जानिये गरुड़ देव के जीवन की अलौकिक गाथाएं

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भगवान ब्रह्मा के पोते कश्यप का विवाह अदिति, दिति, धनु, कालिका, थामरा, क्रोधावसा, मनु और अनाला द्वारा हुआ था, जो कि दक्ष सभी पुत्रियां थीं। उनमें से थमरा की पाँच पुत्रियां थी, जिनका का नाम क्रमशः क्रौंची, दासी सएनी, धृतराष्ट्री और शुकी था। क्रौंची की संतानें उल्लू थी, दासी दास (सेवकों) की माँ बनीं। सएनी ने चील एवं गिद्ध को जन्म दिया, धृतराष्ट्री हंस और बुलबुल की मां बनीं, और शुकी ने एक पुत्री को जन्म दिया, जिसका नाम नाथा रखा गया और नाथा की बेटी का नाम विनता था।

ऋषि कश्यप द्वारा गरुड़ के जन्म का वरदान 

एक बार विनता और कद्रू, ऋषि कश्यप की सेवा कर रहीं थीं, जो कि उस समय तप कर रहे थे। जब वह ध्यान से जागे, तो उन्होंने कहा कि वह उन दोनों से बहुत प्रसन्न हैं और उन्हें एक-एक वरदान देते हैं, जो इच्छा करें मांग लो। इस पर कद्रू में उनसे 1000 पुत्रों का वरदान मांगा, वहीं विनता ने उनसे सिर्फ दो ही पुत्रों का वरदान मांगा, परंतु साथ ही उसने यह भी अनुरोध किया कि उसके पुत्र कद्रू के पुत्रों से अधिक वीर हों। ऋषि कश्यप ने अपने वचन के अनुसार उन दोनों के उनके मांगे हुए वरदान दे दिए। कुछ समय पश्चात कद्रू ने 1000 अंडे और विनीता ने दो अंडे दिए। दोनों ने अपने अंडों को गर्म बर्तन में संरक्षित करके रख दिया। 500 साल बाद कद्रू के अंडे फूटे और उनसे 1000 सांप निकले, लेकिन विनता द्वारा रखे गए अंडों से अभी तक कुछ नहीं निकला। जिसके कारण वह अधीर हो उठे और उसने एक अंडा लिया और उसे खोल दिया। अंडा अभी आधा ही बना था, जिसका नाम अरुण था। अरुण यह देखकर अत्यंत क्रोधित हुआ और उसने अपनी मां को श्राप दिया कि “आपकी अधीरता के कारण मुझे बहुत कष्ट हुआ है, अतः आज से आप कद्रू की गुलाम बन जाओगी। परंतु आपके इस दूसरे अंडे से एक महान पुत्र पैदा होगा, जो आपको इस गुलामी से मुक्त करवाएगा। इतना कहकर वह सूर्य देव के पास चले गये और उनका सारथी बन गये। चूंकि उनका रंग बैगनी था, इसीलिए सुबह के समय जब भी वह आते हैं तो पहले बैगनी रंग का उजाला हो जाता है।

गरुड़ देव का जन्म

धीरे-धीरे वक्त के साथ 500 वर्ष और बीत गए, विनता का दूसरा अंडा फूटा और उससे गरुण निकला। उनका शरीर आग की तरह इतना तेज चमक रहा था कि सूर्य देव ने महसूस किया की गरुण की चमक के आगे उनकी चमक फीकी पड़ रही है इसलिए वह देवताओं के पास पहुंचे। सभी देवताओं ने गरुण के पास पहुंच कर उनसे प्रार्थना की कि वह अपनी चमक को कम करें और गरुड़ ने इस प्रार्थना को सहर्ष स्वीकार कर लिया। इसके बाद सभी देवताओं ने उन्हें ढेरों आशीर्वाद देकर वहां से चले गए। गरुण अपनी माता के पास वापस लौट आए।

