जानिये ऋषि दधीचि के जीवन की कुछ अलौकिक गाथाएं

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दधीचि ऋषि का हिंदू धर्म में केंद्रीय चरित्र रहा है। इन्हें दधिचंथा या दधिंगा के नाम से भी जाना जाता है। दधीचि मुख्य रूप से अपने जीवन का त्याग करने के लिए जाने जाते हैं। इन्होंने देवताओं की सहायता के लिए अपनी हड्डियों से “वज्र” नामक हथियार बनाकर तत्क्षण उनको दान में दिया था। इस वज्र को बनाने के लिए उन्होंने अपने प्राणों का त्याग करने में तनिक भी देरी नहीं की थी। नागराज वृत्र द्वारा स्वर्ग से निष्कासित होने के बाद देवताओं को नागराज से युद्ध करने के लिए एक शक्तिशाली हथियार की आवश्यकता थी, यह हथियार ऋषि दधीचि की हड्डियों से बना वज्र था, जिसका उपयोग करके देवताओं ने असुर को हराकर पुनः स्वर्ग को प्राप्त किया।

संस्कृत में दध्यांच या दधिहंगा दो शब्दों दधि (दही) + एंक (भागों) का एक संयोजन है, जिसका अर्थ है “दही से शरीर के अंगों का बल लेना।” दधीचि नाम दधिंगा या दधिचांचा का अपभ्रंश रूप है, जैसा कि प्राचीन संस्कृत विद्वान पाणिनि ने अपने कार्य अष्टाध्यायी में बताया है।

वृत्र को पराजित करके देवताओं ने अकाल का उन्मूलन करने के लिए पानी का प्रवाह शुरू किया, जिससे कि जीवित प्राणियों को, जो असुरों के अन्याय का शिकार हुए थे, राहत मिल सके। ऋषि दधीचि ने अपने बलिदान के माध्यम द्वारा देवताओं को असुरों को हराने में मदद की। ऋषि दधीचि की इसी निस्वार्थता के कारण वह ऋषियों और हिंदू संतो के बीच अत्यंत श्रद्धा का पात्र बन गए। ऋषि दधीचि का यह बलिदान इस बात का प्रतीक है कि बुराई से रक्षा करने में यदि कोई त्याग करना पड़े तो, कभी पीछे नहीं हटना चाहिए। भारत का सर्वोच्च सैन्य पुरस्कार “परमवीर चक्र” भी ऋषि दधीचि के इसी बलिदान और वीरता का प्रतीक है, जो युद्ध में असाधारण साहस दिखाने वाले सैनिकों को मरणोपरांत दिया जाता है।

ऋषि दधीचि के सम्मुख भगवन शिव का प्रकट होना

ऋषि दधीचि भगवान शिव के बहुत बड़े भक्त थे। जब भगवान शिव अपनी पत्नी देवी शक्ति से अलग हो गए तो विरह की इस पीड़ा के दौरान वह एक ऋषि के रूप में एकांत में रहने के लिए जंगल चले गए। महाशिवरात्रि के वार्षिक उत्सव में भगवान शिव पहली बार ऋषि के रूप में अपने भक्तों के सामने प्रकट हुए, जिसमें ऋषि दधीचि और उनके शिष्य भी शामिल थे, जो उस समय भगवान शिव की प्रार्थना कर रहे थे। 

ऋषि दधीचि का परिवार एवं मंदिर

भगवत पुराण में ऋषि दधीचि को अथर्वण का पुत्र कहा गया है, इनकी माता का नाम चिति था। अथर्वण, अथर्ववेद के लेखक कहे जाते हैं, जो चारों वेदों में से एक है। चिति ऋषि कर्दम की पुत्री थी। ऋषि दधीचि एक ब्राह्मण वंश के थे, जो मुख्यता राजस्थान में पाया जाता है। ऋषि दधीचि की पत्नी का नाम स्वार्चा और पुत्र का नाम पिप्पलदा था। पिप्पलदा ने प्रसन्न उपनिषद की रचना की। ऋषि दधीचि ने अपना आश्रम मिसरिख, नैमिषारण्य के पास (जो कि उत्तर प्रदेश के लखनऊ शहर में स्थित है) में स्थापित किया था। नैमिषारण्य, सभी पुराणों में उनके आश्रम के स्थान के रूप में उद्धृत किया गया है और यह आज भी अस्तित्व में है। वर्तमान का साबरमती आश्रम (अहमदाबाद, गुजरात में स्थित है) प्राचीन काल में इनके आश्रमों में से एक था। प्राचीन भारत में ऋषि मुनि सामान्यतया लंबी दूरी की यात्रा तय किया करते थे। ऐसा माना जा सकता है कि उन्होंने कुछ समय तक साबरमती नदी के किनारे वास किया होगा और उसी दौरान उन्होंने यह आश्रम बनाया होगा।

