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जानिये श्री रामकृष्ण परमहंस के शिष्य स्वामी रामकृष्णानंद ‘शशि’ का अलौकिक जीवन परिचय

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ramkrishna paramhansa
Table Of Contents
  1. स्वामी विवेकानंद द्वारा दक्षिण भारतवासियों से किया वादा
  2. शशिभूषण (स्वामी रामकृष्णानंद) एक संक्षिप्त परिचय
  3. श्री रामकृष्ण परमहंस और शशिभूषण की पहली भेंट
  4. शशिभूषण के विषय में श्री रामकृष्ण परमहंस की राय
  5. जब श्री रामकृष्ण परमहंस ने शशि को बताई कर्तव्य की उपयोगिता
  6. श्री रामकृष्ण परमहंस का अंतिम समय और शशि की गुरु भक्ति
  7. श्री रामकृष्ण परमहंस के दैहिक अवतार की अंतिम यात्रा
  8. गुरु की महासमाधि के पश्चात शशि द्वारा ली गई मठ की जिम्मेदारी
  9. गहरी भक्ति और गहरी बुद्धि का मेल
  10. स्वामी रामकृष्णानंद की सांसारिकता और संपत्ति मोह से दूरी
  11. स्वामी रामकृष्णानंद द्वारा की जाने वाली गुरु की पूजा देख विस्मय हुआ आगंतुक
  12. दर्शन की द्वैतवादी और अद्वैतवादी प्रणालियों के संदर्भ में स्वामी की राय
  13. स्वामी रामकृष्णानंद द्वारा वेदांत के लिए किए गए जबरदस्त कार्य
  14. स्वामी रामकृष्णानंद का अनुशासित जीवन
  15. अत्यंत कोमल एवं दयालुता से परिपूर्ण हृदय के स्वामी
  16. किस प्रकार स्वामी ने अपने अंतिम समय तक जारी रखा दूसरों की भलाई का कार्य
  17. ईसा मसीह के प्रति पुनर्जागृत होता प्रेम
  18. स्वामी रामकृष्णानंद का अंतिम बोध में प्रवेश

स्वामी विवेकानंद द्वारा दक्षिण भारतवासियों से किया वादा

जब स्वामी विवेकानंद भारत से दूर विदेश में कार्य करने में अत्यधिक व्यस्त थे, उस दौरान अचानक ही उन्होंने महसूस किया कि भारत में एक इससे भी ज्यादा महत्वपूर्ण कार्य उनकी प्रतीक्षा कर रहा है। राष्ट्र की आत्मा को उसके स्वयं के मूल्य की भावना के लिए जगाए जाना आवश्यक था। जीवन के भूले हुए मूल्यों को फिर से प्रकाश में लाना था। धर्म को एक ऐसी जीवित शक्ति बनाना था जो लोगों को मजबूत करे और उन्हें जीवन की पूर्णता का एहसास कराए। जब महान नेता स्वामी विवेकानंद मातृभूमि भारत लौटे और कोलंबो से अल्मोर्न तक अपनी विजयी यात्रा की, तो मद्रास शहर में उन्होंने सबसे पहले उत्सुक श्रोताओं को अपने अभियान की योजना के विषय में बताया। लोगों में श्री रामकृष्ण की शिक्षाओं के बारे में अधिक जानने के लिए बहुत उत्साह और सच्ची इच्छा थी। कुछ नागरिकों ने स्वामी विवेकानंद से अनुरोध किया कि वह कृपया अपने एक भाई-शिष्य को मद्रास में रहने के लिए भेज दें और एक मठ स्थापित करें जो स्वामी द्वारा उनके संबोधन में उल्लिखित धार्मिक शिक्षाओं और परोपकारी गतिविधियों का केंद्र बन जाएगा। इस अनुरोध को सुनकर स्वामी विवेकानंद ने कहा, “मैं आपके समक्ष एक ऐसे व्यक्ति को भेजूंगा जो दक्षिण के आपके सबसे रूढ़िवादी पुरुषों की तुलना में अधिक रूढ़िवादी होगा और साथ ही अपनी पूजा और ध्यान में अद्वितीय होगा।” दक्षिण भारत हमेशा से रूढ़िवादी हिंदू धर्म का गढ़ रहा है। बौद्ध धर्म के पतन के दिनों में अनेकों लोगों को शाश्वत धर्म में विश्वास खोना प्रारंभ कर दिया था, इस समय दक्षिण में अलवर, नयनमार और आचार्य जैसे ऋषियों ने धर्म को नई शक्ति दी। परंतु जब विदेशी आक्रमण हुए तो वह धर्म की प्रथा को भंग करने लगे, इस समय दक्षिण भारत ही वह स्थान था, जिसने धर्म की पवित्र वैदिक अग्नि की रक्षा की। परंपरा की निरंतरता को तोड़े बिना प्राचीन धर्म में नए जीवन का संचार करने के लिए, दक्षिण की इस विशेषता के पीछे यहां के ऋषियों की महान बौद्धिक उपलब्धियों, आदर्शों के प्रति अडिग भक्ति और रूपों के प्रति गहरी श्रद्धा का होना था। स्वामी रामकृष्णनन्द के पास ये सब कुछ था और इसके अतिरिक्त उनमें अत्यधिक दयालुता, सभी के प्रति अपार सहानुभूति और बच्चों के समान उनका स्वयं का स्वभाव था, जो आत्मा की आंतरिक शुद्धता को प्रदर्शित करता था।