देवों और असुरों द्वारा दूध के सागर के मंथन से उत्पन्न एक श्वेत रंग का अश्व निकला था, जिसका नाम उच्चैश्रवा रखा गया। वह राजा इंद्र के सवारी था। एक बार कद्रू ने विनता को बताया कि इस घोड़े की पूंछ काली है, जबकि विनता ने कहा ऐसा नहीं है, साथ ही उसने कद्रु से यह तक कहा कि यदि उसकी पूछ काली निकली तो वह कद्रु की दासी बन जाएगी। कद्रु ने स्वयं के पुत्रों को घोड़े की पूंछ से जोड़ दिया, जिसके कारण वह पूछ काली दिखाई देने लगी। विनता ने जब यह देखा तो उसे अपने वचन के कारण कद्रु की दासी बनना पड़ा। इस कारण गरुण को भी कद्रु और उसके पुत्रों का दास बनना पड़ा। एक बार सांपों ने गरुण को रामानेयका के सुंदर द्वीप पर उन्हें ले जाने का आदेश दिया। गरूड़ उनको अपनी पीठ पर बैठा कर आसमान की तरफ आकाश की ऊंचाई में उड़ान भरने लगा। गरुड़ ने इतनी ऊंचाई में उड़ान भर ली कि कई सांप सूर्य के तेज प्रकाश के कारण जलने लगे, हालांकि बाद में कद्रु ने सूर्य देव से अनुरोध करके ठंडी वर्षा करवाई, जिससे सांप ठीक हो गए।

गरुड़ द्वारा स्वर्ग की यात्रा का विधान

कद्रू की गुलामी से तंग आकर, एक बार गरुड़ ने उनसे पूछा, कि वह ऐसा क्या करें जिससे कि वह और उसकी मां इस गुलामी से आजाद हो जाएं। इस पर कद्रु और उसके पुत्रों ने कहा कि यदि वह स्वर्ग में जाकर वहां से उनके लिए अमृत ले आए तो फिर वे उन दोनों को सदा सदा के लिए मुक्त कर देंगे। यह सुनते ही गरुड़ ने अमृत लाने के लिए दृढ़ निश्चय किया और अपनी मां विनता को इस विषय में बताया। परंतु स्वर्ग तक की लंबी यात्रा के दौरान गरुण अपने भोजन को लेकर चिंतित था। तब उनकी माता विनता ने उन्हें निषादालय (अंधेरे का निवास) नामक एक द्वीप के बारे में बताया। विनता ने कहा कि वह उस द्वीप पर जा सकता है और जितना चाहे उतना निषाद खा सकता है लेकिन साथ ही इस बात की चेतावनी दी, कि किसी भी परिस्थिति में गरुड़ को किसी भी ब्राह्मण को अपना भोजन नहीं बनाना है। गरुड़ ने अपनी मां से पूछा कि वह कैसे पहचानेगा कि कौन ब्राह्मण हैं? उनकी मां ने कहा कि अगर उसने ब्राह्मणों को निगलने की कोशिश की तो वह आग तरह गर्म हो जाएंगे। इसके बाद विनता ने अपने पुत्र को आशीर्वाद दिया और कहा कि उसके पंखों की रक्षा स्वयं भगवान वायु देव करेंगे, पीठ की रक्षा भगवान सूर्यदेव और चंद्र देव करेंगे, साथ ही उसका सिर अग्निदेव द्वारा संरक्षित रहेगा और शरीर 8 वसुओं द्वारा सुरक्षित रहेगा। ऐसा आशीर्वाद देकर विनता ने अपने पुत्र को स्वर्ग से अमृत लाने के लिए विदा किया।

