुक्षेत्र के युद्ध में पांडवों के खिलाफ कौरवों के पक्ष से युद्ध लड़ा था। भगवान श्री कृष्ण के श्राप के कारण यह चिरंजीवी (अमर) बन गए, क्योंकि इन्होंने ब्रह्मास्त्र को उत्तरा (अभिमन्यु की पत्नी) के गर्भ में साध कर, उनकी अजन्मी संतान की हत्या करने का प्रयास किया था, जिसे श्रीकृष्ण ने बाद में बचा लिया था। उनके पिता गुरु द्रोण को इनकी मृत्यु की झूठी अफवाह फैला कर मारा गया था। जिस समय इनके पिता अपने पुत्र की मृत्यु की खबर सुनकर उसकी स्मृति में थे, तभी उनकी हत्या कर दी गई थी। अश्वत्थामा को कुरुक्षेत्र युद्ध में कौरवों के अंतिम सेनापति के रूप में नियुक्त किया गया था। बदले और रोष के कारण इन्होंने पांडव शिविर के अधिकांश लोगों की रात्रि में सोते समय निर्मम हत्या कर दी थी। अश्वत्थामा ने हस्तिनापुर के शासकों के अधीनस्थ उत्तरी पंचाल पर शासन किया। वह महाभारत युद्ध के योद्धाओं में से एक थे, जिन्होंने आचरण की सभी सीमाओं का उल्लंघन किया यहां तक कि उन्होंने दिव्यास्त्र का भी दुरुपयोग किया था।

अश्वत्थामा की व्युत्पत्ति

महाभारत के अनुसार अश्वत्थामा का अर्थ है “वह पवित्र आवाज़, जो एक घोड़े से संबंधित है।” यह इसलिए कहा जाता है, क्योंकि जब वह पैदा हुए थे तो वह घोड़े की तरह रोए थे।

जन्म तथा युद्ध से पहले अश्वत्थामा का जीवन

अश्वत्थामा के पिता का नाम द्रोणाचार्य तथा माता का नाम कृपि था। इनके पिता द्रोणाचार्य ने भगवान शिव को प्रसन्न करने हेतु बहुत सालों तक घोर तपस्या की थी। वह भगवान शिव से एक ऐसे पुत्र का आशीर्वाद पाना चाहते थे जो भगवान शिव के ही समान शूरवीर हो। भगवान शिव चिरंजीव थे। अश्वत्थामा अपने माथे पर एक मणि के साथ पैदा हुए जो उन्हें मनुष्यों से कम सभी जीवित प्राणियों पर शक्ति देती थी। यह मणि अश्वत्थामा को भूख, प्यास और थकान से बचाती थी। युद्ध के विशेषज्ञ, गुरु द्रोणाचार्य सादा जीवन जीते थे और बहुत ही थोड़े धन और संपत्ति के साथ अपने जीवन निर्वाह करते थे जिसके कारण अश्वत्थामा का बचपन मुश्किलों से भरा रहा। कई बार उनका परिवार उन्हें पीने के लिए दूध तक ना दे सका। अपने परिवार के लिए एक बेहतर भविष्य की कामना लिए गुरु द्रोण अपने पूर्व सहपाठी और मित्र द्रुपद की सहायता लेने के लिए पांचाल साम्राज्य गए। हालांकि द्रुपद ने वहां गुरु द्रोण की मित्रता का उपहास बनाते हुए उनकी मित्रता के दावे को ठुकरा दिया और उन्हें भिखारी कहकर अपमानित भी किया। इस घटना के बाद, और द्रोण की ऐसी दशा देखकर, कृपाचार्य ने गुरु द्रोण को हस्तिनापुर आने का आमंत्रण दिया। यहां आकर गुरु द्रोणाचार्य पांडवों और कौरवों के गुरु बन गए। अश्वत्थामा भी कौरवों और पांडवों के साथ युद्ध कला में प्रशिक्षण लेने लगे।

कुरुक्षेत्र के युद्ध में अश्वत्थामा की भूमिका

हस्तिनापुर राजा धृतराष्ट्र के द्वारा शासित था और द्रोणाचार्य ने कुरु राजकुमारों को शिक्षा देने का कार्य किया था। इसी कारण द्रोणाचार्य और अश्वत्थामा दोनों ही हस्तिनापुर के लिए निष्ठावान रहे और कुरुक्षेत्र के युद्ध में कौरवों की तरफ से पांडवों के विरुद्ध भाग लिया। द्रोणाचार्य की मृत्यु से पहले, अश्वत्थामा, जीत के उद्देश्य से, अपने पिता का आशीर्वाद लेने के लिए उनके पास जाते है, परंतु उनके पिता उन्हें आशीर्वाद देने से मना कर देते हैं। गुरु द्रोण, अश्वत्थामा को सलाह देते हैं कि वह अपनी ताकत के जरिए युद्ध जीते ना कि आशीर्वाद के जरिए। युद्ध के 14 दिन वह राक्षसों के एक प्रभाग को और अंजनापर्वन (घटोत्कच के पुत्र) को मार देते हैं। वह कई बार जयद्रथ तक अर्जुन को पहुंचने से रोकने के लिए, अर्जुन के विरोध में खड़ा हुए, लेकिन अंततः वह अर्जुन से हार जाते हैं।