शशिभूषण (स्वामी रामकृष्णानंद) एक संक्षिप्त परिचय

शशिभूषण चक्रवर्ती – यही वह नाम था जिसके द्वारा स्वामी रामकृष्णानंद अपने पूर्व-मठवासी दिनों में जाने जाते थे। ये वर्ष 1863 में बंगाल के हुगली जिले के एक रूढ़िवादी ब्राह्मण परिवार में पैदा हुए थे। उनके पिता, धार्मिक परंपराओं के एक सख्त पर्यवेक्षक और देवी माँ के एक भक्त उपासक थे। इनके जीवन का प्रारंभिक परीक्षण इन्हें इनके पिता के द्वारा प्राप्त हुआ। पिता द्वारा प्राप्त इस प्रारंभिक प्रशिक्षण के कारण ही इनके जीवन में प्रदर्शित उच्च चरित्र की नींव रखी। शशिभूषण स्कूल गए और सफलतापूर्वक स्कूल पाठ्यक्रम पूरा करने के बाद कॉलेज में प्रवेश किया। वह कॉलेज में एक मेधावी छात्र थे और उनके पसंदीदा विषय साहित्य (अंग्रेजी और संस्कृत दोनों), गणित और दर्शनशास्त्र थे। वह और उनके चचेरे भाई शरत चंद्र (बाद में स्वामी शारदानन्द) जो कि बाद में ब्रह्म समाज के प्रभाव में आ गए थे। शशि की ब्रह्मो नेता, केशव चंद्र सेन से अच्छी जान पहचान हो गई थी जिसके चलते उन्होंने अपने पुत्रों के लिए इनको निजी शिक्षक के रूप में नियुक्त किया। शशिभूषण और उनके चचेरे भाई शरत चंद्र, केशव चंद्र सेन के प्रभाव में शुरू किए गए एक ब्रह्म संगठन के सदस्य थे, और एसोसिएशन के कुछ साथी सदस्यों से श्री रामकृष्ण के विषय में बहुत कुछ सुन रखा था। संत की संगति का आनंद लेने के लिए, इस संघ के सदस्यों ने दक्षिणेश्वर में श्री रामकृष्ण जयंती मनाने का संकल्प लिया।

श्री रामकृष्ण परमहंस और शशिभूषण की पहली भेंट

श्री रामकृष्ण जयंती मनाने के लिए अक्टूबर, 1883 में एक निश्चित दिन तय किया गया। शशि और शरत अपने कुछ अन्य लड़के-साथियों के साथ गुरु को देखने की इच्छा लिए दक्षिणेश्वर पहुंच गए। श्री रामकृष्ण परमहंस ने मुस्कुराते हुए उनका स्वागत किया और आध्यात्मिक जीवन में त्याग की उपयोगिता से जुड़े विषय में उनके साथ गर्मजोशी से वार्तालाप करने लगे। शशि इस समय एफ.ए. कक्षा में पढ़ रहे थे जबकि उनके अन्य साथी मैट्रिक की तैयारी कर रहे थे। चूंकि शशि अपने समूह में सबसे बड़े थे, इसी कारण बातचीत करते समय उन्हें मुख्य रूप से संबोधित किया गया। श्री राम कृष्ण ने बातचीत के दौरान उनसे पूछा, “उन्हें ईश्वर के किस रूप में आस्था है अर्थात क्या वह ईश्वर को रूप से मानते हैं या बिना रूप के।” इन्होंने बड़ी ही स्पष्टता के साथ उत्तर दिया कि, “क्योंकि इन्होंने ईश्वर के अस्तित्व के विषय में कुछ भी ज्ञात नहीं है इसलिए वह इस विषय में कुछ भी बोलने में असमर्थ हैं।” उनके इस उत्तर को सुनकर गुरु अत्यंत प्रसन्न हुए। इधर शशि और शरद भी श्री रामकृष्ण के व्यक्तित्व से अत्यंत प्रभावित थे‌।

शशिभूषण के विषय में श्री रामकृष्ण परमहंस की राय

शशि और शरत के बारे में श्री रामकृष्ण परमहंस कहा करते थे कि वे दोनों पूर्व जन्म में ईसा मसीह के अनुयायी थे। वे जब्दी के पुत्र याकूब और उसके भाई योहन थे, जिनका उल्लेख अक्सर केवल मुख्य प्रेरित शमौन पतरस के बाद आता था? हालाँकि ऐसा होना संभव भी हो सकता था, ऐसा बाद में होने वाली घटनाओं से पता चला। जब दोनों चचेरे भाई शशि और शरत अपने गुरु के नाम पर स्थापित महान परोपकारी संगठन के दो मजबूत स्तंभ बने। हालांकि शशि एक मेधावी छात्र थे, लेकिन धीरे-धीरे कॉलेज के पाठ्यक्रम में उनकी रुचि कम होने लगी थी। एक दृष्टि से देखा जाए तो यह हानि थी परंतु दूसरे दृष्टिकोण में यह एक महान उपलब्धि होने जा रही थी। धीरे-धीरे शशि की आत्मा आध्यात्मिक जीवन की ओर प्रवेश करने के लिए आगे बढ़ती जा रही थी इनके तीव्र बुद्धि, मजबूत काया और स्थिर चरित्र ईश्वर-प्राप्ति के एक भव्य विषय के इर्द-गिर्द केन्द्रित होने लगा था।

