जानिए स्वामी रामकृष्ण परमहंस के शिष्य स्वामी ब्रह्मानंद का उत्कृष्ट जीवन परिचय

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पिछली शताब्दी के उत्तरार्ध में दक्षिणेश्वर के मंदिर-उद्यान में एक अद्भुत नाटक किया गया था। श्री रामकृष्ण, जो पहले मंदिर के पुजारी के रूप में आए थे, ने यंत्रवत रूप से पूजा से जुड़े अनुष्ठानों को करने के बजाय, प्रकृति के एक बच्चे की भांति खुद से पूछा, क्या वह जिस देवी की पूजा करतें हैं, क्या वह कभी जीवित रूप में उपस्थित थे या फिर मात्र एक पत्थर की छवि हैं। और इस तरह के विचारों ने इस युवा पुजारी की भक्ति की छवि को जीवंत कर दिया, जब दिव्य माँ ने उन्हें माता के समान स्नेहपूर्वक छूते हुए दिव्य दृष्टि प्रदान की।

Table Of Contents
  1. श्री रामकृष्ण परमहंस का विचित्र स्वप्न
  2. स्वामी ब्रह्मानंद का प्रारंभिक जीवन एवं शिक्षा
  3. नरेंद्र नाथ (स्वामी विवेकानंद) और स्वामी ब्रह्मानंद का मिलन
  4. स्वामी ब्रह्मानंद का विवाह
  5. स्वामी ब्रह्मानंद की आध्यात्मिक यात्रा की शुरूआत
  6. स्वामी ब्रह्मानंद का दक्षिणेश्वर जाना एवं पारिवारिक विरोध
  7. स्वामी ब्रह्मानंद द्वारा आध्यात्मिक ज्ञान की प्राप्ति
  8. देवी के दर्शन की पुष्टि तथा आध्यात्मिक प्रगति
  9. आध्यात्मिक अभ्यास के विभिन्न रूपों को सीखना
  10. जब श्री रामकृष्ण परमहंस ने की शिष्य के लिए देवी मां से कठिन प्रार्थना
  11. नरेंद्र नाथ (स्वामी विवेकानंद) द्वारा राखल को दिया गया नाम
  12. गुरु का अंतिम समय समय
  13. गुरु के निधन के बाद
  14. श्री रामकृष्ण परमहंस के मठ एवं मिशन की अध्यक्षता
  15. स्वामी ब्रह्मानंद, एक महान व्यक्तित्व
  16. स्वामी ब्रह्मानंद का अंतिम महत्वपूर्ण कार्य
  17. स्वामी ब्रह्मानंद का अंतिम समय

श्री रामकृष्ण परमहंस का विचित्र स्वप्न

जैसे-जैसे समय बीतता गया, श्री रामकृष्ण परमहंस ने दक्षिणेश्वर में काली मां की छवि को एक जीवंत वास्तविकता के रूप में पाया। उन्हें काली मां के दर्शन चलते फिरते सामान्य अवस्था में होने लगे बिल्कुल उसी प्रकार जैसे किसी बच्चे को अपनी मां दिखाई देती हो और वह काली मां के साथ उसी मासूम बच्चे की भांति बातें करने लगे। उनके लिए काली मां का यह अस्तित्व दुनिया के किसी भी भौतिक वस्तु की तुलना से कहीं अधिक था। समय बीतने के साथ उन्होंने साधना के विभिन्न रूपो के माध्यम से भगवान के अलग-अलग पहलुओं को महसूस करना प्रारंभ किया और धीरे धीरे उनका मस्तिष्क आगे-पीछे द्वैतवाद के स्तर से उच्चतम अद्वैतवाद की ओर बढ़ता गया, जहां उपासक और पूज्य एक हो जाते हैं और दुनिया शून्य हो जाती है। उनका मन एक ऐसे स्तर में पहुंच चुका था जहां कोई भी सांसारिक विचार उनके लिए असंभव नहीं था। वे त्याग की प्रतिमूर्ति थे। यहां तक कि अगर अनजाने में उनकी उंगलियां किसी धातु की मुद्रा को छूती, तो उनका पूरा शरीर पीछे हट जाता, जैसा कि सिक्के ने उनके दिमाग में इन्द्रिय सुख की मानवीय इच्छा का प्रतिनिधित्व किया हो। संसार में होते हुए भी उनका मन संसार की पहुंच से बाहर था। उनका मन दर्शन, परमानंद और दिव्य संचार में चुका था। एक दिन श्री रामकृष्ण परमहंस ने एक स्वप्न देखा जिससे उनके पूरे शरीर में कंपकंपी हो उठी। उन्होंने देखा कि देवी माँ ने उन्हें एक लड़के के की ओर इशारा करते हुए यह कहा कि यह उन (श्री रामकृष्ण) का पुत्र है। उनका पुत्र कैसे हो सकता है? उनके लिए तो यह विचार एक मृत्यु के समान प्रतीत हो रहा था तब देवी मां ने इन्हें बेचैन होता देख सांत्वना दी और कहा कि यह उनका आध्यात्मिक पुत्र है ना कि सांसारिक पुत्र। यह सुनते ही श्रीरामकृष्ण ने चैन की सांस ली। कुछ समय बीतने के पश्चात जब एक शिष्य के रूप में (जो आने वाले समय में स्वामी ब्रह्मानंद के नाम से जाने गए) उनके पास आए तो श्री रामकृष्ण ने तुरंत ही उन्हें अपने आध्यात्मिक पुत्र के रूप में पहचान लिया।

