जानिये श्री रामकृष्ण परमहंस के शिष्य स्वामी अखंडानंद (गंगाधर घटक) की जीवन गाथा

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Table Of Contents
  1. स्वामी अखंडानंद उर्फ गंगाधर घटक का पूर्व-मठवासी जीवन
  2. श्री रामकृष्ण के साथ स्वामी अखंडानंद की पहली मुलाकात
  3. आध्यात्मिकता के पथ पर स्वामी अखंडानंद की शुरूआत
  4. स्वामी विवेकानंद से हुईं भेंट
  5. गंगाधर से स्वामी अखंडानंद में परिवर्तन एवं भारत यात्रा
  6. स्वामी अखंडानंद का स्वामी विवेकानंद से अलगाव सहन करने की असमर्थता
  7. स्वामी अखंडानंद का स्वामी विवेकानंद के शब्दों की सच्चाई का एहसास होना
  8. शिक्षा के लिए स्वामी अखंडानंद द्वारा किए गए कार्य
  9. स्वामी अखंडानंद का मानवता से परिपूर्ण हृदय
  10. स्वामी अखंडानंद द्वारा अनाथालय की स्थापना
  11. अनाथालय में किए जाने वाले विभिन्न कार्य
  12. स्वामी अखंडानंद द्वारा किए गए विभिन्न कार्य
  13. अंतिम समय

स्वामी अखंडानंद उर्फ गंगाधर घटक का पूर्व-मठवासी जीवन

स्वामी अखंडानंद के मठवासी होने के पूर्व का नाम था – गंगाधर घटक, जिसके द्वारा उनको उनके सभी सगे संबंधी बुलाया करते थे। स्वामी अखंडानंद, बागबाजार, कलकत्ता के एक सम्मानित ब्राह्मण परिवार से ताल्लुक रखते थे। वे बचपन से ही अत्यंत धार्मिक प्रवृत्ति के इंसान थे, और ब्राह्मण जीवन से से जुड़ी रूढ़िवादिता का पूरा पालन करते थे जैसे कि दिन में कई बार नहाना, अपना भोजन स्वयं बनाना, गीता एवं अन्य शास्त्रों का नियमित तौर पर पाठ करना और नियमित रूप से ध्यान करना। यही उनकी नियमित जीवनशैली थी, तब तक जब तक वह श्री राम कृष्ण के संपर्क में नहीं आए थे।

श्री रामकृष्ण के साथ स्वामी अखंडानंद की पहली मुलाकात

श्री रामकृष्ण के साथ उनकी पहली मुलाकात 1884 में दक्षिणेश्वर में हुई। इस मुलाकात के समय वह अपने मित्र हरीनाथ जो भविष्य में स्वामी तुर्यानंद बने, के साथ थे। श्री रामकृष्ण ने अत्यंत गर्मजोशी से उनका स्वागत किया और फिर उनसे पूछा क्या वह पहले भी मिल चुके हैं? यह सुनकर बालक गंगाधर ने उत्तर दिया कि “जब वह बहुत छोटा था और दीनानाथ बोस के घर में रहता था, जो कि बागबाजार में रहने वाले माता के भक्त थे, तब इनकी एक बार मुलाकात हुई थी। गुरु ने उनसे रात भर दक्षिणेश्वर में ही रुकने को कहा और अगली सुबह छुट्टी लेने की बात कही। साथ ही श्री रामकृष्ण ने अपने विशिष्ट तरीके से लड़के को फिर से दक्षिणेश्वर आने के लिए कहा।