जब श्री रामकृष्ण परमहंस ने शशि को बताई कर्तव्य की उपयोगिता

एक दिन दक्षिणेश्वर में कुछ ऐसा हुआ कि शशि कुछ फ़ारसी पुस्तकों का अध्ययन करने में व्यस्त थे, मूल रूप से सुआ कवियों को पढ़ने में। वे अपने अध्ययन में इतने लीन थे कि गुरु के दो बार पुकारने पर भी उन्हें सुनाई नहीं दिया, तीसरी बार में जब उन्होंने गुरु की आवाज सुनी तो गुरु ने उनसे पूछा कि वह क्या करने में इतने व्यस्त थे? उन्होंने बताया कि वह अपनी पुस्तकों के अध्ययन में लगे थे। यह सुनकर श्री रामकृष्ण परमहंस ने उनसे कहा, “यदि आप अपने अध्ययन के लिए अपने कर्तव्यों को भूल जाते हैं तो यह भक्ति को खोने के समान है।” उनकी बातें सुनकर शशि समझ गए। उन्होंने अपनी फारसी पुस्तकों को उसी समय गंगा नदी में प्रवाहित कर दिया। वह समझ चुके थे कि पुस्तक से मिलने वाले ज्ञान की उपयोगिता उनके जीवन में अब नहीं बची है।

श्री रामकृष्ण परमहंस का अंतिम समय और शशि की गुरु भक्ति

शशि बी.ए. फाइनल में आ चुके थे, परीक्षाएं सिर पर थी। परंतु उसी समय अचानक श्री रामकृष्ण, शिवपुर उद्यान भवन में अचानक बीमार पड़ गए‌। इस कठिन समय में शशि को अपनी पढ़ाई और गुरु के प्रति सेवा के बीच निर्णय लेना था। हालांकि उनके लिए यह निर्णय इतना कठिन साबित नहीं हुआ क्योंकि उन्होंने निसंकोच अपने संभावित अध्ययन के भविष्य का त्याग करते हुए अपने मन, शरीर और आत्मा से गुरु की सेवा करने का निश्चय किया। वह अन्य भाई-शिष्यों के साथ दिन-रात गुरु की सेवा करने में लग गए। शशि सेवा की प्रतिमूर्ति थे। गुरु के प्रति उनकी भक्ति अद्वितीय थी। अन्य शिष्यों ने भी गुरु की सेवा में अपना सर्वश्रेष्ठ दिया। लेकिन शशि की सेवा का स्तर उन सब में विशिष्ट था। गुरु की सेवा करते समय उन्होंने अपने आराम, खाने पीने से जुड़े सभी विचारों का त्याग कर केवल एक ही विचार के विषय में चिंतन किया कि किस प्रकार वह अपने गुरु की पीड़ा को कम कर सकते हैं। गुरु की सेवा ही उनके जीवन की एकमात्र चिंता थी। उनका विचार था कि इससे उन्हें वह सब कुछ मिलेगा जो उन्हें आध्यात्मिक जीवन से मिलने की आशा है। उस समय उन्हें देखने वालों ने उनकी अथक ऊर्जा और धीरज की अद्भुत शक्ति पर आश्चर्य व्यक्त किया। हालांकि वह शारीरिक रूप से मजबूत थे परंतु शारीरिक मजबूती से भी अधिक मजबूत उनकी इच्छाशक्ति थी जिसमें गुरु के प्रति इतनी अधिक श्रद्धा और भक्ति थी कि वे लगातार बिना थके गुरु की सेवा किए जा रहे थे।

श्री रामकृष्ण परमहंस के दैहिक अवतार की अंतिम यात्रा

गुरु के पार्थिव अस्तित्व के अंतिम क्षण तक, शशि उनकी यथासंभव सेवा करने के अपने उत्साह में अडिग थे। श्री रामकृष्ण की अंतिम यात्रा के पहले कुछ समय के लिए वह उन तकियों के पास बैठ गए जिनके सहारे गुरु लेटे थे। जब गुरु ने अपने प्राण त्यागे तो कई शिष्यों को तो यह पता तक नहीं चला कि गुरु ने प्राण त्याग दिए हैं, उन्हें लगा कि शायद गुरु ने समाधि ली हुई है, जो वह सामान्य तौर पर कई बार लिया करते थे। परंतु जब डॉक्टरों ने अच्छे से जांच पड़ताल कर ली और घोषणा कर दी कि गुरु इस धरती का त्याग कर चुके हैं तो सभी शिष्यों के बीच दुख की लहर दौड़ गई। तत्पश्चात गुरु के पार्थिव शरीर को घाट पर ले जाया गया और शिष्यों के बीच उनका अंतिम संस्कार किया गया। जब गुरु के पार्थिव शरीर की राख में बनने वाले लपटें बुझ गई तो शशि ने उन पवित्र अवशेषों को इकट्ठा किया।