स्वामी ब्रह्मानंद का प्रारंभिक जीवन एवं शिक्षा

स्वामी ब्रह्मानंद का प्रारंभिक नाम ‘राखल चंद्र घोष’ था। वह चौबीस परगना जिले के बशीरहाट में एक धनी परिवार से ताल्लुक रखते थे। उनके पिता ‘आनंद मोहन घोष’ एक जमींदार थे। इनकी माता एक धर्मपरायण स्त्री और श्रीकृष्ण की भक्त थीं। शायद यही कारण था कि उन्होंने अपने पुत्र का नाम राखल (अर्थात् श्रीकृष्ण का लड़का-साथी) रखा था। इनका जन्म 1863 में हुआ था, परंतु दुर्भाग्य से जब राखल मात्र 5 वर्ष के थे तो इनकी माता का स्वर्गवास हो गया इसके बाद उनके पिता ने राखल की परवरिश को ध्यान में रखते हुए दूसरा विवाह किया। राखल बचपन से ही स्वस्थ और देखने में अत्यंत सुंदर थे। उनका रूप कुछ ऐसा था कि जो भी उन्हें देखता उनका ही हो जाता। उन्हें गाँव के स्कूल में भेजा गया था जिसे आनंद मोहन (राखल के पिता) ने मुख्य रूप से अपने पुत्र की खातिर शुरू किया था। उन दिनों गाँव स्कूलों में अध्यापक अपनी छड़ियों का उपयोग करने के लिए जाने जाते थे। जब कभी राखल के किसी सहपाठी को दंड मिलता तो इन्हें भी पीड़ा होती थी। जब शिक्षक का ध्यान इस बात की ओर गया तो शिक्षकों ने छड़ियों का प्रयोग करना पूरी तरह से बंद कर दिया। एक छात्र के रूप में राखल अपनी बुद्धिमत्ता के लिए पूरे गांव में प्रसिद्ध थे। हालांकि राखल शारीरिक रूप से अपने साथियों से अधिक शक्तिशाली थे परंतु फिर भी विभिन्न प्रकार के खेल उनका ध्यान अपनी तरफ नहीं खींच पाए खेल के मैदान के पास ही देवी काली का एक मंदिर था राखल ज्यादातर समय उस मंदिर के प्रांगण में बिताया करते थे। वे मंदिर के प्रांगण में ही अपने मित्रों के साथ देवी मां की पूजा करने का खेल खेला करते थे। यहां तक की कभी-कभी वह स्वयं माता की सुंदर मूर्ति मिट्टी से बनाते और उसकी पूजा में लीन हो जाते थे। दुर्गा पूजा के समय राखल को अत्यंत शांत और गहरे ध्यान में लीन देखा गया। कई बार उन्हें अंधेरे में देवी का ध्यान करते हुए देखा गया, कुछ लोगों ने राखल को घंटों खड़े होकर देवी का ध्यान करते हुए देखा। राखल का बचपन से ही भक्ति संगीत के प्रति सहज प्रेम था। जब भीख मांगने वाले वृंदावन के बांसुरी वादक देवी की प्रशंसा में गीत गाते तो राखल अपने आप उन गीतों में खो जाते थे। कभी-कभी राखल अपने साथियों के साथ गाँव के पास खुले मैदान के बीच में एक सुनसान जगह जाकर देवी के गीत गाते और नाचते थे। कई बार राखल देवी की भक्ति में इतना लीन हो जाते कि वह अपनी सुध-बुध भी खो बैठते थे।