पांडवों द्वारा गुरु द्रोण का वध

महाभारत के युद्ध के 10 वें दिन, जब भीष्म पितामह रणभूमि में गिर जाते हैं, तब गुरु द्रोण को कौरवों की सेना का सेनापति घोषित किया जाता है। इसके पश्चात अश्वत्थामा, दुर्योधन से वादा करते हैं कि वह युधिष्ठिर को पकड़ लेंगे, परंतु अनेक प्रयास करने के उपरांत भी वह ऐसा करने में असफल रहते है, जिससे नाराज होकर दुर्योधन, अश्वत्थामा का बहुत अपमान करता है। जिससे रुष्ट होकर अश्वत्थामा और दुर्योधन के बीच विवाद हो जाता है। श्री कृष्ण यह बात अच्छे से जानते थे कि सशस्त्र गुरु द्रोण को हराना संभव नहीं, इसीलिए उन्होंने युधिष्ठिर और अन्य पांडवों को सुझाव दिया कि यदि युद्ध के मैदान पर यह घोषणा कर दी जाए, कि अश्वत्थामा मारा गया तो वह दुखी हो जाएंगे और इस अवसर का लाभ उठाकर उन्हें हराया जा सकता है। भीम से अश्वत्थामा नामक एक हाथी को मारने की योजना बनाई और युधिष्ठिर द्वारा घोषणा करवाई कि अश्वत्थामा मारा गया। अंततः योजना ने कार्य कर दिया और धृष्टद्युन्म ने दुखी द्रोणाचार्य का मस्तक काट दिया।

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अश्वत्थामा द्वारा नारायणास्त्र का कुटिल प्रयोग 

भ्रामक तरीके से अपने पिता के वध के बाद अश्वत्थामा क्रोध और बदले की भावना से भर जाता है। इसके कारण वह पांडवों के विरुद्ध नारायणास्त्र नामक ब्रह्मास्त्र का आवाहन करता है। जब इस अस्त्र का आवाहन किया जा रहा होता है तो भयंकर हवाऐं चलना शुरू हो जाती हैं, गड़गड़ाहट की आवाज होने लगती है, और पांडवों के हर सैनिकों के लिए एक तीर उनकी ओर आता दिखाई देने लगता है। यह दृश्य देखकर पांडवों की सेना भयभीत हो जाती है। परंतु श्रीकृष्ण के निर्देश पर सभी सैनिक अपने अपने रथों को छोड़कर अपने हथियारों को भी नीचे रख देते हैं और ब्रह्मास्त्र के सामने आत्मसमर्पण कर देते हैं। भगवान कृष्ण खुद नारायण के अवतार थे, इसलिए वह इस हथियार के बारे में जानते थे कि यह ब्रह्मास्त्र हथियार उठाए हुए व्यक्ति को ही अपना निशाना बनाता है, जबकि निहत्थे इंसान पर यह कोई नुकसान नहीं पहुंचाता। इसके बाद जीत के लिए उत्सुक दुर्योधन, अश्वत्थामा से पुनः इस ब्रह्मास्त्र का उपयोग करने के का आग्रह करता है परंतु अश्वत्थामा दुखी होकर उसे बताता है कि यदि इस ब्रह्मास्त्र का उपयोग पुनः किया तो वह अपने उपयोगकर्ता के ऊपर ही प्रहार कर देगा। चतुर धार संकलन के अनुसार, नारायणास्त्र पूरी तरह से पाण्डव सेना में से एक अक्षौहिणी नष्ट कर देता है। नारायणास्त्र के उपयोग के बाद दोनों सेनाओं के बीच भयानक युद्ध होता है। अश्वत्थामा ने धृष्टद्युम्न को सीधे युद्ध में हरा दिया, लेकिन उसे मारने में असफल रहता है क्योंकि चौकी सत्यकी और भीम, धृष्टद्युम्न की रक्षा कर रहे होते हैं। युद्ध जारी रहता है और अश्वत्थामा महिष्मति के राजा नीला को मारने में सफल हो जाता है।

अश्वत्थामा का कौरव सेना का सेनापति बनना

दुशासन की भयानक मृत्यु के बाद अश्वत्थामा ने हस्तिनापुर के कल्याण को ध्यान में रखते हुए दुर्योधन को पांडवों के साथ शांति बनाने का सुझाव दिया। बाद में दुर्योधन भीम द्वारा बुरी तरह से पकड़ लिया जाता है और मृत्यु को प्राप्त होता है। जिसके उपरांत कौरवों के पक्ष में केवल तीन ही लोग बचतें हैं – अश्वत्थामा, कृपा और कृतवर्मा। अश्वत्थामा दुर्योधन की मृत्यु का बदला लेने की शपथ लेता है और दुर्योधन मरने से पूर्व उसे सेनापति के रूप में नियुक्त करता है।