गरुड़ द्वारा श्रीलंका का निर्माण

गरुड़ निषादालय पहुंचे और वहां पहुंच कर उन्होंने हजारों लोगों को खाना शुरू किया। गलती से उन्होंने एक ब्राह्मण और उसकी पत्नी को निगलने की कोशिश की। चूँकि वे आग की तरह गर्म थे, इसलिए उन्होंने तत्क्षण उन्हें थूक दिया। दोनों ने उन्हें आशीर्वाद दिया। गरुड़ ने उनको बताया कि वह बहुत भूखे हैं इस पर ऋषि ने उनसे कहा कि वे कछुए और हाथी को खाएं, क्योंकि वे इस द्वीप की झील के पानी को खराब कर रहे हैं। दोनों भाई हैं जिनका नाम विभुवसु और सुप्रीतिका है। वे दोनों अपने पिता की संपत्ति में हिस्सेदारी के लिए झगड़ा कर रहे थे सुप्रीतिका ने विभुवसु को श्राप दिया कि वह कछुआ बन जाए, जिसके बदले में विभुवसु ने सुप्रीतिका को हाथी बनने का श्राप दिया। गरुड़ ने दोनों को पकड़ लिया और उन्हें मार डाला तथा उन दोनों को खाने के लिए उचित स्थान की खोज करने के लिए उनके साथ उड़ना शुरू कर दिया। एक लंबी खोज के बाद, गरुण को एक बहुत बड़ा बरगद का पेड़ मिला। वह पेड़ पर बैठ कर अपने शिकार को खाने लगा, परंतु वह जिस शाखा पर बैठा था वह शाखा टूट गई। तभी गरुड़ ने एहसास किया कि ऋषि बालखिल्य उसी पेड़ की शाखा के नीचे उल्टा लटक कर तप कर रहे थे। तब गरुड़ ने उस शाखा के साथ उड़ना शुरू किया, जिस पर ऋषि बालखिल्य तपस्या कर रहे थे। ताकि वह ऋषि बालखिल्य को एक ऐसे स्थान पर पहुंचा सके, जहां उन्हें कोई कष्ट ना हो। उड़ते उड़ते, गरूड़, गंधमादन पर्वत पर पहुंच गया और वहां उन्होंने ऋषि कश्यप को अपनी इस समस्या के विषय में बताया। ऋषि कश्यप ने तप कर रहे ऋषि बालखिल्य से क्षमा मांगी, कि उनके पुत्र ने जो कुछ भी किया वह अनजाने में किया। ऋषि बालखिल्य, गरुण से नाराज नहीं हुए अपितु गरुड़ को आशीर्वाद देकर हिमालय की तरफ चले गए। इसके बाद गरुड़ ने अपने शिकार हाथी और कछुए को आराम से खाया और फिर अपनी स्वर्ग की यात्रा की तरफ चल पड़ा। बाद में उसने बरगद के पेड़ की एक बड़ी सी शाखा को समुंदर में डाल दिया। जिस जगह उन्होंने बरगद की शाखा डाली, वह स्थान एक बड़े द्वीप के रूप में परिवर्तित हो गया और आज के समय में वह श्रीलंका के नाम से जाना जाता है।

गरुड़ की वीरता से भगवान् विष्णु का प्रसन्न होना

गरुड़ के देवलोक पहुंचने से पहले ही वहां बहुत बुरे अपशकुन घटित होने लगे। इस पर बृहस्पतिदेव ने देवताओं से कहा यह इसलिए हो रहा है क्योंकि गरुड़ उनकी कड़ी मेहनत से प्राप्त अमृत कलश को लेने आ रहा है। देवताओं ने फैसला किया कि वह हर तरह से अमृत कलश की रक्षा करेंगे। अमृत कलश के पास पहुंचने पर सबसे पहले विश्वकर्मा भगवान ने गरुड़ का विरोध किया। परंतु गरूड़ ने बहुत आसानी से उन्हें हरा दिया। गरुड़ के पंखों के फड़फड़ाने के कारण चारों ओर बहुत अधिक धूल उड़ने लगी, जिसके कारण देवताओं को की दृष्टि बाधित होने लगी। बाद में इंद्रदेव, चंद्रदेव और सूर्यदेव के साथ गरुड़ ने युद्ध किया और सभी को परास्त कर दिया। इसके बाद गरुड़ ने उस स्थान पर प्रवेश किया जहां अमृत कलश रखा हुआ था। अमृत कलश दो विशाल चक्रों के मध्य रखा था। यह चक्र लगातार घूम रहे थे, साथ ही इन चक्रों में एक खतरनाक यंत्र भी स्थापित किया गया था। चक्र के नीचे बहुत सारे सांप थे जो जहरीली धुएं को ऊपर की तरफ उड़ा रहे थे। सांप कभी भी अपनी आंखें नहीं बंद करते। गरुड़ ने धूल उड़ा कर उनकी आंखों में डाल दी और सभी सांपों को दो टुकड़ों में काट दिया। उसके पश्चात गरुण ने अति सूक्ष्म रूप धारण करके कलश के पास पहुंचकर यंत्र और चक्र को पूर्णतया नष्ट कर दिया। इसके बाद उन्होंने अमृत कलश उठाया और आकाश की तरफ उड़ चले। भगवान विष्णु गरुड़ की इस वीरता को देख रहे थे और उससे अत्यंत प्रसन्न हुए। उन्होंने गरुड़ को वरदान मांगने के लिए कहा। गरुड़ ने भगवान विष्णु से अनुरोध किया, कि वह उसे अपनी सवारी बना लें और अमर (बिना अमृत का पान किए) कर दें। भगवान विष्णु ने उन्हे ये दोनों ही वरदान दे दिए।

