Home संस्कृति जानिये दिग्गज और विवादास्पद लेखिका कृष्णा सोबती से जुड़े तथ्य

जानिये दिग्गज और विवादास्पद लेखिका कृष्णा सोबती से जुड़े तथ्य

0
105
krishna sobti essayist writer novelist hindi

कृष्णा सोबती एक भारतीय हिंदी साहित्यकारा और लेखिका थीं। सोबती को प्रसिद्धि उनके उपन्यास मित्रो मरजानी (1966) ने दिलाई थी। यह एक ऐसा उपन्यास था जिसमें उन्होंने एक विवाहित महिला की कामुकता का एक नायाब चित्रण किया था। माना जाता है हिंदी साहित्य की इस महान लेखिका कृष्णा सोबती का जन्म गुजरात, पंजाब के उस हिस्से में हुआ था जो अब पाकिस्तान में है। इन्होंने हशमत नाम से भी लेखन का कार्य किया हुआ है और हशमत नाम से उसको प्रकाशित भी करवाया, जो कि लेखकों और दोस्तों की कलम के चित्रों का संकलन है। उनके प्रमुख कार्यों का चयन करके एक साथ “सोबती इका सोहबत” शीर्षक के नाम से प्रकाशित किया गया। उनके द्वारा किए गए कई काम अंग्रेजी और उर्दू में अनुवादित किए जा चुके हैं। 2005 में “दिल-ओ-दानिश”, को कथा बुक्स की रीमा आनंद और मीनाक्षी स्वामी द्वारा अंग्रेजी में “द हार्ट हैज़ रीज़नस” में अनुवादित किया गया, इतना ही नहीं बल्कि इस अनुवादित किताब ने भारतीय भाषा भाषा कथा अनुवाद श्रेणी में क्रॉसवर्ड अवार्ड जीता। उनके प्रकाशनों का कई भारतीय और विदेशी भाषाओं जैसे कि स्वीडिश, रूसी और अंग्रेजी में अनुवाद किया गया। आइए कृष्णा सोबती के जीवन से जुड़े कुछ अन्य पहलुओं के बारे में इस लेख के जरिए जानने का प्रयत्न करते हैं।

कृष्णा सोबती का शुरुआती जीवन एवं शिक्षा

कृष्णा सोबती का जन्म 18 फरवरी 1925 को ब्रिटिश भारत के पंजाब प्रांत के गुजरात शहर में हुआ था (विभाजन के बाद यह हिस्सा अब पाकिस्तान का हिस्सा बन गया है। ) इनकी शिक्षा दिल्ली और शिमला में हुई। इन्होंने अपने तीन भाई बहनों के साथ स्कूल में अपनी शुरुआती शिक्षा की पढ़ाई शुरू की। इनका परिवार औपनिवेशिक ब्रिटिश सरकार के लिए काम किया करता था। उन्होंने शुरुआत में लाहौर के फतेहचंद कॉलेज से अपनी उच्च शिक्षा की शुरुआत की थी, परंतु जब भारत का विभाजन हुआ तो इनका परिवार भारत लौट आया। विभाजन के तुरंत बाद इन्होंने दो साल तक महाराजा तेज सिंह के शासन में कार्य किया जो कि सिरोही, राजस्थान के बाल-महाराजा थे।