गुरु की महासमाधि के पश्चात शशि द्वारा ली गई मठ की जिम्मेदारी

फिर आया सर्वोच्च अवसाद का दौर, जो शिष्य गुरु के बच्चों के समान थे, वे बारानागोर में नव स्थापित मठ में दिन-रात इकट्ठे होते थे। उनके शब्द, उनके साथ बिताई गई वर्षों की याद दिलाते थे; शिष्यों को गुरु के ही विचार आते, वे उन्हीं की उपासना करने में लगे रहते और उन्हीं के नाम पर अपना जीवन व्यतीत करने लग गए थे। इन शिष्यों में कई तो संपन्न परिवारों से संबंध रखते थे। परंतु गुरु के यूं चले जाने के बाद वे सभी खुद को बहुत असहज पा रहे थे। गुरु के प्रति उनकी भक्ति और समर्पण ही उन्हें गुरु से जोड़ कर रख रहा था। ऐसे समय में शशि ने बहुत बड़ी जिम्मेदारी बिना किसी के कहे उठा ली वह अपने मठ के इन साथियों की देखभाल करने लगे‌ इनके जीवन की दिनचर्या को विनियमित करने लगे। उन्हें ध्यान से उठाकर भोजन करवाने से लेकर शशि उन्हें बलपूर्वक आराम करने के लिए भेजते, वह इस बात का पूरा ध्यान रखना चाहते थे कि गुरु के किसी भी शिष्य को कोई तकलीफ ना हो। मठ के अन्य शिष्य इस बात के प्रति बिल्कुल उदासीन हो गए थे कि उनका शरीर जीवित हैं अथवा सर्वोच्च की गहन खोज में चला गया, परंतु शशि ने इस बात का ध्यान रखा कि उनके भाई-शिष्यों को वास्तव में भुखमरी का सामना न करना पड़े। मठ के खर्चों को पूरा करने के लिए शशि ने मठ-भाइयों से कहा “तुम बस अपनी साधना को अविभाजित ध्यान के साथ जारी रखो। आपको किसी और चीज के लिए परेशान होने की जरूरत नहीं है। मैं आप पर किसी भी प्रकार की कठिनाई को आने नहीं दूंगा” स्वामी विवेकानंद ने कई वर्षों बाद इन धन्य दिनों को याद करते हुए स्वामी रामकृष्णानंद के संदर्भ में कहा, “शशि के रूप में हमने अपने प्रति इतनी दृढ़ता पाई! वह हमारे लिए मां के समान थे। यह वह थे जिन्होने हमारे भोजन का प्रबंधन किया। हम लोग सुबह तीन बजे उठ जाते थे। फिर हम सब, स्नान के बाद, पूजा कक्ष में जाते और जप और ध्यान में खो जाते। एक समय ऐसा भी आता था जब ध्यान दोपहर के चार या पांच बजे तक चलता था। शशि हमारे लिए भोजन की व्यवस्था करते और कभी-कभी तो वह बलपूर्वक हमें ध्यान से बाहर निकाल कर भोजन करवाते। मठ के शिष्यों में से कई लोगों के माता-पिता ने आकर उन्हें मना कर वापस घर ले जाने की बहुत कोशिश की, परंतु कोई भी जाने को वापस तैयार नहीं था। शशि की ऐसी हालत को देखकर उनके पिता आए। उन्होंने शशि को बहुत समझाया, उन पर नाराज भी हुए, परंतु शशि ने वापस जाने से साफ मना कर दिया।

गहरी भक्ति और गहरी बुद्धि का मेल

गहरी भक्ति और गहरी बुद्धि का मेल बहुत दुर्लभ है। लेकिन दक्षिण भारत में काम करने के लिए इस प्रकार की दुर्लभ बुद्धि की आवश्यकता थी और रामकृष्णानंद इस दुर्लभ बुद्धि के स्वामी थे। श्री रामकृष्ण मिशन का कार्य दक्षिण भारत में अब एक महान इमारत के रूप में खड़ा था, जो हजारों लोगों को आश्रय दे रहा था, यह वह लोग थे जिनकी धर्म के प्रति गहन आस्था थी दक्षिण भारत में इस मिशन का कार्य कई जिलों तक फैला हुआ जो विभिन्न केंद्रों द्वारा किया जाता था इन सभी की उत्पत्ति स्वामी रामकृष्णानंद के द्वारा की गई थी। मुख्य कार्य सदैव ही कठिनाइयों से भरा होता है। बेघर, अकेले और भोजनहीन, कार्यकर्ताओं को कड़ी मेहनत करनी पड़ती है; कई बार अत्यंत निराशाजनक और हतोत्साहित करने वाली स्थितियों का सामना करना पड़ता है जिसके लिए धैर्य रखना सबसे जरूरी माना जाता है। परंतु ऐसे कठिन समय में भी ईश्वर सदैव इनके साथ होते हैं।