गरुड़ द्वारा अमृत की प्राप्ति

इस समय इंद्रदेव ने उनका विरोध किया और उनके खिलाफ अपना वज्रयुद्ध भेजा। यह महान अस्त्र केवल उनके एक पंख को हटा सकता था। तब इंद्र ने गरुड़ से क्षमा माँगी और उनसे अमृत कलश वापस करने का अनुरोध किया। गरुड़ इस बात के लिए सहमत हो गए परंतु उन्होंने एक शर्त रखी कि इंद्रदेव उन्हें सांपों को अपना भोजन बनाने की अनुमति दे दें। इंद्रदेव ने गरुड़ को यह वरदान दे दिया। इसके पश्चात गरुड़ ने इंद्रदेव से कहा यह कलश वे अपने लिए नहीं बल्कि अपने चचेरे भाइयों के लिए लेकर जा रहें हैं, क्योंकि उन्होंने उनको और उनकी माता को अपना दास बनाया हुआ है। गरुड़ ने यह भी बताया कि उनके चचेरे भाइयों ने उनसे कहा है यदि वह उन्हें अमृत कलश ला कर देगें तो वह उन्हें और उनकी माता को मुक्त कर देंगे। इसके पश्चात गरुड़ ने कहा “मैं उन्हें यह अमृत का कलश दे दूंगा और अगर आप उनसे यह कलश वापस लेंगे तो मुझे इस बात पर कोई आपत्ति नहीं होंगी।”

इंद्र गरूड़ की इस बात पर सहमत हो गए और उनके पीछे-पीछे चलने लगे। गरुड़ ने जैसा कहा था वैसा ही किया। अमृत कलश लेकर कद्रु और उनके पुत्रों को दे दिया, साथ ही उन्होंने यह बताया कि इस कलश को दूर्वा घास के बिस्तर पर रखना होगा और इसका पान केवल स्नान करने के बाद ही किया जा सकता है। यह बात सुनकर नागों ने अपनी सहमति जताई और वे सभी स्नान करने चले गए। इतनी देर में इंद्रदेव ने अमृत कलश वहां से चुरा कर वापस स्वर्ग लोक पहुंचा दिया। जब नाग वापस आएं और उन्हें अमृत कलश नहीं मिला तो वे बहुत निराश हो गए और जहां पर उन्होंने कलश रखा था वहां अमृत की कुछ बूंदे पड़ी थी उन्होंने उसी को चाट लिया। इन दूर्वा घास के तने इतनी तेज थे कि सांप की जीभ बीच में से कट गई। तब से लेकर आज तक सांपों की जीभ दो भाग में विभाजित रहती है, जिसे द्विजहवा (दो जीभों वाले) कहा जाता है। इसके बाद गरुण और उनकी मां स्वतंत्र हो गए।

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बालखिल्य ऋषियों द्वारा देवराज इंद्र से प्रतिशोध