आध्यात्मिकता के पथ पर स्वामी अखंडानंद की शुरूआत

फिर गुरु और शिष्य के बीच वह घनिष्ठ संबंध शुरू हुआ, जिसने बाद में गंगाधर को संसार की मोहमाया को त्यागने और मनुष्य में भगवान की सेवा के लिए उनके समर्पण की एक मजबूत इच्छा में बदल दिया। हर बार जब भी वे दक्षिणेश्वर आते थे तो श्री रामकृष्ण की ईश्वर के प्रति भक्ति एवं समर्पण को देखकर मंत्रमुग्ध हो जाते थे। उन्होंने स्वयं के भीतर श्री रामकृष्ण के ईश्वर के प्रति प्रेम के कारण एक परिवर्तन को महसूस किया और धीरे धीरे श्री रामकृष्ण से व्यवहारिक निर्देश प्राप्त करते हुए आध्यात्मिकता के पथ पर चल पड़े। इस परिवर्तन के तहत गंगाधर ने अपने भीतर के अति जुड़वा देता का पालन करना छोड़ दिया क्योंकि गुरु ने इसे “पुराना” बताया था, यह कहते हुए: “नरेन (स्वामी विवेकानंद) को देखें। उनकी आंखें कितनी विशिष्ठ हैं! वह दिन भर में सौ पान खा लेते हैं साथ ही उन्हें जो भी खाने को मिलता है वह उसे ग्रहण कर लेते हैं परंतु उनका मस्तिष्क गहराई से आत्म निरीक्षण करता है। वह कलकत्ता की सड़कों पर घरों और संपत्ति, घोड़ों और गाड़ियों, एवं सभी कुछ में भगवान की उपस्थिति को देखते है! मेरी इच्छा है कि तुम स्वामी विवेकानंद से जरूर भेंट करो। वह शिमला (कलकत्ता का एक जिला) में रहतें हैं।”

स्वामी विवेकानंद से हुईं भेंट

अगले दिन गंगाधर ने स्वामी विवेकानंद को देखा और तुरंत ही श्री रामकृष्ण के द्वारा की गई टिप्पणियों की सच्चाई को समझ गए। उन्होंने अपने इस साक्षात्कार की सूचना गुरु को दी, जिन्होंने सोचा कि लड़का एक ही साक्षात्कार में इतना कुछ कैसे सीख सकता है। गंगाधर ने कहा: “वहां पहुंचने पर, मैंने उनकी उन प्रमुख आँखों पर ध्यान दिया और उन्हें एक बड़ी अंग्रेजी कृति पढ़कर सुनाई। उनका कमरा गंदगी से भरा था, लेकिन उउ शायद ही कुछ देखा। उसका मन इस संसार से दूर लगा था। ” श्री रामकृष्ण ने उन्हें अक्सर नरेंद्र नाथ के पास जाने की सलाह दी। यह उनके जीवन के नायक स्वामी विवेकानंद के प्रति उनकी अटल भक्ति और निष्ठा का आधार था। गंगाधर अक्सर दक्षिणेश्वर जाते थे और गुरु की सेवा करने का कोई अवसर नहीं गंवाते थे।