कृष्णा सोबती का लेखन कार्य एवं उनकी “अनपढ़” शैली

हिंदी में लिखते समय कृष्णा सोबती कई बार पंजाबी और उर्दू के मुहावरों का उपयोग किया करतीं थीं। समय के साथ इन्होंने राजस्थानी मुहावरों को भी अपने लेखन में शामिल कर लिया। उर्दू, पंजाबी और हिंदी संस्कृतियों की परस्पर क्रिया ने इनकी रचनाओं में प्रयुक्त भाषा को अत्यधिक प्रभावित करने के साथ वह नयापन भी प्रदान किया जो उस समय सामान्यता देखने को नहीं मिलता था। कृष्णा सोबती नई लेखन शैलियों का उपयोग करने के लिए जानी जाती थी। उनकी कहानियों के पात्र ‘दबंग’, ‘साहसी’ और चुनौतियों को स्वीकार करने के लिए तैयार रहने वाले होते थे। जिस क्षेत्र के बारे में वह लिख रही होती थी वहां की बोली और भाषा को पूरी तरह अपने पात्रों द्वारा प्रमाणिक करने के लिए आलोचकों द्वारा उनकी काफी सराहना भी की गई। इन्हीं कारणों से कई बार इनके कार्यों को अन्य भाषाओं में अनुवाद करते समय आने वाली कठिनाई को भी उद्धृत किया गया है। हालाँकि, सोबती की रचनाएँ मुख्य रूप से स्त्री की पहचान और उसकी सेक्सुअलिटी जैसे मुद्दों से जुड़ी होती थीं, परंतु फिर भी उन्होंने एक महिला लेखिका के रूप में लेबल किए जाने पर इस बात का पुरजोर विरोध किया। उनके अनुसार उनके लेखन में स्त्री और पुरुष दोनों के दृष्टिकोण के महत्व की बात की गई। अतः उनको सिर्फ महिला लेखक के रूप में लेबल किए जाना गलत था। उनकी लेखन, शैली और मुहावरे, यहां तक की उनके द्वारा चयन किए गए विषयों ने आलोचकों द्वारा उनके कार्य की आलोचना करवाई। कुछ लोगों ने यह तक कहा कि वह अपने लेखन में बहुत अधिक अश्लील शब्दों का उपयोग करतीं थीं जिस कारण उनकी लिखने की शैली “अनपढ़” कही गई। उन पर यह भी आरोप लगाया गया कि उनका लेखन सेक्सुअलिटी से बहुत ज्यादा प्रभावित होता है।

“सिक्का बदल गया” नामक उपन्यास के साथ कृष्णा सोबती का कथा साहित्य के सफर की शुरुआत

कृष्णा सोबती ने शुरूआती दिनों में लघु कथाओं की लेखिका के रूप में अपनी पहचान बनानी चाही। जिसके लिए उन्होंने अपनी लघु कहानियों जैसे कि लामा (एक तिब्बती बौद्ध पुजारी के बारे में) और नफीसा को 1944 में प्रकाशित किया। उसी वर्ष उन्होंने भारत के विभाजन के बारे में अपनी प्रसिद्ध कहानी भी प्रकाशित की। कहा जाता है “सिक्का बदल गया”, नामक उपन्यास को उन्होंने सच्चिदानंद वात्स्यायन, जो कि उनके साथी लेखक और “प्रतीक” नामक एक पत्रिका के संपादक थे, इन्होंने बिना किसी परिवर्तन के कृष्णा सोबती के इस उपन्यास को प्रकाशित करने की शर्त के लिए तैयार हो गए। कृष्णा सोबती ने इस घटना को इस बात की पुष्टि मानी कि अब वह पेशेवर रूप से अपनी पसंद को लिखकर लोगों तक पहुंचा सकतीं हैं।

“ज़िंदगीनामा: जिंदा रुख” के प्रकाशन का रूकना एवं पुनः प्रकाशन

कृष्णा सोबती ने अपनी पहले उपन्यास की हस्तलिपि जिसका शीर्षक “चन्ना” था, 1952 में इलाहाबाद के नेता प्रेस को दे दी। यह हस्तलिपि ना केवल स्वीकारी गई अपितु प्रिंट भी की गई। हालांकि सोबती को इस बात के पुख्ता सबूत मिले कि प्रेस ने उनके उपन्यास में शाब्दिक परिवर्तन किया था। जिसके परिणामस्वरुप उन्होंने टेलीग्राम भेज कर तुरंत पुस्तकों की छपाई के कार्य को रोकने के लिए कहा। कृष्णा सोबती का मानना था कि शाब्दिक परिवर्तन के कारण भाषाई परिवर्तन भी सहज ही हो जाएंगे। जिसके कारण उनके द्वारा इस्तेमाल किए गए पंजाबी, उर्दू और संस्कृत के शब्दों का प्रयोग बेकार सिद्ध हो जाएगा। उन्होंने पुस्तक को प्रकाशन से वापस ले लिया और मुद्रित प्रतियों को नष्ट करने के लिए भुगतान भी किया। इसके बाद में उन्हें राजकमल प्रकाशन की प्रकाशक शीला संधू द्वारा अपने उपन्यास की हस्तलिपि को पुनः बिना किसी बदलाव के प्रकाशित करने के लिए राजी कर लिया गया और इसे राजकमल प्रकाशक ने “ज़िंदगीनामा: जिंदा रुख”, सन् 1979 में व्यापक पुनर्लेखन के बाद प्रकाशित किया। कृष्णा सोबती ने 1980 में “ज़िंदगीनामा” के लिए साहित्य अकादमी पुरस्कार भी जीता। ज़िन्दगीनामा : जिंदा रुख” मुख्य रूप से 1900 के दशक के प्रारंभ में पंजाब के एक गाँव में ग्रामीण जीवन का लेखा-जोखा बयां करती हुई कहानी थी। यह उस समय के राजनीतिक और सामाजिक सरोकारों को भी संबोधित करता हैं। तृषा गुप्ता जो कि उस समय कि लेखिका और आलोचक थीं उन्होंने इस उपन्यास को “हिंदी साहित्य की कसौटी का सार्वभौमिक हिस्सा” बताया है। एक अन्य आलोचक नंद किशोर नवल ने मुंशी प्रेमचंद के बाद से इसे हिंदी साहित्य में “इस समय के लोगो के प्रति सबसे व्यापक, सहानुभूतिपूर्ण और संवेदनशील व्याख्यान” बताया।