स्वामी रामकृष्णानंद की सांसारिकता और संपत्ति मोह से दूरी

स्वामी रामकृष्णानंद 1897 में मद्रास पहुंचे। पहले वे “आइस हाउस” के पास एक छोटी सी इमारत में रुके, परंतु कुछ समय बाद उन्हें उस इमारत को छोड़ दूसरे कमरों में जाकर रहना पड़ा क्योंकि उस इमारत को इमारत के मालिकों ने नीलाम कर दिया था ऐसी स्थिति में स्वामी रामकृष्णानंद व्यक्तिगत असुविधा होने के बावजूद भी वहां रहते रहे। इस संबंध में एक घटना घटी जिसने दिखाया कि कैसे स्वामी रामकृष्णानंद ऐसी किसी भी चीज से दूर रहते जिसमें से सांसारिकता की बू आती हो। जब आइस हाउस की नीलामी की गई, तो भक्तों की बहुत इच्छा थी कि यदि संभव हो तो उनके कुछ मित्र इसे खरीद लें, ताकि स्वामी रामकृष्णानंद को असुविधा न हो और उनका काम सुचारू रूप से चल सके। जैसे-जैसे नीलामी आगे बढ़ रही थी, स्वामी इकट्ठी भीड़ से दूर एक खाली बेंच पर परिसर के एक दूर छोर पर बेफिक्र बैठे थे। एक भक्त बड़ी उत्सुकता से बोली देख रहा था और समय-समय पर स्वामी के पास जाकर उन्हें बता रहा था कि यह कैसे आगे बढ़ रहा है। स्वामी ने उसे देखा और कहा: “आप इसकी चिंता क्यों करते हैं? हमें क्या परवाह है कि कौन खरीदता है या बेचता है? मेरी इच्छा-सूची कम है। मुझे श्री गुरु महाराज के लिए एक छोटा सा कमरा चाहिए। मैं कहीं भी रह सकता हूं और उनका ध्यान करने में अपना समय बिता सकता हूं।” वास्तव में स्वामी अपनी संपूर्ण जीवनपर्यंत इसी स्वभाव के थे चाहे उन्हें जीवन में कितना अधिक सम्मान प्राप्त हुआ हो परंतु वे सदैव धरती से जुड़े रहे।

स्वामी रामकृष्णानंद द्वारा की जाने वाली गुरु की पूजा देख विस्मय हुआ आगंतुक

सन 1907 में शहर के उपनगर में एक छोटी सी जगह में एक घर के भीतर मठ के लिए स्थान बनाया गया। यह घर एक मंजिला था, जिसमें 4 कमरे एक विशाल हॉल, रसोई और आउटहाउस शामिल थे। यह देख स्वामी रामकृष्ण आनंद को अत्यधिक प्रसन्नता हुई कि उन्हें आखिरकार एक ऐसा स्थान प्राप्त हो गया जहां वे अपने गुरु की पूजा निर्विघ्न रुप से कर सकते थे। उन्होंने कहा: “श्री रामकृष्ण के रहने के लिए यह एक अच्छा घर है। यह महसूस करते हुए कि वे इसमें रहते हैं, हमें इसे बहुत साफ और बहुत शुद्ध रखना चाहिए। हमें इस बात का ध्यान रखना चाहिए कि कील या किसी अन्य तरीके से दीवारों को विकृत न करें।” स्वामी रामकृष्णानंद द्वारा की गई गुरु की पूजा बहुत ही अद्भुत थी। एक आध्यात्मिक आकांक्षी भगवान की मूर्त उपस्थिति का अनुभव करने के लिए तरसता है। लेकिन स्वामी रामकृष्णानंद के साथ यह पूरी तरह से अलग बात थी। उन्होंने इतनी स्पष्ट रूप से भगवान की उपस्थिति को महसूस किया कि उनके मन में इसके लिए किसी भी लालसा के लिए कोई जगह नहीं थी। वे तो मात्र गुरु की सेवा करना चाहते थे, वह भी बिल्कुल उसी तरह जैसे गुरु के भौतिक शरीर में रहते हुए वह किया करते थे। एक बार एक सज्जन, जो उस समय सरकारी सेवा में सर्वोच्च पद पर थे, को स्वामी रामकृष्णानंद को श्रद्धांजलि अर्पित करने के लिए मठ में बुलाया। स्वामी, सुबह की पूजा समाप्त करने के बाद, उस समय गुरु के चित्र को पंखा कर रहे थे, जो वह कुछ घंटों या उससे अधिक समय तक के लिए किया करते थे, साथ ही भगवानों के नामों का उच्चारण भी करते थे जैसे कि शिव गुरु, सत गुरु, सनातन गुरु, परम गुरु, इत्यादि। ऐसे समय में स्वामी का चेहरा भावों से लाल हो जाता था और उनका प्रतिबिंब अत्यंत अलौकिक और प्रभावशाली दिखाई देता था। इस दृष्य ने आगंतुक को इतना अधिक विस्मय और श्रद्धा से प्रभावित कर दिया कि वह स्वामी के सामने कुछ भी नहीं कर सका और घर लौट आया।

दर्शन की द्वैतवादी और अद्वैतवादी प्रणालियों के संदर्भ में स्वामी की राय

दर्शन की द्वैतवादी और अद्वैतवादी प्रणालियों के संदर्भ में उन्होंने एक बार टिप्पणी की थी: “द्वैतवादी पद्धति में भोग ही आदर्श है; अद्वैतवादी पद्धति में स्वतंत्रता आदर्श है। द्वैतवादी पद्धति में प्रेमी को अंत में अपनी प्रेयसी मिल जाती है, और अद्वैतवादी पद्धति में दास स्वामी बन जाता है। दोनों ही उत्कर्ष हैं। किसी को भी आदर्श से दूसरे आदर्श पर जाने की कोई आवश्यकता नहीं है।” “विज्ञान बाहरी दुनिया में मनुष्य का संघर्ष है। जबकि धर्म, आंतरिक दुनिया में मनुष्य का संघर्ष है,” ऐसा उन्होंने एक बार बातचीत के दौरान कहा था। विज्ञान मनुष्य को बाहरी ब्रह्मांड में सत्य के लिए संघर्ष करने के लिए मजबूर करता है और धर्म उसे आंतरिक ब्रह्मांड में सत्य के लिए संघर्ष करने के लिए मजबूर करता है। दोनों संघर्ष अत्यंत कठिन होते हैं इस बात में कोई भी संदेह नहीं लेकिन एक में सफलता मिलने पर अंत होता है और दूसरे में असफलता प्राप्त होने पर अंत होता है यही इन दोनों के बीच अंतर है धर्म जब शुरू होता है विज्ञान वहां खत्म हो जाता है हालांकि व्यक्तिगत रूप से स्वामी कृष्णानंद को गणित से बहुत अधिक लगाव था।