गंगाधर से स्वामी अखंडानंद में परिवर्तन एवं भारत यात्रा

गुरु (गले का कैंसर) की लंबी बीमारी के दौरान इनकी गुरु के प्रति अटल भक्ति और निष्ठा अपनी चरमोत्कर्ष पर थी, बीमारी के कारण उन्हें कोसीपोर से हटाने की आवश्यकता हुई, जहां उन्होंने अंततः अगस्त, 1886 में महासमाधि में प्रवेश किया। उन अंतिम कुछ महीनों के दौरान, श्री रामकृष्ण अपने युवा शिष्यों के शुद्ध और निस्वार्थ प्रेम को अघुलनशील भाईचारे में एक साथ बांधने में सफल रहे, और उन्हें नेता के रूप में नरेंद्र नाथ की देखरेख में रखा। बरनागोर मठ शुरू होने के कुछ ही समय बाद, गंगाधर भिक्षुओं के सर्व-त्याग समूह में शामिल हो गए और उनके साथ एक तपस्वी जीवन व्यतीत करना प्रारंभ कर दिया, जो श्री रामकृष्ण द्वारा सिखाए गए उच्चतम सत्य को महसूस करने के लिए दृढ़ थे। अब गंगाधर, स्वामी अखंडानंद बन गए थे (“जिसका आनंद अविभाज्य ब्रह्म में है)। कोई भी भाव उन्हें भगवान में लीन होने के उनके जीवन से, यहां तक कि एक बाल की चौड़ाई जितना भी नहीं हटा सकता था। यह प्राचीन काल से भारत में आदरणीय मठवाद का पारंपरिक आदर्श था। गंगाधर, एक स्थान तक सीमित न रहकर संपूर्ण भारत में भटकते हुए साधु के रूप में जीवन जीने के आदर्श के साथ, 1887 से हिमालय की लंबी तीर्थ यात्रा पर शुरू हुआ; और पवित्र केदारनाथ और बद्रीनारायण की यात्रा के बाद वे तिब्बत चले गए, जहां वे ल्हासा और अन्य जगहों पर तीन साल तक रहे, भारत लौटकर 1890 में उन्होंने स्वामी विवेकानंद के साथ लगातार पत्राचार के माध्यम से जुड़े रहे, फिर गाजीपुर में, और बाद में अपनी स्थान में लौट आए। तदनुसार, स्वामी अखण्डानंद बरनागोर मठ में आए, और अपने भाई-शिष्यों के साथ कुछ सुखद महीने बिताने के बाद, उनके साथ अपने अनुभव को साझा करते हुए, वे जुलाई, 1890 में, स्वामी विवेकानंद के साथ हिमालय की तीर्थ यात्रा पर निकल पड़े। रास्ते में महत्वपूर्ण स्थानों का भ्रमण करते हुए वे अल्मोड़ा पहुँचे, जहाँ से वे बद्रीनाथ के मार्ग पर कर्णप्रयाग के लिए रवाना हुए। लेकिन किसी न किसी बीमारी के कारण उनके आगे की यात्रा में सदैव ही रुकावट आती चली गई। इसी कारण वे कुछ हफ्तों के बाद तचरी से देहरादून लौट आए, जहां से स्वामी अखंडानंद इलाज के लिए मेरठ गए।

स्वामी अखंडानंद का स्वामी विवेकानंद से अलगाव सहन करने की असमर्थता

इलाज से ठीक होने के तुरंत बाद स्वामी अखंडानंद फिर से स्वामी विवेकानंद से जुड़ गए, जो ऋषिकेश में तपस्या का अभ्यास करते हुए गंभीर रूप से बीमार हो गए थे, जो कि हिमालय की तलहटी में भिक्षुओं के तपस्या करने के लिए उपयुक्त स्थान है। वह अपने साथ स्वामी ब्रह्मानंद सहित कुछ अन्य भाई-शिष्यों को लेकर आए। परंतु शिष्य भाइयों के साथ 5 महीने का समय बिताने के पश्चात स्वामी विवेकानंद के भीतर पुनः अकेले रहने की आंतरिक लालसा ने जन्म लिया। जिसके कारण उन्होंने वह स्थान छोड़कर एक भिक्षु की भांति यात्रा करने के लिए निकलने का निश्चय किया। स्वामी अखंडानंद, उनके इस अलगाव को सहन करने में असमर्थ थे, इसी लिए वो उनके पीछे उन्हें खोजने के लिए चल पड़े। प्रांत से प्रांत एक जगह से दूसरी जगह, लेकिन वे जहां भी गए, उन्हें विचलित करने वाली खबर ही मिली कि स्वामी विवेकानंद ने कुछ दिनों पहले ही इस स्थान को छोड़ दिया। परंतु वह अपने संकल्प में अडिग थे और इसी कारण वे स्वामी विवेकानंद की खोज करते रहे। अंत में उनकी खोज का उद्देश्य कच्छ से दूर मांडवी नामक बंदरगाह पर पूरा हुआ। हालाँकि, स्वामी विवेकानंद से यहां पर भेंट करने के पश्चात वे स्वामी विवेकानंद की इस इच्छा के आगे झुक गए और दोनों ने ही अपनी तीर्थ यत्रा अलग-अलग जारी रखी।

