सिख धर्म के पांचवें गुरु श्री अर्जन देव जी का जीवन परिचय

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गुरु अर्जन देव जी सिखों के पांचवें गुरु थे। गुरु अर्जन देव जी का जन्म सन 1563 में पंजाब के गोइंदवाल नामक स्थान पर हुआ था। उनके पिताजी का नाम गुरु रामदास जी (सिखों के चौथे गुरु) व माता का नाम बीबी भानी जी (गुरु अमरदास जी की पुत्री) था। गुरु अर्जन देव जी ईश्वर की भक्ति, निस्वार्थ सेवा और सार्वभौमिक प्रेम के प्रतीक थे। 16 सितम्बर, 1581 को उन्हें सिखों के पांचवे गुरु के रूप में नियुक्त किया गया। गुरु अर्जन देव जी ने समाज के कल्याण के लिए पर्याप्त योगदान दिया। वे हमेशा उन सिद्धांतों के लिए खड़े रहते थे जिन पर वे विश्वास करते थे। उन्होंने स्वंय के जीवन का बलिदान किया और मानव जाति के इतिहास में एक अद्वितीय शहादत की प्राप्ति की। गुरु अर्जन देव जी शहीद होने वाले पहले सिख गुरु थे. गुरु अर्जन देव जी, गुरु रामदास जी के तीनो पुत्रों में, सबसे छोटे पुत्र थे। उनके बड़े भाई पृथ्वीचन्द सामाजिक और सांसारिक मामलों में बहुत ही चतुर थे।

गुरु रामदास जी की अपने पुत्र से उच्च अपेक्षाएं:

गुरु रामदास जी ने अपने सबसे छोटे पुत्र अर्जन में अद्वितीय और दैविक गुणों की कल्पना की थी। गुरु अर्जन देव जी ने बचपन से ही गुरु का नाम जपना शुरू कर दिया और शांति में डूब गये। गुरु अर्जन देव जी को बचपन से ही गुरु के पद के लिए सर्वश्रेष्ठ माना जाता था। एक दिन बचपन में अर्जन देव अपने दादाजी गुरु अमरदास जी के दिव्य सिंहासन पर रेंग कर चले गये और फिर वापस आ गये। यह देखकर गुरु अमरदास जी मुस्कुराये और कहा ‘मेरे पौत्र मेरे वंश को आगे बढाएँगे’। परन्तु बड़े होकर अर्जन हमेशा इस बात से वाकिफ थे कि यह मानवता की सेवा थी, न कि उनके वंश की. पूर्ववर्ती गुरुओं द्वारा आगामी गुरूवों को गुरुत्व प्रदान करने का कार्य मानवता की भलाई का था। इसे ध्यान में रखते हुए अर्जन देव जी हर वक़्त ध्यान और सेवा में डूबे रहते थे। लेकिन उनके भावनात्मक इरादे हमेशा उनके पिता गुरु रामदास जी के साथ स्पष्ट थे. उनके सबसे बड़े भाई, पृथ्वीचन्द, जो अपने दादा की भविष्यवाणी के परिणाम पर संदेह कर रहे थे, ने गुरु अर्जन के जीवन को बाधित करने के लिए कई साधनों का प्रयास किया.

सिखों के गुरु के रूप में नियुक्ति:

गुरु रामदास जी ने अपने पुत्र अर्जन देव को लाहौर में एक विवाह समारोह में शामिल होने के लिए भेजा। लेकिन इससे पहले गुरु रामदास जी अपने बड़े पुत्र पृथ्वीचन्द को भेजना चाहते थे. पर पृथ्वीचन्द ने जाने से इंकार कर दिया क्योंकि उन्हें डर था की उनकी अनुपस्थिति में अर्जन देव जी को सिखों का अगला गुरु बना दिया जायेगा। अर्जन देव जी ने अपने भाई के प्रतिकूल कार्यों के बावजूद अपने भाई के प्रति कोई आक्रोश नहीं दिखाया। गुरु अर्जन देव जी का जन्म शांति के सन्देश को बढ़ाने के लिए हुआ था। गुरु अर्जन देव मात्र 18 वर्ष की उम्र में ही सिखों के गुरु नियुक्त कर दिए गये थे क्योंकि उनमे सामान्य से अधिक ज्ञान था. उनका बेहद शांत स्वभाव था जिसमें परमार्थ की भावना कूट कूट कर भरी हुई थी।

माता गंगा से विवाह:

गुरु अर्जन देव जी ने 19 जून 1589 को माता गंगा से विवाह किया। माता गंगा भारत के पंजाब राज्य के फिल्लोर से 10 किलोमीटर पश्चिम में मउ गाँव के भाई कृष्णचन्द की पुत्री थी। यह गाँव अब बहुत विख्यात है क्योंकि यहाँ गुरु अर्जन देव जी के विवाह के पवित्र वस्त्र रखे गये हैं। वहाँ के लोगों ने गुरूजी की दिल से सेवा की और गुरूजी ने प्रसन्न होकर उन्हें आशीर्वाद दिया। हर वर्ष गुरु अर्जन देव जी और माता गंगा जी के विवाह के अवसर पर यहाँ तीन दिनों तक एक बड़ा मेला लगता है। इस उत्सव के अंतिम दिन, समापन समारोह से पहले गुरु साहिब के पवित्र कपड़ो को आम जनता को दिखाया जाता है।

हरमंदर साहिब का सम्पूर्ण निर्माण:

नए धर्म की मूल बातें बाबा नानक द्वारा परिभाषित की गयी थी और उनके तीन उत्तराधिकारियों द्वारा जमीनी कार्य किया गया था। गुरु अर्जन देव जी इसे एक ठोस मुकाम पर पहुँचाने की राह में निकल पड़े और उन्होंने उस स्थान के निर्माण को पूरा करने का कार्य किया. यहाँ उनके पिता ने अमृत की मिटटी की टंकी का निर्माण किया था।

“मै न तो हिन्दू हूँ न ही मुस्लिम” की सच्ची भावना में गुरुजी ने मियां मीर को (लाहौर के एक मुस्लिम संत) हरमंदर साहब, (वर्तमान स्वर्ण मंदिर) की आधारशिला रखने के लिए आमंत्रित किया। ईमारत के चारों ओर के दरवाजे सभी चार जातियों और हर धर्म की स्वीकृति को दर्शातें हैं। ईश्वर के घर की तरह, अमृतसर शहर का अस्तित्व भक्तों कि श्रद्धा, सुविधाओं और भव्यताओं के साथ आया।

आदि ग्रन्थ की पूर्णता:

पवित्र पुस्तक की तैयारी गुरु अर्जन देव जी की सबसे बड़ी उपलब्धि है। अपने दिमाग में तीन चीजों के साथ उन्होंने पवित्र ग्रन्थ, वर्तमान गुरु ग्रन्थ साहिब, का संकलन शुरू किया। और सबसे बढ़कर वे सिख धर्म की विश्वसनीयता को एक जातिविहीन और धर्मनिरपेक्ष समाज के रूप में स्थापित करना चाहते थे। गुरु अर्जन देव जी काव्यात्मक रहस्योदघाटन सबसे महान सौन्दर्य को दर्शाता है। गुरूजी की अन्य उपलब्धियों में करतारपुर में नए शहरों का निर्माण, तरण तारण की भव्यता के साथ टंकी का उद्धार और लाहौर में बावली का निर्माण शामिल है।

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सिख गुरुओं की विशाल लोकप्रियता:

पांचवे गुरु के समय के दौरान बाबा नानक के घर को भारी लोकप्रियता हासिल होना शुरू हो गयी। ऐसे दुखद समय में जब मुगलों ने जनता पर बर्बरतापूर्ण कार्यवाही को प्रचलित किया, लोगो के बीच गुरु का सन्देश एक लोकप्रिय गीत के रूप में छा गया। हिन्दू और मुस्लिम आबादी गुरु को श्रद्धांजलि देने के लिए भीड़ लगाये रखते थे। गुरु अर्जन देव जी के समय पंजाब में सिखों की आबादी भी काफी संख्या में बढ़ी और नवनिर्मित हरमंदर साहिब में गुरु के सत्संग में लोगों की भीड़ आने लगी. इस दौरान हजारों नए अनुयायी गुरु के सिख बन गये।

कट्टरपंथी मुसलमानों द्वारा गुरु के खिलाफ अफवाहें उड़ना:

गुरु अर्जन देव जी की इस लोकप्रियता में वृद्धि के कारण दिल्ली के मुग़ल दरबार में कट्टरपंथी मुसलमानों के बीच ईर्ष्या और गंभीर चिंता पैदा हो गयी. इन लोगों ने गुरु नानक देव जी के घर के प्रति शत्रुतापूर्वक व्यवहार करना शुरू कर दिया। मुग़ल नेता के दिमाग में गुरु के बारे में यह बहुत बड़ी शंका, चिंता और गलत संदेह, नानक के घर के दुश्मनों द्वारा बिठाए जा रहे थे। मुग़ल दरबार के नेताओं ने गुरु के बारे में गलत अफवाहें फैलाई. ये गलत अफवाहें इतनी ज्यादा हो गयीं कि मुग़ल बादशाह जहाँगीर पूरी तरह से उलझन में थे कि गुरु कोन है और इस दुनिया के लिए उनका क्या सन्देश है।