krishna-sobti

कृष्णा सोबती द्वारा अमृता प्रीतम के खिलाफ मुकदमा

ज़िन्दगीनामा के पुनः प्रकाशित होने के तुरंत बाद ही, कवित्री, उपन्यासकार और निबंधकार अमृता प्रीतम ने “हरदत्त का ज़िंदगीनामा” नामक शीर्षक से एक पुस्तक प्रकाशित की। सोबती ने अमृता प्रीतम के खिलाफ 1984 में मुकदमा दायर कर दिया जो उनके नुकसान की भरपाई के लिए था। मुकदमे में दावा किया गया कि अमृता प्रीतम ने उनके समान शीर्षक का उपयोग करके उनके कॉपीराइट का उल्लंघन किया है। यह केस 26 साल तक चला और 26 साल बाद मुकदमे का फैसला अमृता प्रीतम के पक्ष में तय किया गया। हालांकि फैसला आने के 6 साल बाद 2011 में अमृता प्रीतम की मृत्यु हो गई। ऐसा भी कहा जाता है कि मुकदमे के फैसले में देरी का कारण दोनों ही उपन्यासों (कृष्णा सोबती और अमृता प्रीतम) की मूल हस्तलिपि वाले सबूत के बॉक्स का गायब हो जाना था। अमृता प्रीतम के पक्ष में निर्णय आने के कारण कृष्णा सोबती बहुत निराश हुई क्योंकि उनका मानना था कि मुकदमे के फैसले में हुई देरी और फैसले का दूसरे के पक्ष में आना, उनके उपन्यास के लिए नकारात्मक सिद्ध हुआ। साथ ही अपेक्षित परिणाम ना आने के कारण उनके उपन्यास को वह प्रसिद्धि ना मिली जो मिलनी चाहिए थी।

कृष्णा सोबती द्वारा किए गए अन्य कार्य

  • कृष्णा सोबती ने प्रशंसा पाने के लिए कई अन्य उपन्यास प्रकाशित किए। “डार से बिछाड़ी (घर के दरवाजे से अलग)”, 1958 में प्रकाशित किया गया ऐसा उपन्यास था, जिसकी कहानी पूर्व-विभाजन भारत पर आधारित थी। इसमें एक ऐसी शादी से पैदा हुए बच्चे का संबंध बताया गया जो धार्मिक और सामाजिक सीमाओं को पार कर गया।
  • इसके पश्चात इन्होंने 1966 में मित्रो मरजानी (टू हेल विथ यू मिट्रो!) नामक एक उपन्यास लिखा, जो ग्रामीण पंजाब के ऊपर आधारित था। इसमें एक युवा विवाहित महिला द्वारा अपनी कामुकता का अन्वेषण और उसकी पुष्टि करते हुए दिखाया गया है।
  • मित्रो मरजानी को गीता राजन और हाजी नरसिम्हा जैसे लेखकों ने अंग्रेजी में अनुवादित किया, जिसके कारण सोबती को काफी प्रसिद्धि मिली। महान आलोचक और विद्वान निखिल गोविंद के अनुसार “मित्रो मरजानी ने हिंदी उपन्यास को महिलाओं के प्रति सामाजिक यथार्थवाद की जड़ता और रूढ़िवादी धारणाओं को तोड़ने की अनुमति दी।”
  • 1968 में दो उपन्यास और प्रकाशित हुए “यारों के यार (दोस्तों का दोस्त)” और “टिन पहर”।
  • कृष्णा सोबती का अगला उपन्यास, सूरजमुखी अंधारे के (सनफ्लावरस ऑफ द डार्क) 1972 में प्रकाशित हुआ। जिसमें बचपन में हुए दुर्व्यवहार से उबरने के लिए एक महिला के संघर्ष की कहानी को बखूबी बयां किया गया।
  • “ऐ लड़की, (हे गर्ल)” एक ऐसा उपन्यास था जिसकी कहानी मौत के नज़दीक पड़ी एक बूढ़ी औरत और उसकी सेवा करती उसकी बेटी के बीच की थी, जो उसकी सेवा एक साथी और नर्स के रूप में करती है।
  • कृष्णा सोबती ने एक ऐसा उपन्यास भी लिखा है जो एक काल्पनिक आत्मकथा है, जिसका शीर्षक “गुजरात पाकिस्तान से गुजरात हिंदुस्तान तक” (गुजरात से, पाकिस्तान, गुजरात तक, भारत) था।
  • उनका सबसे हालिया उपन्यास “दिल-ओ-दानिश” (दिल और दिमाग) था।