स्वामी अखंडानंद का स्वामी विवेकानंद के शब्दों की सच्चाई का एहसास होना

मई में स्वामी विवेकानंद के अमेरिका जाने के कुछ समय बाद, 1893 स्वामी अखंडानंद को अपने भाई-शिष्यों, स्वामी ब्रह्मानंद और तुरियानंद से माउंट आबू में स्वामी विवेकानंद की पश्चिम की ओर यात्रा करने के असली मकसद का कारण पता चला, जो वहां की भूखी भारत की जनता के लिए था। क्योंकि स्वामी विवेकानंद की नजर में भारतीयों की दशा अत्यंत दयनीय थी। जिसके कारण स्वामी विवेकानंद ने पहले उनकी भौतिक स्थिति में सुधार किए बिना उन्हें धर्म का प्रचार करना बेतुका माना। उस समय स्वामी अखण्डानंद पर इस संचार का बहुत कम प्रभाव पड़ा। फिर वे बीमार पड़ गए और बदलाव के लिए खेतड़ी चले गए, जहां छह महीने के आराम और उपचार के बाद, उनका स्वास्थ्य वापस ठीक हो गया। लेकिन उन महीनों ने उन्हें सभी वर्गों के लोगों, उच्च और निम्न, अमीर और गरीब के साथ निकट संपर्क में आने का पर्याप्त अवसर मिला और तब उन्हें स्वामी विवेकानंद के शब्दों की सच्चाई का एहसास हुआ। अब खुद भी गरीबों और असहाय जनता की सेवा करने की इच्छा से चलते  उन्होंने अमेरिका में स्वामी को पत्र लिखकर उनकी अनुमति मांगी। उन्हें मिले उत्साहजनक उत्तर ने उन्हें आगे बढ़ाया और 1894 में उन्होंने गरीबी के खिलाफ अपना अभियान शुरू किया।

शिक्षा के लिए स्वामी अखंडानंद द्वारा किए गए कार्य

  • स्वामी अखंडानंद ने पाया कि इसके मूल में जनता की भयावह अज्ञानता थी। इसलिए शिक्षा उनका पहला उद्देश्य बन गया। वह खेतड़ी के निवासियों को अपने बच्चों को शिक्षित करने की आवश्यकता को प्रभावित करने के लिए घर-घर गए, और स्थानीय हाई स्कूल की ताकत को 80 से 257 तक बढ़ाने के साथ-साथ शिक्षण स्टाफ में सुधार करने में भी सफल रहे।
  • इसके बाद उन्होंने खेतड़ी के आसपास के गांवों का दौरा किया और गांव के लड़कों के लिए पांच प्राथमिक विद्यालय शुरू किए। यह सब देखकर खेतड़ी के महाराजा ने बाद में 5000/- रुपये का वार्षिक अनुदान दिया।
  • स्वामी के कहने पर, खेतड़ी के संस्कृत स्कूल को वैदिक स्कूल में बदला गया और चूंकि यहां के छात्र किताबें खरीदने के लिए बहुत गरीब थे, स्वामी ने सदस्यता ली, किताबें खरीदीं और उन्हें राजनीतिक एजेंट द्वारा लड़कों को मुफ्त में वितरित करवाया।
  • उन्होंने महाराजा को अपनी गरीब प्रजा को दरबार के दिनों में, उन्हें देखने पर लगे प्रतिबंध को हटाने के लिए भी प्रेरित किया।
  • अगले वर्ष स्वामी ने उदयपुर का दौरा किया, जहां उन्हें वहां के आदिवासी निवासियों, भीलों की स्थिति से परिचित करवाया जिसे जाने के बाद अत्यंत पीड़ा हुई।
  • एक दोस्त की मदद से उन्होंने एक दिन उन्हें खूब खाना खिलाया। उन्होंने नाथद्वारा में एक मिडिल इंग्लिश स्कूल शुरू करने के लिए बहुत मेहनत की, और अलवर एवं राजपुताना के अन्य स्थानों में कई सोसायटी की स्थापना की, जो नियमित रूप से उपयोगी सामाजिक, धार्मिक और शैक्षिक विषयों पर चर्चा करते थे।

