सिख धर्म के नौंवे गुरु श्री तेग बहादुर जी का जीवन परिचय

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गुरु तेग बहादुर जी सिखों के नौवें गुरु थे। सिख उन्हें ‘श्रृष्टि दी चादर (मानवता के रक्षक)’ और हिन्द दी चादर (हिन्दुस्तान के रक्षक) मानते हैं। 16 अप्रैल 1664 को उन्हें सिखों के नौंवे गुरु के रूप में नियुक्त किया गया था। गुरु तेग बहादुर जी, जो एक विचारक और एक योद्धा थे, ने गुरु नानक जी की पवित्रता और दिव्यता का पूरे भारत में प्रचार किया। गुरु तेग बहादुर जी द्वारा रचित विभिन्न लेखों व श्लोको को गुरु ग्रन्थ साहिब में सम्मिलित किया गया है। सिख धर्म के संदेशों को फ़ैलाने के लिए गुरूजी ने बड़े पैमाने पर यात्रा की और कई नए उपदेश केंद्र स्थापित किये। गुरूजी ने पंजाब में चक-नानकी शहर की स्थापना की। बाद में इसी शहर को सिखों के दसवें गुरु, गुरु गोबिंद जी ने श्री आनंदपुर साहिब बना दिया।

गुरु तेग बहादुर जी का प्रारंभिक जीवन:

गुरूजी का जन्म अप्रैल 18, 1621 में हुआ था। गुरु तेग बहादुर जी के बचपन का नाम त्यागमल था। उन्होंने अपना बचपन अमृतसर में बिताया। गुरूजी के पिताजी का नाम गुरु हरगोबिन्द जी एवं माता का नाम नानकी जी था। अपने शुरुआती दिनों में उन्होंने भाई गुरदास जी से गुरुमुखी, हिंदी, संस्कृत, और भारतीय धार्मिक दर्शन सीखा। उन्होंने बाबा बुधा से धनुषविद्या और घुड़सवारी सिखी और गुरु हरगोबिन्द जी से तलवार चलाना सिखा।

गुरु तेग बहादुर जी का योद्धा रूप:

केवल 13 वर्ष की उम्र में उन्होंने अपने पिताजी से युद्ध में शामिल होने की अनुमति मांगी, क्योंकि उनके गाँव पर पेंदे खां व मुगलों द्वारा हमला किया गया था। गुरु हरगोबिन्द जी ने उन्हें युद्ध में शामिल होने की अनुमति दे दी। लड़ाई जीतने के बाद (करतारपुर की लड़ाई) घर लौटने वाले विजयी सिखों ने अपने नए नायक को नए “योद्धा” नाम से सम्मानित किया, और इसी कारण त्यागमल जी का नाम बदलकर तेग बहादुर जी रखा गया। तेग (तलवार का रक्षक) और बहादुर (न डरने वाला)। तेग बहादुर जी ने अपनी पढाई को छोड़कर सारा समय ध्यान करने में केन्द्रित किया।

गुरु तेग बहादुर जी का विवाह और ध्यान में रूचि:

गुरु तेग बहादुर जी का विवाह 1632 में करतारपुर में माता गुजरी जी से हुआ था। अपने पुत्र गुरुदत्त की आकस्मिक मृत्यु के बाद, गुरु हरगोबिन्द जी ने गुरु नानक जी की गद्दी पर बैठने के लिए अपने पोते हर राय को तैयार करना शुरू कर दिया। हर राय जी 1644 में गुरु हरगोबिन्द जी के उतराधिकारी बने। इसके कुछ समय बाद गुरु हरगोबिन्द जी ने तेग बहादुर जी को अपनी पत्नी और माँ के साथ बाकला गाँव जाने के लिया कहा। अगले 20 वर्षों के लिए, तेग बहादुर जी ने अपना अधिकतम समय एक भूमिगत कमरे में ध्यान करके बिताया।

गुरु तेग बहादुर जी का सिखों का नवां गुरु बनना:

इससे पहले कि गुरु हरकृष्ण जी (सिखों के आठवें गुरु) भगवान के दरबार में जाते, उन्होंने संकेत दिया कि उनका उतराधिकारी व सिखों के अगले गुरु बाकला गाँव में मिलेंगे।

