सरलता से जानिये पतंजलि ‘अष्टांग योग’ के बारे में सब कुछ.

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अष्टांग योग (“योग के आठ अंग”) पतंजलि द्वारा योग का वर्गीकरण है जिसके अनुसार उन्होंने योग के आठ अंग बताए हैं। योग के आठ अंग हैं यम (संयम), नियम (पालन), आसन (योग आसन), प्राणायाम (सांस पर नियंत्रण), प्रत्याहार (इंद्रियों की निकासी), धरण (एकाग्रता), ध्यान (ध्यान) और समाधि (अवशोषण)। यह आठों अंग बाहरी से भीतरी की तरफ एक क्रम बनाते हैं। आजकल के आधुनिक समय में पतंजलि के द्वारा परिभाषित आठ अंगों योग के आठ अंगों में सबसे महत्वपूर्ण अंग “आसन (योग आसन)” को माना जाता है, जो केवल व्यक्ति को एक निश्चित मुद्रा में स्थिर एवं पूरी तरह से शांतिप्रद रहने को की तरफ इशारा करता है। पतंजलि के योग के आठ अंग व्यक्ति को नैतिक रूप से अनुशासित और उद्देश्य पूर्ण जीवन के लिए जरूरी नियमों को सिखाते हैं। जिनमें “आसन (योग आसन)” इन 8 अंगों में से केवल एक का निर्माण करते हैं। आइये इन आठ अंगों के बारे में एक-एक करके जानकारी प्राप्त करते हैं।

यम (संयम)

यम अर्थात संयम, हिंदू धर्म के नैतिक नियमों में से एक हैं और इसे नैतिक अनिवार्यता अर्थात “जो कार्य करना पूरी तरह से जरूरी है” के रूप में भी समझा जा सकता है। पतंजलि के योग सूत्र 2.30 में यह पांच यम निम्नलिखित प्रकार से सूचीबद्ध हैं।

  1. अहिंसा – अन्य सभी जीवित प्राणियों के प्रति अहिंसा का व्यवहार रखना अर्थात किसी भी जीवित प्राणी का अहित ना करना।
  2. सत्य- सदैव किसी भी स्थिति में सत्य का ही साथ देना एवं सत्य बोलना सत्य ही धर्म है।
  3. अस्तेय (चोरी ना करना) – किसी भी परिस्थिति में व्यक्ति को चोरी जैसा तुच्छ कार्य कभी नहीं करना चाहिए।
  4. ब्रह्मचर्य- व्यक्ति को वैवाहिक जीवन के प्रति सदैव निष्ठावान होना चाहिए। परस्त्री गमन ना करना गृहस्थ जीवन में ब्रह्मचार्य के समान है। साथ ही किसी भी परिस्थिति में विवाह से पूर्व ब्रह्मचर्य का पालन करना नहीं छोड़ना चाहिए।
  5. अपरिग्रह अर्थात लालच ना करना – लालच वह रोग है जो व्यक्ति से उसके चरित्र की शुद्धता को भंग करा देता है। लालच किसी भी रूप में हो चाहे वह भौतिक हो अथवा शारीरिक, सांसारिक हो अथवा धन संबंधी व्यक्ति को सदैव लालच से दूर रहना चाहिए।

पतंजलि द्वारा रचित पुस्तक पतंजलि-सूत्र के भाग २ में, यह इंगित है कि उपरोक्त प्रत्येक “आत्म-संयम” का गुण व्यक्ति की व्यक्तिगत वृद्धि में कैसे और क्यों मदद करता है। उदाहरण के लिए, पतंजलि की II.35 पद्य में कहा गया है कि अहिंसा को अपनाकर व्यक्ति शत्रुता का परित्याग कर देता है तथा साथ ही वह अपने अंदर दूसरों के प्रति क्रोध का भी त्याग करता है। यदि किसी राज्य में सभी लोग एक दूसरे के प्रति अहिंसा का व्यवहार अपना लें, तो राज्य आंतरिक और बाहरी रूप से सौहार्द की पूर्णता की ओर जाएगा।

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नियम (पालन)