स्वामी अखंडानंद का मानवता से परिपूर्ण हृदय

कुछ समयोपरांत उन्होंने राजपुताना छोड़ दिया और 1895 की शुरुआत में मठ में लौट आए, जो उस समय आलमबाजार में था। यहाँ भी वह खाली नहीं बैठे। जब भी पड़ोस में हैजा का कोई मामला सामने आता, तो वह मौके पर दौड़ पड़ते और अपनी व्यक्तिगत सुरक्षा की परवाह किए बिना मरीज को ठीक करने के लिए हर संभव कोशिश करते थे। कुछ महीने बाद, वह गंगा के किनारे उत्तर की ओर चल पड़े, जब तक कि वह मुर्शिदाबाद जिले के बरहामपुर से लगभग बीस मील दूर एक गाँव में नहीं पहुंच गए, जहाँ उन्हें एक गरीब मुसलमान लड़की रोती हुई मिली। पूछताछ करने पर उसे पता चला कि उससे उसका घड़ा टूट गया, जो कि इकलौता घड़ा था, और उसे बदलने का भी कोई साधन नहीं था। स्वामी के पास केवल चार आने थे। उन्होंने तुरंत उस लड़की के लिए एक दुकान से एक घड़ा खरीदा और उसे खाने के लिए आधा आने के चावल दिए। जब वह वहाँ विश्राम कर रहे थे, तो एक दर्जन बूढ़ी औरतों ने उन्हें भोजन की आशा से घेर लिया। उन्होंने तुरंत उनके लिए कुछ खाना को खरीदा। इसके कुछ देर बाद ही उन्हें पता चला कि उस गाँव में एक बुढ़िया बीमार और लाचार पड़ी है। वह तुरंत वहां उसके पास गए और उसकी मदद के लिए वह सब कुछ किया जो वह कर सकते थे। अकाल के साथ यह उनका पहला सामना था। वह जितना आगे की ओर बढ़ते , अकाल के कारण दृश्य उतने ही भयभीत होते हुए दिखाई पड़ते अंततः वह महुला नामक एक जगह में रुक गए। उन्होंने वहां अकाल पीड़ितों के दशा को देखते हुए वहीं रुकने का संकल्प लिया। और इसलिए आलमबाजार मठ को मदद के लिए एक पत्र लिखा। स्वामी विवेकानंद, जो लगभग तीन महीने पहले पश्चिम में अपने चार साल के युगांतरकारी कार्य के बाद भारत लौटे थे, उस समय वहीं रह रहे थे। उसने दो साधुओं को कुछ धनराशि देकर अकाल के स्थान पर पहुंचने के लिए कहा। 15 मई 1897 को, रामकृष्ण मिशन के पहले अकाल राहत कार्य का उद्घाटन किया गया, जिसमें महुला और पंचगाँव केंद्र थे, और यह लगभग एक वर्ष तक चला।

स्वामी अखंडानंद द्वारा अनाथालय की स्थापना

इस अकाल राहत कार्य के दौरान स्वामी अखंडानंद को दो अनाथों का प्रभार लेना पड़ा, इसी कारण उनके दिमाग में एक अनाथालय की स्थापना करने का विचार आया। जिला अधिकारियों के प्रोत्साहन के साथ, स्वामी ने कई अनाथों की अस्थायी देखभाल करने के बाद, मई, 1898 में, महुला में, रामकृष्ण आश्रम नामक अनाथालय की स्थापना की, जिसे जल्दी ही सरगाछी में किराए के घर में स्थानांतरित कर दिया गया।