कृष्णा सोबती की मृत्यु

अपनी वृद्धावस्था में जब यह अपना 70 वां जन्मदिन मना रहीं थीं, उस समय अचानक ही इन्होंने डोगरी लेखक शिवनाथ के साथ विवाह कर लिया। जो कि संयोग से उसी दिन, उसी साल पैदा हुए थे, जिस दिन और वर्ष में इनका जन्मदिन था। विवाह के बाद यह जोड़ा पूर्वी दिल्ली के पटपड़गंज के पास मयूर विहार के एक अपार्टमेंट में साथ रहने लगा। कुछ सालों बाद शिवनाथ के मृत्यु हो गई, परंतु कृष्णा सोबती ने वहां अकेले ही रहना जारी रखा। लंबी बीमारी की वजह से 25 जनवरी 2019 को दिल्ली में ही कृष्णा सोबती ने अपनी आखिरी सांस लीं।

कृष्णा सोबती के पुरुष उपनाम “हशमत” द्वारा किए गए कार्य

1960 के दशक की शुरुआत में, कृष्णा सोबती ने पुरुष उपनाम “हशमत” के तहत छोटे प्रोफाइल और कॉलम की एक श्रृंखला भी प्रकाशित की। इन्हें 1977 में “हम हशमत” के शीर्षक में संकलित और प्रकाशित किया गया था। साथ ही इसमें भीष्म साहनी, निर्मल वर्मा और नामवर सिंह जैसे लेखकों की प्रोफाइल भी शामिल की गई। उन्होंने अपने उपनाम के बारे में कहा है कि, “हम दोनों की अलग-अलग पहचान है। मैं संरक्षित करती हूं और वह खुलासा कर देता है; मैं पुरानी विचारधारा की हूं और वह आजकल के नए विचारों वाला, बिल्कुल नया, बिल्कुल नई सोच वाला; हम दोनों विपरीत दिशाओं में काम करते हैं। उनके वह सभी स्तंभ जो उन्होंने “हशमत” उपनाम का प्रयोग करके लिखे थे, बहुत सारे लेखकों और आलोचकों द्वारा प्रशंसा के पात्र बने। जिसमें कि एक लेखक अशोक वाजपेई ने उनकी प्रशंसा में यहां तक कह दिया कि “किसी भी लेखक में इतना धीरज नहीं कि वह इस तरह लिख सके।” इसी प्रकार सुकृता पॉल कुमार ने भी सोबती के इस उपनाम के प्रयोग को सही बताते हुए उनका समर्थन करते हुए कहा “इस प्रयोग के साथ सोबती ने बिना किसी अवरोध के अपने लेखन के कार्य को अधिक सक्षम बनाया।”

कृष्णा सोबती के कुछ प्रमुख कार्यों की सूची

उपन्यास

  • ज़िन्दगीनामा
  • मितरो मरजानी
  • डार से बिछुड़ी
  • सूरजमुखी एंडी के
  • यारों के यार (दोस्तों के दोस्त)
  • सामे सरगम (समय के संगीत नोट्स)
  • ऐ लादकी
  • दिल-ओ-दानिश
  • बादलों के घेरे (बादलों के वृत्त)
  • गुजरात पाकिस्तान से गुजरात हिंदुस्तान (पाकिस्तान में गुजरात से भारत में गुजरात तक)
  • हम हशमत
  • टिन पहाड
  • मुक्तिबोध: एक व्यकितव सहि की तलश में , (मुक्तिबोध: अधिकार की तलाश में एक व्यक्तित्व)
  • शबडन के आलोक मीन , (इन द लाइट ऑफ़ वर्ड्स),
  • सोबती एक सोहबत , (सोबती: एक कंपनी),
  • लेखक का तंत्र , (एक लेखक का लोकतंत्र)
  • मारफत दिल्ली , (सी / ओ दिल्ली)
  • जैनी मेहरबान सिंह
  • बुद्ध का कमंडल लद्दाख