स्वामी रामकृष्णानंद द्वारा वेदांत के लिए किए गए जबरदस्त कार्य

अपनी शारीरिक जरूरतों की परवाह किए बिना, व्यक्तिगत जरूरतों के प्रति बिल्कुल उदासीन, स्वामी रामकृष्णानंद ने पूरी श्रद्धा और भक्ति से गुरु के संदेशों को फैलाने और वेदांत के लिए जबरदस्त काम किया। सप्ताह के कुछ दिनों में उन्हें दो या तीन बार से अधिक व्याख्यान भी देना पड़ता था। उनकी कक्षाएं शहर के विभिन्न हिस्सों में बिखरी हुई थीं और उनमें से कई के लिए उन्हें लंबे समय तक पैदल जाना पड़ता था। कभी-कभी वह काफी थके हुए मठ में लौटते थे, थकावट के कारण उनके अंदर भोजन बनाने की ऊर्जा भी बहुत कम होती थी। इस कारण कई बार तो वह रात में केवल एक रोटी के टुकड़े को खाकर भी अपनी भूख को शांत कर लिया करते थे। सामान्य जनों को यह देखकर अत्यंत आश्चर्य होता कि स्वामी रामकृष्णानंद किस प्रकार इतने अधिक तनाव और इतनी व्यस्त दिनचर्या को सहन कर पाते हैं। उनमें से कईयों का मानना था कि शायद इसका रहस्य प्रभु के प्रति पूर्ण आत्मसमर्पण हैं, जो बहुत कम लोगों के अंदर पाया जाता है। एक बार उन्होंने कहा था: “यह शरीर केवल एक यंत्र है, एक निष्क्रिय यंत्र है, और यंत्र का वास्तव में अपना कोई अस्तित्व नहीं है, क्योंकि यह पूरी तरह से इसका उपयोग करने वाले पर निर्भर है। मान लीजिए यदि एक कलम सचेत होती और वह कहती कि मैंने सैकड़ों पत्र लिखे तो यह मिथ्या कथन होता क्योंकि वास्तव में कलम ने कुछ नहीं किया। पत्र तो उसने लिखें, जिसने इस कलम को हाथों में धारण किया। इसलिए, क्योंकि हम सचेत हैं, हमें लगता है कि हम ये सभी कार्य कर रहे हैं, जबकि वास्तव में हम एक उच्च शक्ति के हाथों में उसी कलम के समान हैं। इतना ही नहीं कक्षाएं लेते समय या व्याख्यान देते समय भी उन्होंने खुद को कभी भी एक श्रेष्ठ व्यक्ति के रूप में नहीं दिखाया, जिसमें दूसरों को पढ़ाने का अधिकार हो। वह स्वयं को सदैव प्रभु का विनम्र सेवक मानतें थे। कभी-कभी व्याख्यान देने के बाद जब वे मठ लौट कर वापस आते तो स्वयं को आत्म दंड देते, जिसके पीछे का कारण वह यह बताया करते थे कि वह ईश्वर से प्रार्थना करते हैं कि ईश्वर उन्हें गुरु के प्रति ईमानदार रहने में मदद करें। साथ ही व्याख्यान कार्य करने के कारण उनके भीतर कभी भी अहंकार की भावना का जन्म ना हो।
यदि किसी कारण से उनकी किसी कक्षा में एक भी विद्यार्थी नहीं आता था, तब भी वह हमेशा की तरह खाली कमरे में जाकर अपना प्रवचन देते अथवा कक्षा के लिए निर्धारित की गई अवधि के दौरान कक्षा में रहकर ध्यान करके अपना समय बिताते। जब उनसे कभी इन असामान्य कार्यों को करने का कारण पूछा जाता तो वह कहते कि “मैं यहाँ दूसरों को सिखाने नहीं आया हूँ। यह काम मेरे लिए एक मन्नत के समान है और मेरी कक्षा में कोई आए या न आए, मैं अपने कार्य को पूरा करना सही समझता हूं। स्वामी का कार्य केवल मद्रास शहर तक ही सीमित नहीं था, बल्कि यह पूरे प्रेसीडेंसी में फैल गया। इन गतिविधियों में सबसे महत्वपूर्ण मैसूर राज्य में उनके काम से संबंधित है। जो लोग स्वामी विवेकानंद के जीवन से परिचित थे, वे जानते थे कि अपनी यात्रा के दिनों में स्वामी विवेकानंद ने मैसूर में दीवान के अतिथि के रूप में लगभग एक महीने का समय बिताया था। उस समय स्वामी रामकृष्णानंद तत्कालीन मबारजा के संपर्क में आए और जिसका उनके ऊपर गहरा प्रभाव पड़ा।