अनाथालय में किए जाने वाले विभिन्न कार्य

इस संस्था की नींव से लेकर अपने जीवन के अंतिम दिन तक स्वामी अखंडानंद ने इस संस्था के ऊपर विशेष ध्यान दिया एवं इसके सुधार के लिए सर्व संभव कार्य किए साथ ही इस संस्था के माध्यम से उन्होंने यहां पर अनाथों भुखमरी तथा अशिक्षा के स्तर में काफी गिरावट लाने में मुख्य भूमिका निभाई। यहां पर रहने वाले बहुत से अनाथ इमानदारी से अपना जीवन यापन करते थे स्वामी अखंडानंद के देखरेख में इस आश्रम में दिन रात मेहनत करके गांव में बच्चों के पढ़ने के लिए विद्यालयों तथा एक औषधालय का भी संचालन किया जहां पर गांव के वयस्कों का इलाज किया जाता था आश्रम में एक ऐसे स्कूल का भी विकास किया। जहां बुनाई, सिलाई और बढ़ईगीरी पढ़ाया जाता था, साथ ही उस अवधि के दौरान रेशम उत्पादन, जो इस इलाके का गौरव बना, को विकसित किया। आश्रम के लड़कों द्वारा तैयार किए गए हस्तशिल्प ने कोसिम-बाजार के महाराजा मनिंद्र चंद्र नंदी द्वारा आयोजित बंजेतिया औद्योगिक प्रदर्शनी में कई वर्षों तक प्रथम पुरस्कार जीता। परंतु दुर्भाग्य से, आवास के अभाव में औद्योगिक स्कूल को बंद करना पड़ा। स्वामी ने न केवल आश्रम के लड़कों की सामान्य शिक्षा का ज्ञान दिया अपितु उनके भीतर आध्यात्मिक प्रशिक्षण के लिए भी कार्य किए जैसे कि सुबह शाम प्रार्थना करना, इन सभी के लिए दिनचर्या का आवश्यक हिस्सा था। पवित्र ग्रंथों जैसे रामायण और महाभारत के चुनिंदा अंशों को पढ़कर इन्हें सुनाया एवं समझाया गया। यहां पर आने वाले किसी भी अनाथ से उसकी जाति अथवा वर्ग के अनुसार भेदभाव नहीं किया गया। यहां पर किसी भी जाति अथवा वर्ग का अनाथ प्रवेश ले सकता था। इसी कारण कुछ मुस्लिम लड़कों को भी कई वर्षों तक आश्रम में रखा गया और प्रशिक्षित किया गया, जिससे कि वे अपने धर्म में विश्वास को और अधिक मजबूत कर सकें। आश्रम में दिए जा रहे प्रशिक्षण में संस्कृति को भी शामिल किया गया उदाहरण के साथ-साथ उपदेश के माध्यम से स्वामी अखंडानंदा ने अपने लड़कों को सेवा के महान कार्य करने के लिए प्रोत्साहित किया। जब भी पड़ोसी गांवों में महामारी या कोई अन्य आपदा का प्रकोप हुआ। सैकड़ों हैजा के रोगियों को उनके द्वारा उचित सेवा और इलाज उपलब्ध करवाया गया जिससे कि उन्हें असामयिक मृत्यु से बचाया जा सके।