नरेंद्र नाथ (स्वामी विवेकानंद) और स्वामी ब्रह्मानंद का मिलन

प्राथमिक शिक्षा पूरी करने के बाद, राखल को कलकत्ता भेजा गया और एक अंग्रेजी हाई स्कूल में भर्ती कराया गया। यहां वह नरेंद्र नाथ के संपर्क में आए, जिन्हें बाद में स्वामी विवेकानंद के नाम से जाना गया, जो उस समय इलाके के लड़कों के नेता थे। नरेंद्र नाथ जोशीले और जन्मजात नेता थे। उन्हें आसानी से दूसरों पर अपना प्रभाव डालना आता था। राखल बहुत ही नम्र, शांत और मृदु स्वभाव के थे। वह आसानी से नरेंद्र नाथ के इस व्यक्तित्व से मोहित हो गए और जल्द ही दोनों के बीच घनिष्ठ मित्रता हो गई जो आने वाले समय में दक्षिणेश्वर में एक सामान्य शिष्यत्व में परिणत हुई और दूरगामी परिणामों के रूप में फलदायी बनी।

स्वामी ब्रह्मानंद का विवाह

राखल और नरेंद्र नाथ ने अपने अन्य साथियों के साथ एक सामान्य व्यायामशाला में शारीरिक व्यायाम का अभ्यास किया करते थे और यहीं से नरेंद्र नाथ राखल को ब्रह्म समाज में ले गए। इस स्तर पर राखल की जन्मजात धार्मिक प्रवृत्तियों ने खुद को और अधिक निश्चित रूप से प्रकट करना शुरू कर दिया। कई बार यहां राखल को जीवन और मृत्यु के रहस्य पर चिंतन करते हुए देखा गया, उनका मन सदैव एक शाश्वत सत्य की प्राप्ति की खोज करता था। राखल अत्यंत तीव्र बुद्धि के थे परंतु इस समय तक उनका पूरा ध्यान स्कूल में होने वाली पढ़ाई से उठ चुका था पढ़ाई के प्रति उनकी इस उदासीनता को देख उनके माता-पिता चिंतित हो गए और उन्होंने पहले प्यार से और बाद में थोड़े कड़े रवैए से राखल को पढ़ाई की उपयोगिता सिखाने का प्रयत्न किया, परंतु वे विफल रहे। जब सभी उपाय निष्फल साबित हुए, तो राखल के पिता ने यह सोचकर उनका विवाह कर दिया कि इससे उनकी रुचि सांसारिक चीजों की ओर हो जाएगी। लेकिन किस्मत की ये विडम्बना थी कि इस विवाह से ही राखल को शख्स के संपर्क में आए जिन्होंने उनकी पूरी जिंदगी बदल दी। राखल ने दक्षिणेश्वर से कुछ मील की दूरी पर गंगा के पास के एक गाँव कोनगर के मनमोहन मित्रा की बहन से विवाह किया।