पतंजलि के द्वारा बताए गए योग मार्ग का दूसरा घटक है – “नियम” जिसमें अच्छी आदतों के पालन करने की बात कही गई है। साधना पद के श्लोक 32 में “नियम (पालन)” कुछ इस प्रकार से सूचीबद्ध हैं –

  1. शौच – शौच का अर्थ है पवित्रता। वस्तुतः इसका पूरा मतलब है मन की पवित्रता वाणी और शरीर की पवित्रता। यहां शौच से तात्पर्य व्यक्ति की पवित्रता से है अर्थात जिस प्रकार शरीर के अंदर की गंदगी शौच के माध्यम से निकल जाती है उसी प्रकार व्यक्ति को अपने मन तथा वाणी की पवित्रता का भी पूरा ध्यान रखना चाहिए।
  2. संतोष- दूसरों से अपेक्षा करने के बजाए उनको उन्हीं के रूप में अपने मन में स्वीकृति दें। कोशिश करें कि आप सदैव आशावादी रहे। संतोष का अर्थ कुछ ना करने से नहीं, अपितु जो है उसमें तृप्त बने रहने से है।
  3. तप – यहां तप से तात्पर्य आत्म अनुशासन एवं दृढ़ता का है व्यक्ति को सदैव अनुशासित एवं मानसिक रूप से दृढ़ होना चाहिए तभी वह जीवन में अपने लक्ष्य को पूरा कर सकता है।
  4. स्वाध्याय- वेदों एवं पुराणों का अध्ययन, आत्म प्रतिबिंबन एवं स्वयं के विचारों का अध्ययन एवं आत्म निरीक्षण, यह सभी कार्य करना किसी भी व्यक्ति के लिए अनिवार्य है।
  5. ईश्वरप्रणिधान अर्थात ईश्वर का चिंतन करना – ईश्वर का चिंतन तथा आत्म चिंतन वास्तव में एक है और व्यक्ति को यह जरूर करना चाहिए।

पतंजलि-सूत्र में बताया गया है कि किस प्रकार यम के साथ नियम भी व्यक्ति के संपूर्ण विकास में कैसे और क्यों मदद करते हैं। उदाहरण के लिए पतंजलि के पद्य II.42 में, कहा गया है कि संतोष और दूसरों को स्वीकृति देने के माध्यम से उस स्थिति का जन्म होता है, जहां पर आंतरिक आनंद की प्राप्ति होती है तथा जिसके कारण बाहरी स्रोतों की लालसा समाप्त हो जाती है और व्यक्ति को आत्मज्ञान की प्राप्ति हो जाती हैं।

आसन (योग आसन)

आसन अर्थात एक ऐसी मुद्रा जिसमें व्यक्ति कुछ समय तक के लिए स्थिर, आरामदायक और गतिहीन स्थिति में रह सकता हो। योग सूत्र में किसी विशिष्ट प्रकार के आसन की सूची को नहीं लिखा गया है परंतु अरण्य योग सूत्र के श्लोक II.47 का अनुवाद के अनुसार “आसन वास्तव में अनंत पर ध्यान केंद्रित करते हुए विश्राम की अवस्था में रहना (वह भी एक ही समय में) है। इस प्रकार का अभ्यास शरीर को गलत दिशा में मोड़ने से रोकता है तथा ज्यादातर प्रकार के दर्द या बेचैनी इस आसन के माध्यम से दूर की जा सकती हैं। पतंजलि के सूत्र पर चर्चा करने वाले माध्यमिक ग्रंथों में कहा गया है कि बैठ कर ध्यान करने हेतु सही मुद्रा में बैठना आवश्यक है, जिसके अनुसार छाती, गर्दन और सिर एक सीध में होते हैं, जिससे रीढ़ की हड्डी को उचित सपोर्ट और बैलेंस प्राप्त होता है और रीढ़ की हड्डी से संबंधित दर्द आसन के माध्यम से धीरे-धीरे दूर हो जाते हैं।

योग सूत्र के साथ जुड़ी भाष्य के अनुसार स्वयं पतंजलि ने 12 बैठे ध्यान की मुद्राओं को सुझाया है, जो निम्नलिखित हैं –