छोटी कहानियां

  • नफीसा
  • सिक्का बादल गया

अनुवाद

  • तुम्हारे साथ नरक करने के लिए मिटो! (मित्रो मरजानी)
  • मेमोरीज़ डॉटर (डार से बिछुड़ी)
  • सुनो लड़की (ऐ लद्की)
  • ज़िन्दगीनामा – ज़िंदा रुख़ (उर्दू)
  • द हार्ट हैज़ इट्स रीजन्स (दिल-ओ-दानिश)

कृष्णा सोबती को दिए गए सम्मान एवं पुरस्कार

  • कृष्णा सोबती को 1980 में ज़िंदगीनामा के लिए साहित्य अकादमी पुरस्कार से सम्मानित किया गया।
  • 1981 में शिरोमणि पुरस्कार के अतिरिक्त मैथिली शरण गुप्त सम्मान से सम्मानित किया गया।
  • 1982 में कृष्णा सोबती को हिंदी अकादमी पुरस्कार से पुरस्कृत किया गया। सोबती को में भारत के राष्ट्रीय साहित्य अकादमी के साहित्य अकादमी के “फेलो” के रूप में भी नियुक्त किया गया था। उनकी नियुक्ति के बाद दिए गए प्रशस्ति पत्र में, अकादमी ने उनके लेखन कृति की प्रशंसा करते हुए कहा कि, “नई और भिन्न अंतर्दृष्टि और आयामों के साथ कृष्णा सोबती ने 5 दशकों की लंबी रचनात्मकता के हर कदम पर साहित्य को जीवन का न केवल सच्चा खेल क्षेत्र माना है, अपितु उन्होंने जीवन को दुर्जेय दर्पण की भांति लिया है।
  • 1996 में कृष्णा सोबती को साहित्य अकादमी फेलोशिप (जो कि अकादमी का सर्वोच्च पुरस्कार होता है) से पुरस्कृत किया गया।
  • 1999 में, लाइफटाइम लिटरेरी अचीवमेंट अवार्ड के साथ कृष्णा सोबती प्रथम महिला बनीं जिन्हें कथा चूड़ामणि अवार्ड से नवाजा गया।
  • 2008 में हिंदी अकादमी दिल्ली का शलाका अवार्ड भी उनको मिला। इसके साथ ही उनका उपन्यास “सम्य सरगम” के.के. बिरला फाउंडेशन इंस्टीट्यूट द्वारा “व्यास सम्मान” के लिए चयनित किया गया।
  • कृष्णा सोबती को 2010 में भारत सरकार द्वारा पद्म भूषण की पेशकश की गई थी, जिसे उन्होंने यह कहते हुए स्वीकार करने से मना कर दिया था कि, “एक लेखक के रूप में, मुझे संस्थान से दूरी बनाकर रखनी होगी। मुझे लगता है कि मैंने सही काम किया।”
  • 2015 में, कृष्णा सोबती ने दादरी में हुए दंगों के बाद सरकारी निष्क्रियता का हवाला देते हुए अपने दोनों अवार्ड और फेलोशिप सरकार को सरकार को वापस लौटाते हुए, बोलने की स्वतंत्रता के साथ-साथ हिंदी लेखकों के विषय में सरकार के मंत्री द्वारा की गई टिप्पणियों के बारे में चिंता से सरकार को अवगत करवाया।
  • कृष्णा सोबती को ‘भारतीय साहित्य में पथ-प्रदर्शक योगदान’ के लिए 2017 में ज्ञानपीठ पुरस्कार से सम्मानित किया गया। भारतीय ज्ञानपीठ ने कृष्णा सोबती को पुरस्कार देते समय अपने भाषण में कृष्णा सोबती की प्रशंसा करते हुए कहा कि कृष्णा सोबती के लेखन में उनके द्वारा किया जाने वाला हिंदी, उर्दू और पंजाबी संस्कृति का मिश्रण उनकी भाषा में साफ दिखाई देता है, जहां एक तरफ उनकी कहानी के पात्र हमेशा ही दबंग और साहसी होते हैं वहीं दूसरी तरफ वह समाज द्वारा दी गई किसी भी चुनौती को स्वीकार करने में जरा भी पीछे नहीं हटते।

NO COMMENTS

Leave a Reply