गुरु अर्जन देव जी को गिरफ्तार किया गया:

अकबर की मृत्यु के तुरंत बाद, मुस्लिम उलेमाओं ने प्रिंस सलीम के को सम्राट जहाँगीर के रूप में सिंहासन हासिल करने में मदद की। उनके साथ समझौता किया गया था कि जब वे सम्राट बनेंगे तो देश में शरीयत (रुढ़िवादी मुस्लिम कानून) को बहाल करेंगे। अकबर के पोते, खुसरो, एक नेक सोच वाले व्यक्ति थे। अकबर ने उसे राज्य के प्रमुख के रूप में नामित किया था। लेकिन मुस्लिम पादरियों के वर्चस्व ने यह आवश्यक कर दिया कि उन्हें अपने जीवन की रक्षा के लिए भागना पड़े। पंजाब से गुजरते समय उन्होंने तरण तारण में गुरु अर्जन देव जी के दर्शन किये और उनका आशीर्वाद माँगा।

खुसरो को बाद में पकड़ लिया गया और अँधा कर दिया गया। उसके तुरंत बाद ही जहाँगीर ने गुरु अर्जन देव जी को लाहौर बुला लिया। पूर्व-निर्धारित विचारों के साथ, जहाँगीर ने खुसरो के आश्रय के बारे में गुरु के स्पष्टीकरण से असंतोष दिखाया। उसने गुरूजी को एक विद्रोही के रूप में चिन्हित कर दिया और उन्हें मौत की सजा सुना दी। लेकिन पीर मियां मीर की सिफारिश पर उसने 2 लाख रूपए जुर्माना भरने की सजा सुनाई गई. इसके साथ ही गुरु ग्रन्थ साहिब के कुछ छंदों को मिटाने का आदेश दिया। परन्तु गुरु अर्जन देव जी ने इसे मानने से इंकार कर दिया। लाहौर के सिख जुर्माना भरना चाहते थे परन्तु गुरूजी ने अन्यायपूर्ण जुर्माना देने के किसी भी प्रयास से इंकार कर दिया।

गुरु अर्जन देव जी द्वारा करवाए गये महत्वपूर्ण कार्य:

  • पिछले सिख गुरुओं के भजनों को गुरु ग्रन्थ साहिब की नींव के रूप में संकलित किया
  • इसके अतिरिक्त गुरूजी ने श्री गुरु ग्रन्थ साहिब में कुल 2218 भजनों का योगदान दिया।
  • सुखमणि साहिब बानी- शांति के लिए प्रार्थना की
  • पहली बार सिख पवित्र पुस्तक, जिसे उस समय में आदि ग्रन्थ कहा जाता था, एक बड़ी उपलब्धि थी।
  • स्वर्ण मंदिर का निर्माण करवाया।
  • अमृतसर को उत्कृष्ट केंद्र के रूप में विकसित किया।
  • मसूद प्रणाली की शुरुआत करके सिख समाज की सरंचना को बढाया।

गुरु अर्जन देव जी ने ईश्वर का हुकुम स्वीकार किया:

गुरु जी को जेल में डाल दिया गया और अत्यधिक अत्याचार किया गया। उन्हें तेज धूप में बैठाया जाता था और उनके नग्न शरीर पर गरम पानी डाला जाता था। पीर मियां ने उनसे संपर्क किया और उनकी ओर से हस्तक्षेप करने की पेशकश की। कुछ लोग कहते हैं कि पीर मियां ने गुरूजी की सजा कम करने के लिए लाहौर शहर को ध्वस्त करने की पेशकश की, परन्तु गुरूजी ने उनकी मदद से इंकार कर दिया और कहा कि “ये सब ईश्वर की इच्छा से हो रहा है, मुझे इससे कोई तकलीफ नहीं है. क्योंकि गुरु नानक, भगवान के नाम के लिए तरसतें हैं”।

गुरु अर्जन जी का निधन 30 मई 1606 को हुआ था। उन्होंने रावी नदी की ठंडी लहरों में अपने तपते शरीर को ढक लिया और अपने स्वर्गीय निवास पहुंचे। गुरूजी ने दुनिया छोड़ने से पहले, अपने पुत्र हरगोबिन्द जी को सिखों के अगले गुरु के रूप में नामित किया।

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