स्वामी अखंडानंद द्वारा किए गए विभिन्न कार्य

  • बिहार के भागलपुर जिले के घोघा में भारी बाढ़ के दौरान, स्वामी अखंडानंद ने तुरंत राहत कार्य शुरू किया, जिसमें दस सप्ताह के लिए पचास गाँवों की मदद की गई, और इस अवसर पर उन्होंने बड़ी संख्या में हैजा के रोगियों की देखभाल की।
  • 1934 में बिहार में आए भयानक भूकंप के दौरान उन्होंने, जब कि वे वृद्ध हो चुके थे, उन्होंने व्यक्तिगत रूप से मुंगेर और भागलपुर में तबाही के दृश्यों का निरीक्षण किया और उन क्षेत्रों में मिशन के राहत कार्य पहुंचाने में सहायता की। गरीबों और असहायों के प्रति उनकी सहानुभूति के सैकड़ों उदाहरणों में से ये केवल कुछ ही उदाहरण हैं।
  • उनका पूरा जीवन ऐसे महान कार्यों से भरा रहा। उनके लिए संकट में पड़े सभी मनुष्य सत्य देव थे, और उन्होंने अपनी पूरी शक्ति से उनकी सेवा करने में आनंद का अनुभव किया।
  • उन्होंने स्वामी विवेकानंद के कहने का अक्षराशः पालन किया: “गरीब, अनपढ़, अज्ञानी, पीड़ित – ये तुम्हारा भगवान है। इस बात को अच्छी तरह से समझो कि इन्हीं की सेवा ही सर्वोच्च धर्म है।” स्वामी अखंडानंद गूंगे लोगों के बीच चुपचाप और बेपरवाह होकर काम करना पसंद करते थे और यही कारण है कि अपने उदासीन स्वास्थ्य के बावजूद, वे सरगाछी में गाँव के काम में लगे रहे।
  • उन्हें 1925 में रामकृष्ण मिशन का उपाध्यक्ष और मार्च, 1934 में स्वामी शिवानंद के निधन के पश्चात उन्हें राष्ट्रपति के पद का भार दिया गया जिसे उन्होंने पूरे समर्पण भाव से निभाया।
  • राष्ट्रपति के पद के भार को संभालने के लिए उन्हें बेलूर मठ में उपस्थित रहने की आवश्यकता थी परंतु उन्होंने सरगाछी के एकांत को पसंद किया। स्वामी अखंडानंद अपने अनाथालय के अनाथ लड़कों के साथ काफी खुश रहते थे, कृषि कार्य की देखरेख करते थे और पेड़ों और पौधों के मूल्यवान संग्रह की देखभाल करते थे।
  • नियमित काम उनके लिए अरुचिकर था। हालांकि, वह किताबों के प्रेमी थे और उन्होंने विविध विषयों पर ज्ञान का एक बड़ा भंडार एकत्रित किया हुआ था।
  • साथ ही वह विलक्षण स्मृति के स्वामी भी थे जिसके कारण उनकी अवलोकन करने की शक्ति अत्यंत मजबूत थी।
  • भाषा सीखने की उनकी विशेष योग्यता थी: राजपुताना में उन्होंने केवल चार दिनों के दौरान हिंदी व्याकरण में महारत हासिल की।
  • वे संस्कृत एवं अंग्रेजी भाषा को अच्छे से जानते और समझते थे, इसके अलावा उन्हें वेदों में विशेष रूचि थी। वह न केवल संहिताओं से पसंद के अंशों का पाठ और व्याख्या कर सकते थे, बल्कि वे एक समय में वैदिक संस्कृति के अध्ययन और प्रचार के लिए बंगाल में संस्थानों की स्थापना के लिए भी उत्सुक थे, जिसके लिए उन्होंने विद्वानों और विशिष्ट व्यक्तियों से मुलाकात की थी।
  • वह अपनी मातृभाषा में एक सशक्त लेखक थे और कभी-कभी पत्रिकाओं में धारावाहिक लेखों का योगदान करते थे। परंतु रामकृष्ण आदेश के बंगाली अंग, उदबोधन में “तिब्बत में तीन साल”, और मासिक वसुमली में उनके संस्मरण, दुर्भाग्यवश उनके अचानक निधन से अधूरा रह गया।‌

अंतिम समय

स्वामी अखंडानंद का कहना था कि “मैं सांसारिक राज्य, या स्वर्ग, या यहां तक कि मोक्ष की भी लालसा नहीं करता। मेरी केवल एक ही इच्छा है कि पीड़ितों के दुखों को दूर किया जाए।” स्वामी अखंडानंद का 71 वर्ष की आयु में 7 फरवरी, 1937 को बेलूर मठ में निधन हो गया।

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