  1. पद्मासन (कमल)
  2. वीरासन (नायक)
  3. भद्रासन (गौरवशाली)
  4. स्वास्तिक आसन (भाग्यशाली चिन्ह)
  5. दंडासन (लाठी)
  6. सोपासरायसन ( समर्थित)
  7. पयारणासन (शयन कक्ष)
  8. क्रौंच निषाद आसन (बैठा हुआ बगुला)
  9. उष्ट्राणीशासन ( बैठा हुआ ऊंट)
  10. हस्तिनाशासन (बैठा हुआ हाथी)
  11. समासनस्थासन (समान रूप से संतुलित
  12. शतृशासन (शुक्राणासन)

हठयोग प्रदीपिका में शिव के द्वारा 84 आसनों का उल्लेख मिलता है, इनमें से चार को सबसे महत्वपूर्ण बताए जाते हैं – सिद्धासन (निपुण), पद्मासन (कमल), सिम्हासन (सिंह) और भद्रासन (गौरवशाली)। इस प्रदीपिका में इन चार और ग्यारह अन्य आसनों की तकनीक का वर्णन किया गया है। आधुनिक युग में आसन पूर्ववर्ती रूप के विपरीत और अधिक प्रमुख तथा कई प्रकार में विभाजित हो गए हैं।

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प्राणायाम (सांस का नियंत्रण)

प्राणायाम का अर्थ सांसो में नियंत्रण है से होता है। वांछित आसन प्राप्त कर लेने के पश्चात प्राणायाम करने की सलाह देते हैं जिसमें नियमित रूप से सांसो को विनियमित करने का अभ्यास (अर्थात सांस लेना, रोककर रखना, सांस छोड़ना और पुनः स्वयं को विराम देना) किया जाता है। यह आसन कई प्रकार से किया जा सकता है। उदाहरण के लिए सांस लेना और फिर कुछ अवधि के लिए सांस छोड़ना, कुछ देर बाद पुनः सांस छोड़ना और फिर एक अवधि के लिए सांस अंदर की तरफ लेकर रखना। सांस लेने तथा छोड़ने की इस प्रक्रिया में समय के अंतराल को कम या ज्यादा भी किया जा सकता है। प्राणायाम के प्रमुख प्रकार हैं – कपालभाती, अनुलोम-विलोम।

प्रत्याहार (इंद्रियों का निरोध करना)

प्रतिहार, संस्कृत के 2 शब्दों का संयोजन है। शब्द प्रति (जिसका अर्थ “निरोधक” अथवा ‘विरुद्ध’) और अहार (जिसका अर्थ पास लाना होता है) प्रत्याहार किसी व्यक्ति की जागरूकता को कम करना है। यह बाह्य वस्तुओं से संवेदी अनुभव को धीरे धीरे समाप्त कर लेने की एक प्रक्रिया है। यह आत्म निष्कर्षण और संवेदनाओं के संकुचन का एक प्रकार है। हमारी पांच ज्ञानेन्द्रियाँ हैं – स्पर्श, सूंघना, स्वाद, देखना, सुनना। धीरे धीरे इनसे प्राप्त संवेदना को नज़रंदाज़ करना अथवा उसको विचारों का केंद्र न बनाना ही प्रत्याहार है। इन्द्रियों से प्राप्त सन्देश ही मन के विचारों का कारन बनते हैं। और मन को शांत करने पर ही ईश्वरत्व की प्राप्ति संभव है। वस्तुतः प्रत्याहार के अभ्यास के द्वारा बाहरी दुनिया से नियंत्रित होने की प्रवृत्ति पर नियंत्रण लगता है। यह व्यक्ति को ध्यान तथा आत्मज्ञान की तरफ प्रेरित करके भीतर की दुनिया में स्वतंत्रता तथा सहायता का अनुभव प्राप्त करवाती है।

धारणा (एकाग्रता)