पांडव शिविर में रात के समय छलपूर्वक हमला

कृपा और कृतवर्मा के साथ अश्वत्थामा रात के समय पांडवों के शिविर पर हमला करने की योजना बनाता है। अश्वत्थामा सबसे पहले पांडवों की सेना के सेनापति और अपने पिता के हत्यारे धृष्टद्युम्न को जगाता है और फिर आधी जागृत अवस्था में ही धृष्टद्युम्न का गला घोंटकर उसकी हत्या कर देता है। इसके बाद अश्वत्थामा शिखंडी सहित युधामन्यु, उत्तमौजो और पांडव सेना के अन्य कई प्रमुख योद्धाओं को कसाई की भांति अपनी तलवार से सोती अवस्था में ही हत्या कर देता है। इतना ही नहीं वह द्रौपदी के बच्चों को भी नींद में ही मार देता है। जब कुछ सैनिक कोशिश करते हैं और लड़ते हैं, तो अश्वत्थामा अपने 11 रूद्र में से एक को सक्रिय कर देता है।अश्वत्थामा के इस प्रकोप से भागने की कोशिश करने वालों को शिविर के प्रवेश द्वार पर खड़े कृपा और कृतवर्मा मार देते हैं। वध करने के बाद यह तीनों दुर्योधन को खोजने के लिए निकलते हैं और घोषणा करते हैं कि पांडवों का तो कोई पुत्र ही नहीं बचा। यह सुनकर दुर्योधन बहुत संतुष्ट महसूस करता है और कहता है कि अश्वत्थामा ने वह कर दिया जो भीष्म पितामह, द्रोणाचार्य और कर्ण नहीं कर सके। इतना कहकर दुर्योधन अंतिम सांस लेता है। शोक मनाते हुए, कौरव सेना के यह तीन सदस्य उसका दाह संस्कार करते हैं।

अश्वत्थामा से भगवान् कृष्ण और पांडवों का प्रतिशोध

पांडव और श्रीकृष्ण, जो उस रात इस घटना के दौरान दूर होते हैं, अगली सुबह शिविर में लौटते हैं। इस घटना का समाचार सुनकर युधिष्ठिर मूर्छित हो जाते हैं और पांडव अत्यंत व्याकुल। भीम गुस्से में अश्वत्थामा को मारने के लिए भागतें है और उसे भागीरथ के किनारे ऋषि व्यास के आश्रम में पकड़ लेतें हैं।

अश्वत्थामा, पांडवों की हत्या करने की शपथ को पूरा करने के लिए पांडवों के विरुद्ध ब्रह्मशिरा का आवाह्न करता है। श्री कृष्ण, अर्जुन से ब्रह्मशिरा के विरोध में अग्नि प्रक्षेपास्त्र करके, स्वयं की रक्षा करने को कहते हैं। इसी बीच ऋषि व्यास हस्तक्षेप करते हैं और हथियारों के टकराव को रोकते हैं साथ ही अर्जुन और अश्वत्थामा दोनों से ही अपने हथियार वापस लेने के लिए कहते हैं। अर्जुन हथियार वापस लेने के तरीके को जानते थे इसलिए वह वापस ले लेते हैं। परंतु अश्वत्थामा को ब्रह्मास्त्र को वापस लेने का तरीका नहीं पता था, इसलिए वह पांडवों के वंश को समाप्त करने के प्रयास में गर्भवती उत्तरा (अभिमन्यु की पत्नी) की ओर ब्रह्मास्त्र को निर्देशित कर देता है। इस बात से नाराज होकर पांडव अश्वत्थामा को मारने के लिए जाते हैं, परंतु श्री कृष्ण उन्हें ऐसा करने से रोक देते हैं। तत्पश्चात श्री कृष्ण अश्वत्थामा को 3000 वर्षों तक जीवित रहने का श्राप देते हैं, वह कहते हैं कि वह अत्यधिक पीड़ा में रहेगा, परंतु मृत्यु उसके पास नहीं आएगी, उसकी त्वचा पिघलनी शुरू हो जाएगी, परंतु वह फिर भी नहीं मरेगा। कोई भी उसके पास नहीं आएगा, ऐसा शाप देकर वहां से चले जाते हैं। वापस जाकर श्री कृष्ण, उत्तरा के गर्भ को द्रौपदी और सुभद्रा के अनुरोध करने पर बचा लेते हैं क्योंकि यह शिशु पैदा होने से पहले ही जीवन की परीक्षा का सामना कर लेता है इसलिए भगवान श्री कृष्ण इसका नाम परीक्षित (परीक्षण किया गया) रखते हैं और बाद में युधिष्ठिर को हस्तिनापुर का राजा बनाने में सफल होते हैं।

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