इससे पहले एक अमीर सिख व्यापारी मखन शाह, जिनका जहाज समुद्री तूफान में फंस गया था, ने भगवान् से प्रार्थना की कि यदि उनका जहाज सुरक्षित रूप से बंदरगाह तक पहुँच जायेगा तो वह अपने गुरु हरकृष्ण जी को 500 सोने की मोहरे देंगे। जहाज सुरक्षित रूप से बंदरगाह पहुँच गया और सच्चा सिख होने के नाते, मखन शाह, 500 सोने की मोहरे देने के लिए दिल्ली के लिए रवाना हो गये परन्तु उन्हें रास्ते में ज्ञात हुआ कि गुरु हरकृष्ण जी का निधन हो गया है और अगले गुरु बाकला गाँव में है। इसके बाद मखन शाह गुरु की तलाश में बाकला गाँव चले गये। बाकला गाँव में पहुंचकर उन्हें सोढ़ी वंश के 22 सदस्य मिले जो अपने आप को गुरु बताते थे, तो मखन शाह ने प्रत्येक गुरु को 2 सोने की टुकड़े देने का फैसला किया और प्रत्येक गुरु ने प्रसन्न होकर उन्हें आशीर्वाद दिया। मखन शाह गाँव छोड़ने ही वाले थे कि एक बच्चे ने उन्हें एक और पवित्र व्यक्ति के पास जाने को कहा जो एक भूमिगत कमरे में बैठकर ध्यान कर रहा था। फिर से मखन शाह ने 2 सोने के टुकड़े दिए और गाँव छोड़ने ही वाले थे की गुरु तेग बहादुर जी ने कहा “तुमने अपना वचन क्यों तोडा? तुमने वादा किया था की तुम्हारी जहाज अगर सही सलामत बंदरगाह तक पहुँच जाएगी तो तुम 500 सोने की मुद्राएँ गुरु को दोगे”। इतना सुनते ही मखन शाह अत्यधिक प्रसन्न हुए और बोले कि “हाँ वादा किया था, हाँ वादा किया था” और चिल्लाने लगे कि “सच्चा गुरु मिल गया है, सच्चा सिख मिल गया है” और उन्होंने गुरु का आशीर्वाद प्राप्त किया और इसके बाद दूसरे पाखंडी गुरु गाँव से भाग गये।

सिख समुदाय को निर्देश देने और मार्गदर्शन करने की जिमेदारी अब गुरु तेग बहादुर जी की थी। वे सिखों की वंदना का केंद्र बिंदु थे। अपनी शिक्षाओं और अभ्यास से उन्होंने अपने धार्मिक और सामाजिक विवेक को ढाला। गुरु तेग बहादुर एक आदर्श जीवनशैली रखते थे और वे निडर थे।

गुरु तेग बहादुर जी द्वारा हरमंदर साहिब की यात्रा:

मखन शाह द्वारा सार्वजानिक घोषणा के तुरंत बाद, सिखों के एक जत्थे के साथ गुरु तेग बहादुर जी ने हरमंदर साहिब में श्रृद्धांजलि अर्पित करने के लिए अमृतसर की यात्रा की। परन्तु जब गुरु तेग बहादुर जी यहाँ पहुंचे तो सोढ़ी परिवार के सदस्यों ने उनका विद्रोह किया। उस समय गुरुद्वारा पर सोढ़ी परिवार के सदस्यों का नियंत्रण था। इस कार्यवाही का कारण ये था कि अमृतसर के लालची राजमिस्त्री ने गुरु अर्जन देव जी के बड़े भाई पृथ्वी चन्द को अपना गुरु मान लिया था। गुरु तेग बहादुर जी ने कुछ क्षण तक वहाँ इंतजार किया। उस जगह को अब “थार साहिब” के नाम से जाना जाता है। लेकिन जब कुछ समय बाद भी उन्हें प्रवेश नहीं दिया तो वे पास ही के वला नामक गाँव में रहने लगे। बाद में अमृतसर की महिलाएं बाहर निकली और पुरुषों के शर्मनाक व्यवहार के लिए पश्चाताप किया। अमृतसर की महिलाओं की सच्ची श्रद्धा और साहस पर गुरु तेग बहादुर जी अत्यधिक प्रसन्न हुए।