स्वामी रामकृष्णानंद का अनुशासित जीवन

स्वामी रामकृष्णानंद का अपना जीवन अत्यंत अनुशासित था। वह अपनी आदतों के प्रति बहुत नियमित और समय के पाबंद थे। वह किसी भी परिस्थिति में अपने स्वयं के लगाए गए दैनिक कर्तव्यों का पालन अवश्य करते थे। एक नियम के रूप में वे प्रतिदिन अपने दिन की शुरुआत गीता और विष्णु-सहस्त्रनाम पढ़कर दिन ही किया करते थे। एक बार स्वामी रामकृष्णानंद ने दक्षिण भारत के तीर्थों की यात्रा करते समय, स्वामी प्रेमानंद के साथ पूरी रात मठ के बाहर गुजारी। वह एक ऐसी रात थी जब स्वामी रामकृष्णानंद के पास गीता और विष्णु-सहस्त्रनाम नहीं थे। जब उन्हें इसका ज्ञान हुआ तो उन्होंन फौरन किसी को उन दो पुस्तकों की प्रतियां लेने के लिए भेजा ताकि वह अगली सुबह उन्हें पढ़ने से न चूकें। स्वामी रामकृष्णानंद मठ में भर्ती होने वाले शिष्यों चयन के प्रति अत्यंत कठोर थे। वह किसी भी ऐसे शिष्य को मठ में शामिल करने की अनुमति देने के पक्ष में नहीं थे जिसके हृदय में धर्म को लेकर किसी प्रकार की कोई अनिश्चितता हो। वह मठ में उन्हीं शिष्यों को प्रवेश देना चाहते थे जो त्याग के जीवन को अपनाने के लिए उनके द्वारा ली गई परीक्षा में पूर्णता सफल हों। ‌‌ कट्टर या आधे-अधूरे आकांक्षी को मठ में शामिल होने की अनुमति बिल्कुल नहीं थी। उनके अधीन प्रशिक्षण प्राप्त करने आए युवा नौसिखियों के लिए यह बहुत कठिन समय था। क्योंकि, उनके आचरण में किसी भी प्रकार की लापरवाही के कारण स्वामी की ओर से उन्हें तीखी फटकार तुरंत ही प्राप्त हो जाती थी। उनका मुख्य उद्देश्य युवा शिष्यों को इनके जीवन में इस प्रकार से विनियमित करना था जिससे कि वह गुरु के बताए आदर्शो तक आसानी से पहुंच सके जिसके लिए वे आए थे। और निश्चय ही इस प्रकार की आकांक्षाओं में लापरवाही या असावधानी का कोई स्थान नहीं है। वह उन लोगों पर विशेष रूप से कठोर थे दिन में किसी भी प्रकार का अहंकार था। यह स्वयं पूर्ण आत्म-विनाश का एक अद्भुत उदाहरण है।

अत्यंत कोमल एवं दयालुता से परिपूर्ण हृदय के स्वामी

वह ईश्वर-प्राप्ति के इच्छुक किसी भी व्यक्ति में अहंकार के किसी भी विचार को बर्दाश्त नहीं कर सकते थे। इन सब बातों से किसी को ऐसा नहीं सोचना चाहिए कि स्वामी मात्र कठोर हृदय के थे अपितु वह केवल बाहरी रूप से कठोर थे उनका हृदय तो अत्यंत कोमल एवं दयालुता से परिपूर्ण था। स्वामी रामकृष्णानंद का कठोर हृदय केवल अवसर के कारण ही दिखाई पड़ता था अन्यथा वे सभी से बहुत प्रेम से रहते थे। इसका परिचय तब भी हुआ था जब मिशन के कार्य से पद में छोटे एक स्वामी जो मद्रास आए हुए थे, उनके स्वागत सत्कार में स्वामी रामकृष्णानंद ने उन्हें बड़े प्रेम से भोजन खिलाया और उनके विदा होते समय स्वामी रामकृष्णानंद की आंखों में आंसू थे। यह उनके पवित्र हृदय की पवित्र भावना को बखूबी दिखाते हैं।
इसी प्रकार एक बार जब स्वामी रामकृष्णानंद बंगाल गए हुए थे तो उन्होंने देखा कि एक युवा ब्रह्मचारी जो कुछ समय के लिए मद्रास में उनके मठ में था, बीमार पड़ गया है। वह उस समय अपने पैतृक घर में था। स्वामी रामकृष्णानंद इस युवा ब्रह्मचारी को देखने उसके घर गए। यह देख वह युवा ब्रह्मचारी अवाक हो गए क्योंकि जिस स्वामी रामकृष्णानंद को पूरा राष्ट्र नमन करता है, वह उन्हें देखने के लिए उनके घर तक आ गए। उस युवा ब्रह्मचारी को तो अपनी आंखों पर भरोसा ही नहीं हुआ। मानवता के प्रति स्वामी रामकृष्णानंद का यह प्रेम कई बार लोगों के सामने उजागर हुआ।