स्वामी ब्रह्मानंद की आध्यात्मिक यात्रा की शुरूआत

मनमोहन और उनकी माता दोनों ही श्रीरामकृष्ण के परम भक्त थे। राखल की शादी के बाद, मनमोहन एक दिन उन्हें अपने गुरु से मिलवाने के लिए दक्षिणेश्वर ले गए। जब राखल ने मनमोहन के गुरु को प्रणाम किया तो उन्होंने एक क्षण में पहचान लिया कि यह वही लड़का है जिसे उन्होंने स्वप्न में अपने आध्यात्मिक पुत्र के रूप में देखा था। गुरु के मन और शरीर में खुशी की लहर दौड़ गई, लेकिन उन्होंने अपनी भावनाओं को राखल के सामने आने नहीं दिया और उनके साथ अपना व्यवहार सौम्या रखा। राखल, मनमोहन के गुरु के इस अद्भुत प्रेम से मंत्रमुग्ध हो गए, उन्हें ऐसा लगा कि इससे पहले उन्हें इतना स्नेह कभी किसी से प्राप्त ही नहीं हुआ। इसी कारण गुरु से मिलने के पश्चात घर वापस आने पर भी राखल के मन में केवल गुरु और वहां पर हुई बातें ही घूमती रही नतीजा कुछ समय पश्चात राखल अकेले ही दक्षिणेश्वर के लिए निकल गए राखल को देखते ही गुरु अत्यंत आनंदित हुए।

स्वामी ब्रह्मानंद का दक्षिणेश्वर जाना एवं पारिवारिक विरोध

राखल को जब भी मौका मिलता दक्षिणेश्वर चले जाते, धीरे धीरे उन्होंने वहां पर रुकना भी प्रारंभ कर दिया। उस समय 18 अथवा 19 वर्ष के आयु के जाखल जब भी गुरु के समीप होते तो वह स्वयं को चार या पाँच वर्ष के बच्चे की तरह महसूस किया करते थे। राखल ने गुरु में अपनी खोई हुई मां के स्नेह को महसूस करना प्रारंभ कर दिया था साथ ही गुरु के स्नेह में उन्हें अपने पिता का अनुभव भी होता था। गुरु ने भी उनके साथ ठीक वैसा ही व्यवहार किया जैसे कि वह उनके स्वयं की संतान हो। जहां एक ओर अन्य शिष्यों को अपने गुरुओं की देखभाल करते हुए देखा जा सकता था, वहीं दूसरी ओर राखल के गुरु, राखल की सुख सुविधाओं का ध्यान रखते हुए दिखाई पड़ते थे। दोनों के बीच यह रिश्ता स्वाभाविक रूप से जन्मा था जबकि अन्य शिष्यों की नजर में ऐसा लगता मानो राखल को उनके गुरु ने कुछ विशेषाधिकार दे रखें हों। धीरे-धीरे राखल का दक्षिणेश्वर आना-जाना बढ़ता गया जिसे देख इनके पिता पहले चिंतित हुए और बाद में क्रोधित होने लगे। एक बार तो उन्होंने राखल के ऊपर अपनी निगरानी को बहुत कड़ा कर लिया था। परंतु राखल उनकी निगरानी से बचकर दक्षिणेश्वर भागने में सफल हुए। जब आनंद मोहन को एहसास हो गया कि अब वह राखल को सांसारिक कार्यों के तरफ नहीं मोड़ सकते तो उन्होंने हार मान ली। इसके पश्चात राखल ने भी राहत महसूस की क्योंकि अब उन्हें घर से दक्षिणेश्वर जाने में किसी रोक टोक का सामना करना नहीं पड़ेगा।

स्वामी ब्रह्मानंद द्वारा आध्यात्मिक ज्ञान की प्राप्ति

राखल को अपने गुरु से ना केवल माता पिता का स्नेह प्राप्त हो रहा था अपितु गुरु उनके लिए आध्यात्मिक गुरु की भांति उनका मार्गदर्शन भी कर रहे थे। गुरु और शिष्य का यह प्रेम अत्यंत अद्भुत और बेजोड़ था। जिसके पीछे केवल मानवीय स्नेह ही नहीं अपितु आध्यात्मिक शक्ति भी थी। धीरे धीरे राखल ने आध्यात्मिक ज्ञान को लेना शुरू कर दिया जरूरत पड़ने पर गुरु ने राखल को डांटने से जरा भी हिचकिचाहट महसूस नहीं की। एक बार जाखल से मुख पर अंधेरा था, जिसे देख उनके गुरु ने उनसे पूछा ‘क्या यह उनके द्वारा की गई किसी गलती का परिणाम है?, यह सुनकर के राखल आश्चर्य में पड़ कर सोचने लगे परंतु उन्हें कुछ याद नहीं आया। परंतु जब गुरु के साथ बात आगे बढ़ी तो उन्होंने मजाक मजाक में झूठ कह दिया। उस समय उनके गुरु ने उनसे कहा कि जीवन में कभी असत्य मत बोलना चाहे वह मजाक ही क्यों ना हो। एक दिन राखल अपने गुरु के साथ एक धार्मिक उत्सव में शामिल होने के लिए गए लेकिन उत्सव का आयोजन वहां पर आए अमीर और प्रभावशाली लोगों की आवभगत करने में व्यस्त था और उसने ज्ञानी गुरु की तरफ बहुत कम शिष्टाचार दिखाया यह देख राखल को अत्यंत क्रोध आया और उन्होंने गुरु से आग्रह किया कि वापस चलें परंतु उनके गुरु ने वापस चलने से मना कर दिया। बाद में उन्होंने राखल से कहा कि अगर वे नाराज होकर वहां से चले जाते तो वहां पर आए भक्तों का मन दुखी होता। राखल गुरु की इन बातों को सुनकर सोच में पड़ गए और यहां से उन्होंने नम्रता का पाठ सीखा।