गुरु तेग बहादुर जी की पंजाब की यात्रा:

गुरुजी ने कीरतपुर की लगातार तीन यात्राएं की। 21 अगस्त 1664 को गुरु तेग बहादुर अपने पिताजी व भाई के निधन पर बीबी रूप कौर के साथ सांत्वना देने वहां गये थे। दूसरी बार वे 15 अक्टूबर 1664 को गुरु हर राय की माता, माता बस्सी की मृत्यु पर गये थे। तीसरी बार वे पंजाब के माझा, मालवा क्षेत्र, और बांगर जिलों में गये। ब्यास और सतलुज नदियों को पार करते हुए, गुरूजी मालवा पहुंचे जहाँ उन्होंने जीरा और मोगा का दौरा किया और दरौली पहुंचे। इसके बाद वे लखी जंगल आ गये जिसमे एक उजाड़ और रेतीला रास्ता था जिसमे मुख्य रूप से बठिंडा और फरीदकोट के वर्तमान जिले शामिल थे। गुरूजी ने 500 रूपए के भुगतान पर साईट (जो कीरतपुर साहिब से लगभग छ मील दूर थी) खरीदी। भूमिं में लोधीपुर, मियांपुर और सहोता गाँव शामिल थे। यहाँ माखोवाल के टीले पर गुरु तेग बहादुर ने कहा कि एक शहर का निर्माण किया जाना चाहिए। शहर का मूल नाम चक-नानकी था। हालाँकि बाद में गुरूजी ने शहर का नाम बदलकर आनंदपुर रख दिया। यहीं पर गुरुनानक खालसा का जन्म हुआ।

SIKH NINTH GURU TEG BAHADUR

गुरु तेज बहादुर जी की पूरब की यात्रा:

गुरूजी का पूरब वाले क्षेत्र में आने का केवल एक ही मकसद था- गुरुनानक जी के उपदेशों का प्रचार करना। उनकी इस यात्रा के स्थानों में बिहार, उत्तरप्रदेश, असम, बंगाल और वर्तमान बांग्लादेश शामिल थे। विभिन्न गांवों और कस्बों को आशीर्वाद देकर गुरूजी कुरुक्षेत्र की ओर बढ़ गये। सूर्य का ग्रहण होने वाला था, और मेला लगा हुआ था। जब गुरूजी वहां पहुंचे तो कुछ ब्राम्हणों ने गुरूजी को सुझाव दिया कि उन्हें पवित्र सरोवर में स्नान करना चाहिए ताकि वे शुद्ध रहें। गुरूजी ने मुस्कुराते हुए कहा “शरीर को धोने से शुद्धि की प्राप्ति नहीं होती क्योंकि प्रदूषित मन को पानी से नहीं धोया जा सकता है। यह केवल सर्वशक्तिमान ईश्वर का नाम है जो सभी पापों को धो सकता है और मन को शुद्धि प्रदान कर सकता है।”

गोबिंद राय का जन्म:

जब गुरु तेग बहादुर पूरब की यात्रा कर रहे थे तो उसी समय उनकी पत्नी माता गुजरी ने एक पुत्र को जन्म दिया, जिसका नाम गोबिंद राय रखा गया। गोबिंद राय का जन्म 5 जनवरी 1666 में बिहार के पटना शहर में हुआ था।

गुरु तेग बहादुर जी की पंजाब में वापसी:

1670 में पटना लौटकर गुरूजी ने अपने परिवार को पंजाब लौटने का निर्देश दिया। पटना में जिस जगह पर गोबिंद राय जी का जन्म हुआ था वहां आज एक पवित्र गुरुद्वारा स्थित है जिसका नाम- श्री पटना साहिब गुरुद्वारा, बिहार है। गोबिंद राय को आनंदपुर में शिवालिकों की तलहटी में ले जाया गया जहा से उनकी प्रारंभिक शिक्षाए शुरू हुई।

औरंगजेब द्वारा हिन्दू धर्म का विरोध और गुरु तेग बहादुर जी द्वारा नेतृत्व:

कुछ समय पश्चात् गुरूजी की ज़िन्दगी में एक नया मोड़ आया। एक बार मुगल सम्राट औरंगजेब ने हिन्दू मंदिरों को नष्ट करने का आदेश दिया और मूर्ति पूजा पर भी रोक लगा दी। एक मंदिर को मस्जिद में बदल दिया गया था और एक गाय का भी वध कर दिया गया था। औरंगजेब ने हिन्दूओ को उनकी नौकरियों से भी बर्खास्त कर दिया और मुसलमानों को नौकरी पर रखा। औरंगजेब ने कई गुरुद्वारों को भी नष्ट करने के आदेश दिए , बहुत से लोगों को इस्लाम धर्म में बदलने के लिए मजबूर किया गया। औरंगजेब ने कश्मीर के पंडितों को भी इस्लाम धर्म में बदलने के लिए मजबूर किया। इसके चलते कुछ पंडितों ने अमरनाथ जाने का फैसला किया और भगवान् शिव की दया का आवाहन किया। अमरनाथ की गुफा में एक पंडित ने अपने सपने में भगवान शिव को देखा जिन्होंने उन्हें सिखों के नौंवे गुरु, तेग बहादुर के पास जाने को कहा और उनकी मदद लेने को कहा। इसके बाद कुछ पंडित गुरु तेग बहादुर से मिलने आनंदपुर साहिब गये।औरंगजेब ने चतुरता से सोचा कि अगर वह कश्मीर के पूजनीय पंडितो को इस्लाम में बदल देगा तो उसके अनुयायिओं की सख्या बढ़ जाएगी। इससे डरकर सभी पंडितों ने गुरु तेग बहादुर से मदद का अनुरोध किया। गुरु तेग बहादुर जी ने स्वतंत्रता के अधिकारों के लिए खड़ा होने का फैसला किया और गुरूजी ने प्रतिनिधिमंडल को औरंगजेब को यह बताने के लिए कहा कि यदि वह गुरु तेग बहादुर को बदल सकते हैं तो वे ख़ुशी से धर्मान्तरण करेंगे।

गुरु तेग बहादुर जी की शहादत का सफ़र:

कुछ समय बाद गुरु तेग बहादुर जी को गिरफ्तार कर लिया गया। ऐसा लगता था कि उनके गिरफ्तारी के आदेश सम्राट औरंगजेब द्वारा जारी किये गये थे। गुरु तेगबहादुर दिल्ली में औरंगजेब के दरबार में स्वयं चलकर गए। वहां औरंगजेब ने उन्हें तरह-तरह के लालच दिए। किंतु बात नहीं बनी तो उन पर बहुत सारे जुल्म किए। उन्हें चार महीने तक हिरासत में रखा गया जहा। उन्हें कैद कर लिया गया, उनके साथ बहुत अत्याचार हुए और बाद में उन्हें लोहे के पिंजरे में डाल दिया गया। उनके दो शिष्यों को मारकर उन्हें डराने की कोशिश की, पर गुरु तेगबहादुर टस से मस नहीं हुए।

उन्होंने औरंगजेब को समझाया कि अगर तुम जबरदस्ती करके लोगों को इस्लाम धारण करने के लिए मजबूर कर रहे हो तो यह जान लो कि तुम खुद भी सच्चे मुसलमान नहीं हो, क्योंकि तुम्हारा धर्म भी यह शिक्षा नहीं देता कि किसी पर जुल्म किया जाए। औरंगजेब को यह सुनकर अपनी हार पर बहुत गुस्सा आया। उसने दिल्ली के चांदनी चौक पर गुरु साहिब के शीश को काटने का हुक्म दे दिया और 24 नवम्बर 1675 को गुरु साहिब ने हंसते-हंसते अपना शीश कटाकर बलिदान दे दिया। इसलिए गुरु तेगबहादुरजी की याद में उनके शहीदी स्थल पर एक गुरुद्वारा स‍ाहिब बना है, जिसका नाम गुरुद्वारा शीश गंज साहिब है। भाई जेता ने सिर को आनंदपुर साहिब में भेज दिया जहाँ गुरु गोबिंद जी द्वारा उनका अंतिम संस्कार किया गया। भाई लखी शाह गुरूजी के पार्थिव शरीर को अपने घर ले गये और वहां उनका दाह संस्कार किया। गुरु तेग बहादुर जी की शहादत ने औरंगजेब के धार्मिकता के मिथक को तोड़ दिया। इसके बाद कई पंडित सिख धर्म में बदल गये।

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