किस प्रकार स्वामी ने अपने अंतिम समय तक जारी रखा दूसरों की भलाई का कार्य

जैसा कि गुरु ने पहले भी कहा था दूसरों के लिए किए गए भले कार्य जो उन्हें मुक्ति की ओर ले कर जाते हैं उसी में स्वयं का उद्धार भी निहित होता है। इसीलिए उन्होंने दूसरों की सेवा के लिए खुद को अनारक्षित रूप से समर्पित कर रखा था दिन। दिन-ब-दिन, महीने-दर-महीने और साल-दर-साल, उन्होंने कड़ी मेहनत की और एक निश्चित एवं दृढ़ संकल्प की दिनचर्या का पालन किया। लोग हैरान थे कि वह इतना काम अकेले हाथ कैसे कर लिया करते थे। कुछ समय बाद स्वामी रामकृष्णानंद के शरीर में ऐसे संकेत देना प्रारंभ कर दिया कि अब वह ज्यादा कार्य करने में समर्थ नहीं। उनका शरीर इतनी मेहनत का तनाव बर्दाश्त नहीं कर पा रहा था। परंतु उनकी आत्मा शरीर की सुनने को तैयार ही नहीं थी। अपने इस बिगड़ते स्वास्थ्य के बावजूद स्वामी रामकृष्णानंद ने अपने इस बीमार शरीर से दूसरों की भलाई का कार्य करना जारी रखा। आखिरकार एक समय ऐसा आ गया जब डॉक्टरों ने उन्हें आराम करने की सख्त हिदायत दी और साथ ही यह संकेत भी दिया कि उनका शरीर बीमार हो रखा है यदि उन्होंने आराम नहीं किया तो शरीर साथ छोड़ सकता है। डॉक्टरों के द्वारा दी गई इस सलाह को, कोलकाता में संदेश स्वरूप उनके साथी भिक्षुओं के पास भेजा गया, जिससे कि वह अपने गुरु के साथ उनके अंतिम दिनों में रह सकें। उन्हें भी यह अच्छा लगा। जब तक मिशन के अध्यक्ष का आदेश नहीं आया उन्होंने तब तक मद्रास से जाना उचित नहीं समझा परंतु जब मिशन के अध्यक्ष ने आदेश दिया तो उन्हें मद्रास को छोड़कर बागबाजार के मठ में रखा गया। जिस समय वह बागबाजार के मठ में थे, उनकी चिकित्सा के लिए प्रसिद्ध चिकित्सकों ने अपनी मर्जी से आकर उनका इलाज करना शुरू किया‌। परंतु समय के साथ उनकी हालत और खराब होती चली गई। परंतु यहां यह बात उल्लेखनीय है कि उनकी आत्मा में इतनी अधिक शक्ति थी कि आध्यात्मिक मामलों से संबंधित वाकपटु प्रवचनों में वह ऐसी हालत में भी भाग लेते रहे। हालांकि इससे उनके शरीर को नुकसान ही हो रहा था।

ईसा मसीह के प्रति पुनर्जागृत होता प्रेम

जो लोग उनसे प्यार करते थे उन्होंने कई बार स्वामी रामकृष्णानंद को अपने शरीर की इस व्यथित अवस्था के दौरान ऐसा बोलते हुए सुना था, “जब मैं प्रभु की बात करता हूं, तो मुझे किसी प्रकार के दर्द का कोई एहसास नहीं होता मैं अपने इस शरीर तक को भूल जाता हूं। “दुर्गा, दुर्गा,” “शिव, शिव,” और उनके गुरु का नाम उनके होठों पर सदैव ही रहता था। स्वामी रामकृष्ण आनंद के मन में ईसा मसीह के लिए जो प्यार और सम्मान था वह जीवन पर्यंत सभी को दिखाई दिया परंतु अपने अंतिम समय में ईसा मसीह के प्रति उनका प्यार पुनर जागृत हो गया था।

स्वामी रामकृष्णानंद का अंतिम बोध में प्रवेश

जैसे-जैसे दिन बीतते गए और उनकी हालत खराब होती गई, शिष्यों को पता चल गया था कि अब महासमाधि अथवा सर्वोच्च प्राप्ति का समय आ गया है। कुछ दिनों बाद वह समय आया जब स्वामी कृष्णानंद ने अपने इस मानव शरीर का त्याग किया और उस क्षण आत्मा को ईश्वर की उपस्थिति का आभास हुआ। अचानक ही वह मृत्यु-कक्ष एक आध्यात्मिक मंदिर के रूप में परिवर्तित हो गया। स्वामी रामकृष्णानंद ने 21 अगस्त 1911 को अंतिम बोध में प्रवेश किया। उनके महासमाधि लेते ही मानो रामकृष्ण मठ और मिशन का एक बड़ा स्तंभ गिर गया था। स्वामी रामकृष्णानंद ने केवल चौदह वर्षों की अवधि के लिए ही मद्रास में काम किया। लेकिन उन्होंने इतनी मेहनत और गहनता से काम किया तथा उनकी इस आध्यात्मिक अभिव्यक्ति और समर्पण के कारण उनके द्वारा बोया गया एक छोटा सा बीच विशाल वृक्ष के रूप में परिवर्तित हो गया जो आज दिन तक भी बढ़ने की प्रक्रिया में लगा हुआ है अब दक्षिण भारत में श्री रामकृष्ण और स्वामी विवेकानंद के संदेशों में रुचि रखने वालों की संख्या में विशाल बढ़ोतरी हो चुकी है लेकिन वे सभी गहरी कृतज्ञता की भावनाओं के साथ स्वामी रामकृष्ण आनंद को याद करना कभी नहीं भूलते जिन्होंने यहां पर जन्म लिया और अपने जीवन को लोगों की सेवा करने में न्योछावर कर दिया।

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