दाहोद के विषय में भी एक प्रचलित किंवदन्ती यह है कि एक बार ऋषि दधीचि ने दाहोद में दूधमति नदी के तट पर ध्यान किया। दधिमती इनकी बहन का नाम था।जिनके नाम पर नागपुर के राजस्थान में “दधिमती माता मंदिर” के नाम से एक मंदिर स्थापित है, यह मंदिर चौथी शताब्दी से भी ज्यादा पुराना है। इसका नाम ऋग्वेद के पहले मंडल में मिलता है। साथ ही ऋग्वेद के विभिन्न सुक्तों में भी ऋषि दधीचि का उल्लेख मिलता है। माना जाता है कि ऋषि दधीचि ने दक्षिण भारत में प्रसिद्ध भजन “नारायण कवचम” की रचना की थी, जिसे शक्ति और शांति के लिए गाया जाता था।

दधीच ब्राह्मण, ऋषि दधीचि के वंशज माने जाते हैं। उनके देवता दधिमती हैं, जो महर्षि दधीचि की बहन थीं। 

ऋषि दधीचि के विषय में कई हिंदू किंवदंतियों भी हैं, जैसे कि कभी-कभी उन्हें घोड़े के सिर के रूप में भी चित्रित किया जाता है।

ऋषि दधीचि का अश्वशिरा (घोड़े के सिर वाला) रूप

ऋषि दधीचि के बारे में कहा जाता है कि वे ब्रह्मविद्या (मधु विद्या) नामक वैदिक कला के महान ज्ञाता थे। यह ब्रह्मविद्या, एक ऐसी विद्या है, जो अमरत्व प्राप्त कराने में सक्षम बनाती हैं। इसके कारण देवराज इंद्र ने महसूस किया कि उनका पद संकट में है, उनके अनुसार ऐसी शक्तियों का किसी नश्वर मनुष्य के हाथों में होना असुरक्षित था, विशेष रूप से ऋषि दधीचि समान ऐसे मनुष्य के पास, जिनके पास अत्यंत शक्ति और गुणों का भंडार है। देवराज इंद्र, अश्विन जुड़वा (औषधियों के देवता) के पूरी तरह खिलाफ थे क्योंकि वह ब्रह्म विद्या सीखना चाहते थे। इसी कारण देवराज इंद्र ने यह शपथ ली कि जो भी उन्हें ब्रह्मविद्या सिखाएगा, वह उनका सिर धड़ से काट देंगे। हालांकि अश्विनी जुड़वाँ देवता यह विद्या सीखना चाहते थे परंतु वे, ऋषि दधीचि को इंद्र की शक्तियों से बचाना भी चाहते थे इसलिए उन्होंने एक योजना तैयार की। वह जानते थे कि यदि उन्होंने यह विद्या सीखी तो देवराज इंद्र ऋषि दधीचि का सिर धड़ से अलग कर देंगे इसलिए उन्होंने योजना बंद होकर कार्य किया। पहले उन्होंने यह विद्या ऋषि दधीचि से सीखी, जिसके बाद देवराज इंद्र ने ऋषि दधीचि का सिर काट दिया।

अश्विनी जुड़वा देवताओं ने उनके इस कटे सिर को सुरक्षित बचा कर रखा और एक अश्व के सिर को उनके सिर के स्थान पर लगा दिया। यह देखकर देवराज इंद्र अत्यंत क्रोधित हो उठे और उन्होंने अश्व के सिर वाले ऋषि दधीचि का सिर पुनः काट दिया। इसके बाद अश्विन देवता ने ऋषि दधीचि का मूल सिर, जो उन्होंने बचा कर रखा था, इस घोड़े के सिर के स्थान पर स्थानांतरित कर दिया तथा मधु विद्या का प्रयोग करते हुए, जो उन्होंने ऋषि दधीचि से सीखी थी, ऋषि दधीचि को वापस जीवित कर दिया। यही कारण है कि ऋषि दधीचि को अश्वशिरा अर्थात घोड़े के सिर वाला भी कहा जाता है।