धारणा का अर्थ है एकाग्रता, आत्मनिरीक्षण, ध्यान और मन की एकाग्रता। यहां मूल शब्द (धृ) है, जिसका अर्थ है “धारण करना, बनाए रखना, रखना”। योग के छठे अंग के रूप में धरण, एक व्यक्ति के मन, विषय या किसी के मन के विषय पर की गई एक विशेष पकड़ है। मन को एक मंत्र अथवा सांस / नाभि / जीभ / किसी भी जगह, या किसी वस्तु जिसे व्यक्ति देखना चाहता है या किसी व्यक्ति के दिमाग में एक अवधारणा / विचार पर तय होता है की तरफ का ध्यान केंद्रित करना है। जिसके द्वारा दिमाग इधर-उधर भटके बिना एकाग्र चित्त होकर एक विषय अथवा एक बिंदु पर विचार करता है।

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ध्यान

ध्यान का शाब्दिक अर्थ है “चिंतन, आतंरिक प्रतिबिंबन” और “गहन, अमूर्त ध्यान”। ध्यान अथवा विचार करना जिस पर ध्यान केंद्रित किया गया हो अथवा एकाग्र चित्त किया गया हो, ऐसी क्रिया दर्शाती है। यदि योग के छठे अंग में एक व्यक्ति किसी देवता पर ध्यान केंद्रित करता है, तो इस ध्यान को चिंतन कहा जाएगा। एकाग्रता एक वस्तु पर भी केंद्रित की जा सकती है। यदि ध्यान एक अवधारणा / विचार पर केंद्रित किया जाए तो वह ध्यान उस अवधारणा / विचार के सभी पहलुओं, रूपों और परिणामों पर विचार केंद्रित करेगी। ध्यान अभिन्न रूप से धारणा से संबंधित है। ध्यान तथा एकाग्रता को एक दूसरे से अलग करना मुश्किल है। जिस प्रकार से एकाग्रता मन की स्थिति होती है वही ध्यान मन की प्रक्रिया कहलाती है। ध्यान तथा धारणा में एक ही अंतर है कि ध्यानी अपने ध्यान के साथ सक्रिय रूप से जुड़ा हुआ होता है। पतंजलि सूत्र द्वारा चिंतन ( ध्यान ) को मन की प्रक्रिया के रूप में परिभाषित किया जाता है, जहाँ मन को किसी चीज़ पर स्थिर किया जाता है, और फिर “ज्ञान का एकरूप संशोधन” होता है। आदि शंकराचार्य द्वारा उनकी योगसूत्र पर की गई टिप्पणी में ध्यान को धारणा से अलग कहा गया है जिसमें ध्यान को योग की उस स्थिति से जोड़ा गया है जिसमें निरंतर विचार की धारा होती है जो एक ही वस्तु के लिए विभिन्न प्रकार के विचारों को जन्म दे सकते हैं। वही एकाग्रता का अर्थ वस्तु की विभिन्नता को ध्यान में रखने के बावजूद, केवल वस्तु पर केंद्रित होता है।शंकराचार्य, योग का उदाहरण देते हुए बताते हैं कि सुबह सूर्योदय के समय सूर्य की अपनी चमक, रंग और कक्षा में विभिन्नता होती है; परंतु ध्यान अवस्था में लीन योगी सूर्य के रंग, दीप्ति या अन्य संबंधित विचारों से बाधित हुए बिना, केवल सूर्य के अभिन्न स्वरुप पर चिंतन करता है।

समाधि

समाधि (संस्कृत: समाधि) का शाब्दिक अर्थ है “एक साथ रखना, जुड़ना, मिलाना, सामंजस्यपूर्ण संपूर्ण। समाधि, व्यक्ति के ध्यान से जुड़ा विषय है। ध्यान करते हुए योगी के लिए, ध्यान के कार्य और ध्यान के विषय के बीच योग के आठों अंग में कोई अंतर नहीं होता है। समाधि वह आध्यात्मिक स्थिति है जब किसी का मन जिस चीज पर विचार कर रहा होता है, उसमें इतना लीन हो जाता है कि मन अपनी अलग पहचान का एहसास खो देता है। विचारक, विचार प्रक्रिया और विचार के विषय – ये तीनो एक साथ मिल जाते हैं तथा इनमें कोई भेद नहीं रहता। इस तरह की अवस्था में पूरी तरह तल्लीन होकर आनंद की प्राप्ति करना ही समाधि कहलाती है।

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