एक बार, ऋषि कश्यप एक बहुत ही उत्तम पुत्र पाने की कामना से एक महान अग्नि यज्ञ कर रहे थे। उन्होंने इंद्रदेव और 60000 बालखिल्य ऋषियों, जोकि कद में बहुत छोटे होते हैं, से अनुरोध किया कि वे अग्नि यज्ञ के लिए लकड़ी ले आएं। इंद्रदेव ने बहुत कम समय में आवश्यक लकड़ियां एकत्रित कर लीं, परंतु बालखिल्य ऋषियों को लकड़ी के छोटे-छोटे टुकड़े उठाने में भी बहुत समय लग रहा था। इंद्रदेव ने स्वाभाविक रूप से इन संतों का मजाक उड़ाया। बालखिल्य ऋषियों ने उस स्थान को छोड़ दिया और इंद्र को सबक देने के उद्देश्य से अग्नि यज्ञ शुरू किया। इंद्रदेव घबराकर ऋषि कश्यप के पास पहुंचे और उन से अनुरोध किया कि वे बालखिल्य ऋषियों से उन्हें क्षमा दिलवाएं। ऋषि कश्यप बालखिल्य ऋषियों के पास पहुंचे और उनसे क्षमा की बात कहीं। बालखिल्य ऋषियों ने अग्नि यज्ञ के प्रभाव को स्थानांतरित करते हुए (जो यज्ञ इंद्रदेव को सबक देने के लिए कर रहे थे) उसके बदले ऋषि कश्यप को उस यज्ञ के फलस्वरूप एक पुत्र का आशीर्वाद दिया। यह पुत्र गरूड़ हुआ, जो इस अग्नि यज्ञ के फलस्वरुप प्राप्त हुआ था।

गरुड़ और कालिया

इंद्र द्वारा सांपों को खाने की अनुमति मिलने और सांपों से शत्रुता होने के कारण गरुड़ ने बड़ी संख्या में सांपों को मारना शुरू कर दिया। जब सांप, गरूड़ का विरोध करने में सक्षम नहीं हुए, तो उन्होंने गरूड़ से कहा कि वे उनके भोजन के लिए रोज एक बड़े सांप को भेज दिया करेंगे। इस बात पर गरुण सहमति व्यक्त की। हालांकि इस बात को “कालिया” नामक एक नाग तैयार नहीं हुआ जिस कारण गरुण तथा कालिया के बीच भयानक युद्ध हुआ। यह युद्ध वर्तमान यमुना नदी पर लड़ा गया था। लड़ते हुए गरुड़ के पंखों की गति इतनी तेज हुई कि उससे यमुना नदी का पानी वहां तपस्या कर रहीं एक ऋषि सुभारी के ऊपर जा गिरा। ऋषि सुभारी गरुड़ के इस कृत्य पर अत्यंत क्रोधित हुईं और उन्होंने गरुण को श्राप दिया कि यदि वह कभी भी यमुना नदी के आसपास आया तो उसका सिर हजार टुकड़ों में टूट जाएगा। इस कारण गरुड़ ने यमुना के क्षेत्र के आसपास आना छोड़ दिया और कालिया नाग वहां अपने परिवार के साथ रहने लगा।