ऋषि दधीचि द्वारा कुशवा तथा इंद्रदेव को पराजित करना

एक बार ऋषि दधीचि और विष्णु भक्त राजा कुशवा के मध्य ब्राह्मणों में श्रेष्ठता  को लेकर विवाद छिड़ गया। धीरे-धीरे इस विवाद ने झगड़े का रूप ले लिया और यह इतना बढ़ गया कि ऋषि दधीचि ने राजा कुशवा पर प्रहार कर दिया, जिसके उत्तर में राजा कुशवा ने भी ऋषि दधीचि पर वज्र से प्रहार किया। जिसके फलस्वरूप ऋषि दधीचि घायल हो गए। उस समय शुक्राचार्य ने ऋषि दधीचि का इलाज किया। इसके बाद ऋषि दधीचि ने जाकर भगवान शिव की भारी तपस्या की और उनसे तीन वरदान मांगे –

  • वह कभी अपमानित नहीं होंगे
  • उनकी कभी हत्या नहीं की जा सकेगी
  • उनकी अस्थियाँ हीरे की तरह सख्त हो जायेंगी 

इसके बाद ऋषि दधीचि वापस लौट कर कुशवा से युद्ध किया और उन्हें पराजित कर दिया। राजा कुशवा, भगवान विष्णु के पास जाकर उनसे मदद मांगने लगे। तब भगवान विष्णु ने एक योजना के द्वारा इस समस्या का हल निकालने की कोशिश की। उन्होंने दधीचि के ऊपर एक त्रिशूल से हमला किया, जिसे देखकर भगवान विष्णु के अलावा अन्य सभी देवता भाग गए। इतना सब होने के बावजूद भी महर्षि दधीचि के मन में भगवान विष्णु के प्रति बहुत सम्मान की भावना थी इसी कारण जब देवताओं ने वृत्र के विरुद्ध युद्ध हेतु महर्षि दधीचि से मदद की गुहार लगाई और उनसे उनकी अस्थियों की मांग की, तो महर्षि दधीचि ने जैसे ही यह सुना, कि देवताओं को भगवान विष्णु ने भेजा है, वह तुरंत अपने अस्थियों का दान करने को तैयार हो गए।

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इंद्र और वृत्र – ऋषि दधीचि द्वारा दिए गए वज्र से किये गए युद्ध की कथा 

एक बार वृत्र नामक असुर के द्वारा देवराज इंद्र को देवलोक से बाहर निष्कासित कर दिया गया था। इस असुर को यह वरदान प्राप्त था कि इसकी हत्या किसी भी ज्ञात हथियार से नहीं की जा सकेगी, जिसके कारण यह अजेय बन गया था। इस असुर वृत्र ने संसार में उपस्थित समस्त जल को अपने और अपनी दानव सेना के उपयोग के लिए चुरा लिया। ऐसा करने के पीछे का कारण यह था, कि वह चाहता था कि संसार के अन्य सभी जीवित प्राणी भूख और प्यास से मरने लगें, जिससे कोई भी मानव या देवता उसे चुनौती देने के लिए जीवित ना रहे। इसी कारण देवराज इंद्र ने भी स्वर्ग लोक की पुनः प्राप्ति की सभी आशा खो दी थी, परंतु फिर भी वह भगवान विष्णु के पास पहुंचे ताकि उनसे कुछ सहायता ले सकें और स्वर्ग लोक पुनः प्राप्त कर सकें। भगवान विष्णु ने देवराज इंद्र से कहा कि केवल ऐसा हथियार जो हीरे के समान मजबूत और अस्थियों से बना हो, उसी से वृत्रासुर की मृत्यु संभव है। (उनका तात्पर्य ऋषि दधीचि की अस्थियों से बने वज्र से था।) इसके बाद इंद्रदेव और बाकी सभी देवता, ऋषि दधीचि, एक समय जिनके सिर को देवराज इंद्र ने धड़ से अलग कर दिया था, उन्हीं से वृत्रासुर को हराने के लिए मदद मांगने पहुंचे। ऋषि दधीचि ने देवताओं के अनुरोध को तुरंत मान लिया, परंतु उन्होंने कहा कि उनकी इच्छा है कि शरीर का त्याग करने से पहले वह पवित्र नदियों के तीर्थ स्थल पर जाना चाहते हैं। जिसके पश्चात देवराज इंद्र ने सभी पवित्र नदियों का जल को नैमिषारण्य में एकत्रित किया और इस प्रकार ऋषि की इच्छा को बिना समय नष्ट किए, पूरा कर दिया गया। तत्पश्चात ऋषि दधीचि घोर ध्यान की अवस्था में चले गए और अपने शरीर से उनके प्राणों को मुक्त कर दिया। उसके बाद कामधेनु के बछड़े ने महर्षि दधीचि के मृत शरीर को चाट कर अस्थियों में लगे मांस को हटाया और देवताओं ने उनकी रीढ़ की हड्डी से वज्र का निर्माण किया तथा बाकी अस्थियों से दूसरे अस्त्रों का निर्माण किया गया। उसके बाद इस वज्र का प्रयोग करते हुए देवराज इंद्र ने असुर वृत्रासुर का वध कर दिया और स्वर्ग लोक को पुनः प्राप्त किया। तत्पश्चात उन्होंने असुर द्वारा चुराए गए जल को पुनः संसार के सभी जीव जंतुओं के लिए मुक्त कर दिया। 