गरुड़ और राजा सागर

सूर्य वंश में सुबाहु नामक एक राजा था। उनकी एक रानी थी, जिनका नाम यादवी था। विवाह को लंबा अंतराल बीत जाने के बावजूद को यादवी को गर्भधारण नहीं हुआ। इस कारण चिंतित यादवी और सुबाहु पुत्र की कामना की इच्छा लिए ईश्वर से प्रार्थना करने लगे। ईश्वर ने जल्द ही उनकी प्रार्थना सुन ली और कुछ समय पश्चात यादवी ने गर्भधारण किया। परंतु सुबाहु की अन्य दूसरी पत्नियों को यादवी का गर्भवती होना बिल्कुल पसंद नहीं आया और उन्होंने धोखे से यादवी को जहर दे दिया। यादवी को गर्भ धारण किए 7 वर्षो समय बीत गया परंतु अब तक उसने किसी भी शिशु को जन्म नहीं दिया। इस बात से दुखी होकर सुबाहु ने राज्य छोड़ने का फैसला किया और ऋषि के शिष्य बनने के लिए चल पड़े। यादवी भी उनके साथ राज्य छोड़ कर चली गई। परंतु अचानक सुबाहु की मृत्यु हो गई, निराश यादवी अपने पति की चिता में ही अपने प्राण त्यागना चाहती थी, परंतु ऋषि उर्वा ने उनको बताया कि उनके गर्भ में एक अत्यंत तेजस्वी पुत्र पल रहा है, यदि उन्होंने अपने पति की चिता के साथ अपने प्राण त्यागे तो यह बच्चा दुनिया में आने से पहले ही मृत्यु को प्राप्त हो जाएगा, इसलिए यादवी को अपने विषय में ना सोच कर इस बच्चे के बारे में सोचना चाहिए। यह सुनकर यादवी ने प्राण त्यागने का निश्चय छोड़ दिया और कुछ समय पश्चात एक पुत्र को जन्म दिया, जिसका नाम सागर रखा गया। कुछ समय बाद विनता जंगल में रास्ता भटक गई और ऋषि उर्वा के आश्रम में जा पहुंची। जब ऋषि उर्वा को यह पता चला कि विनता कद्रु की दासी के रूप में जीवन व्यतीत कर रही हैं, तो उन्होंने विनता को पुत्रवती होने का आशीर्वाद दिया और साथ ही यह भी बताया कि उनके पुत्र का नाम गरुड़ रखा जाएगा, जो उन्हें इस दासता से मुक्त कराएगा। इस समय विनता की एक पुत्री भी थी जिसका नाम सुमति था। उपमन्यु नामक एक ऋषि ने अपने पूर्वजों की मुक्ति हेतु सुमति का हाथ विवाह के लिए मांगा। परंतु सुमति ने उनसे विवाह करने के लिए साफ मना कर दिया। यह सुनकर ऋषि उपमन्यु अत्यंत क्रोधित हुए और उन्होंने सुमति को श्राप दिया कि वह कभी भी किसी ब्राह्मण से विवाह नहीं कर सकेंगीं। यह सुनकर भी विनता बुरी तरह चिंतित हो उठी और उसने अपने पुत्र गरुड़ को उर्वा ऋषि के आश्रम, इस समस्या के समाधान के लिए भेजा। जब गरुड़ ने ऋषि उर्वा को यह समस्या बताई, तो ऋषि ने गरुड़ को अपनी बहन का विवाह सागर से करने का सुझाव दिया। समय के साथ सागर बहुत महान राजा बना, जिसने सुमति के साथ 60 हजार पुत्रों को जन्म दिया।

गरुण का घमंड टूटा

इंद्र के सारथी मथली की एक बहुत सुंदर बेटी थी, जिसका नाम गुना केसी था। वह अपनी सुंदर बेटी के लिए योग्य वर की तलाश में निकला। अपनी बेटी के लिए योग्य वर की खोज में मथली ने ऋषि नारद की मदद ली और पाताल जा पहुंचा। वहां पहुंचकर उन्होंने सुमुख को अपनी पुत्री के लिए योग्य वर के रूप में पसंद कर लिया, सुमुख नागों के भगवान थे। लेकिन सुमुख के पिता चिकुरा को बीते महीने गरुड़ ने अपना भोजन बना लिया था और साथ ही उन्होंने सुमुख से कहा था कि अगले महीने वह सुमुख को अपना भोजन बनाएंगे। मथली और नारद ने इस समस्या का हल खोजने के लिए इंद्रदेव से संपर्क किया। उस समय भगवान विष्णु भी इंद्रदेव के दरबार में उपस्थित थे। इंद्रदेव ने सुमुख को लंबे जीवन का आशीर्वाद दिया और परिणामस्वरूप मथली ने अपनी पुत्री गुना केसी का विवाह सुमुख से करवा दिया। जब गरुड़ को इस विषय में पता चला तो वह बुरी तरह से परेशान हो गए और इंद्रदेव के दरबार में पहुंचे और उन्हें धमकी देने लगे। तब भगवान विष्णु ने गरुड़ को रोकने के लिए अपना दाहिना हाथ बढ़ाया और उनसे पूछा कि क्या वह इसे उठा सकते हैं।जैसे ही भगवान विष्णु ने अपना हाथ गरुड़ के सिर पर रख दिया, गरुड़ को ऐसा लगा जैसे पूरा ब्रह्मांड उनके सिर पर रख दिया गया हो और दुखी हो गए। गरुड़ ने भगवान विष्णु से क्षमा याचना की।

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गरुड़ और गालव

एक बार मृत्यु के देवता ने ऋषि वशिष्ठ का रूप धारण किया और ऋषि विश्वामित्र के आश्रम में जा पहुंचे। ऋषि विश्वामित्र ने उनसे भोजन करने का अनुरोध किया, परंतु भोजन तैयार हो जाने के पश्चात ऋषि विश्वामित्र स्वयं चावल बनाने लगे। इस समय मृत्यु के देवता ने एक क्षण में वापस आने की बात कह कर, वहां से चले गए। ऋषि विश्वामित्र, गर्म चावल की थाल सजाकर, मृत्यु के देवता का इंतजार करने लगे, परंतु वह नहीं आए। उन्हें इस प्रकार इंतजार करते करते 100 वर्ष बीत गए। 100 वर्ष पश्चात मृत्यु के देवता आए और उन्होंने चावल खाया। इस दौरान गालव, जो ऋषि विश्वामित्र के शिष्य थे, 100 वर्षों तक उनके साथ रहे और पूरी लगन से उनकी देखभाल करते रहे। ऋषि विश्वामित्र उनसे अति प्रसन्न हुए। शिक्षा पूरी होने के बाद गालव वहां से चलने लगे तो गुरु विश्वामित्र ने उन्हें आशीर्वाद दिया, जिसके पश्चात गालव ने अपने गुरु ऋषि विश्वामित्र से पूछा कि वह फीस के रूप में उन्हें क्या भुगतान करें? परंतु ऋषि विश्वामित्र ने इतने अच्छे छात्र से कुछ भी लेने से इनकार कर दिया, लेकिन जब गालव ज़िद करने लगे तो विश्वामित्र ने उनसे 800 सफेद घोड़े लाने को कहा जिनके कान काले हों। गालन के पास इतना धन नहीं था कि वह घोड़े खरीद सकें। इस कारण वे उदास हो गए, तब गरुड़ उनके पास आए और उनकी मदद करने की इच्छा प्रकट की। गालव उनकी पीठ पर बैठकर उत्तरी दिशा की ओर उड़ चले। काफी समय पश्चात दोनों ऋषभ पर्वत के पास पहुंचे, जहां एक ब्राह्मण स्त्री जिनका नाम संदली थ, तपस्या कर रही थीं। गरुड़ ने साध्वी स्त्री का मजाक बनाया परंतु इसके पश्चात भी साध्वी स्त्री ने दोनों के लिए भोजन बनाया और उन्हें भोजन दिया। खाना खाने के बाद दोनों सो गए। जागने पर गरूड़ में देखा कि उसके सारे पंख नीचे गिर गए हैं। यह देखते ही गरूड़ को अपनी गलती का एहसास हो गया और उन्होंने बिना समय गंवाए साध्वी स्त्री संदली से क्षमा मांगी। संदली ने उन्हें क्षमा कर दिया और आशीर्वाद स्वरुप उनके पंख वापस आ जाएंगे ऐसा कहा।

कुछ समय पश्चात गरुड़ के पंख वापस आ गए। इसके बाद दोनों ने अपनी यात्रा फिर से प्रारंभ की और वे राजा ययाति के महल में पहुंचे। राजा ययाति के पास भी इतना धन नहीं था, लेकिन उन्होंने अपनी पुत्री माधवी, गालव को दे दी। गालव ने माधवी को 3 राजाओं को देकर उसके बदले 600 घोड़े हासिल करने में ही सक्षम रहे। तत्पश्चात गालव ने 600 घोड़ो साथ उन्होंने माधवी भी उन 200 घोड़ों के बदले, ऋषि विश्वामित्र को दे दी। ऋषि विश्वामित्र और माधवी के एक पुत्र हुआ, जिसका नाम अष्टक रखा गया। महाभारत के अनुसार गरुण के 6 पुत्र हुए, जो आगे चलकर पक्षियों के प्रजाति के पूर्वज बने। इस प्रजाति का हर सदस्य आगे चलकर बहुत पराक्रमी हुआ, परंतु इन सभी के अंदर करुणा का अभाव रहा, जिस प्रकार यह सांपों के प्रति था। भगवान विष्णु इन के रक्षक बने।

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