ऋषि दधीचि द्वारा अस्त्रों को घोल कर पी जाना

इस कहानी का एक दूसरा संस्करण भी मिलता है, जहां देवताओं ने ऋषि दधीचि से उनके अस्त्रों की सुरक्षा करने के लिए कहा था, क्योंकि उनके अस्त्र, असुरों के अस्त्रों की पुरातन कला से बिल्कुल भी मेल नहीं खा रहे थे, जिसका देवता पता लगाना चाहते थे। ऋषि दधीचि ने बहुत समय लंबे समय तक अस्त्रों की सुरक्षा की, परंतु फिर वह थक गए और उन्होंने उन अस्त्रों को पानी में घोलकर पी लिया। जब देवता वापस आए और उन्होंने उनसे अस्त्र लौटाने के लिए कहा, जिससे कि वह असुरों की सेना को जो वृत्रासुर के नेतृत्व में उनसे युद्ध कर रही थी, हरा सकें। महर्षि दधीचि ने उन्हें बताया कि अब उनके अस्त्र उनकी अस्थियों का हिस्सा बन चुके हैं। इसके बाद महर्षि दधीचि ने महसूस किया कि उनकी अस्थियां ही एकमात्र तरीका है, असुरों को हराने का। तब उन्होंने स्वेच्छा से अपने प्राण त्यागने की बात कही। अपनी तपस्या के बल पर उन्होंने अग्नि प्रज्वलित करके प्राण त्याग दिए। भगवान ब्रह्मा के निर्देश में ऋषि दधीचि की हड्डियों से बड़ी संख्या में अस्त्र बनाए गए, जिसमें वज्रयुद्ध भी शामिल था, जिसका निर्माण उनकी रीढ़ की हड्डी से किया गया था। इसके बाद देवताओं ने इन अस्त्रों द्वारा वृत्रासुर का वध कर दिया।

ऋषि दधीचि द्वारा दक्ष का विरोध

ऋषि दधीचि के साथ कई अन्य किंवदंतियां जुड़ी हुई हैं। ऋषि दधीचि के बारे में कहा जाता है कि जैसे ही उन्हें पता चला कि दक्ष ने उनके आराध्य भगवान शिव को यज्ञ पूजा में आमंत्रित नहीं किया है, तत्क्षण ही उन्होंने राजा दक्ष के यज्ञ का त्याग करके वहां से चले गए।

ऋषि दधीचि द्वारा परशुराम के प्रकोप से बालकों की रक्षा

देवी हिंगलाज का मंत्र भी ऋषि दधीचि द्वारा ही निर्मित किया गया है। परशुराम के प्रकोप से कुछ क्षत्रिय बालकों को बचाने के लिए ऋषि दधीचि ने उन्हें हिंगलाज माता के मंदिर के अंदर छुपा दिया और हिंगलाज की स्थापना की, जिसके कारण उन बच्चों की परशुराम के प्रकोप से रक्षा की जा सकी। 

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