देवी के दर्शन की पुष्टि तथा आध्यात्मिक प्रगति

कभी-कभी आध्यात्मिक भाव में श्री रामकृष्ण परमहंस अप्रत्याशित रूप से अपने चुने हुए शिष्यों को उपहार दिया करते थे इसी संबंध में एक बार उन्होंने राखल को भी उपहार देने के लिए सोचा जब गुरु राखल के पास उन्हें उपहार देने पहुंचे तो उन्होंने देखा कि राखल काली मां के मंदिर में बैठकर ध्यान में मग्न है। राखल को ध्यान में बैठा देख गुरु ने उन्हें प्रणाम करते हुए कहा कि “यह तुम्हारा पवित्र वचन है और यह तुम्हारा चुना हुआ आदर्श है।” राखल ने ऊपर देखा और अपने चुने हुए देवता के दर्शन की पुष्टि की। कृपा की इस अप्रत्याशित घटना के कारण राखल ने स्वयं को अत्यंत उल्लास से भरा हुआ महसूस किया, साथ ही उन्हें अपने भीतर आध्यात्मिक शक्ति का एहसास हुआ। ऐसा होते कई बार देखा गया कि राखल देवी का ध्यान करते करते इतने ज्यादा तल्लीन हो गए कि उनके गुरु को बुलाकर उन्हें वापस चेतना में लाया गया। राखल की आध्यात्मिक प्रगति से उनके गुरु अत्यंत प्रसन्न थे।

आध्यात्मिक अभ्यास के विभिन्न रूपों को सीखना

राखल के समान एक योग्य शिष्य को पाकर श्री रामकृष्ण आनंद से परिपूर्ण हो गए थे उन्होंने अपने शिष्य को आध्यात्मिक अभ्यास के विभिन्न रूपों को सिखाना शुरू किया। राखल किसी भी रूप में सार्वजनिक रूप से अपनी अध्यात्मिक साधना को करना पसंद नही था। इसीलिए यथासंभव वह गुप्त रूप से ही साधना किया करते थे। परंतु उनका रूप, विचार, आचरण और सबसे बढ़कर उनकी प्रकृति की दीप्तिमान मिठास उनके आंतरिक परिवर्तन की ओर इशारा कर रही थी, जो समय के साथ उनके भीतर जन्म ले रहा था। आध्यात्मिक रूप से भाग्यशाली होने के पश्चात भी राखल को तनाव और संघर्ष की स्थिति से गुजरना पड़ा। एक दिन राखल काली मां के मंदिर के संगीत कक्ष में ध्यान के लिए बैठे थे लेकिन कई बार कोशिश करने के बावजूद भी वह अपने मन को एकाग्र चित्त नहीं कर पा रहे थे जिसके कारण उन्हें क्रोध आ गया और उनका मन पश्चाताप तथा आत्मनिंदा से भर गया। इतने महान गुरु के आशीर्वाद तथा ऐसे आध्यात्मिक वातावरण के पश्चात भी उनका मन एकाग्रचित्त नहीं हो पा रहा, शायद वह आध्यात्मिक जीवन के योग्य नहीं हैं। इस प्रकार के विचारों ने उनके मन को व्यथित कर दिया। जिसके कारण वे ध्यान छोड़ कर के उठने वाले ही थे कि तभी संजोग से उनके गुरु उस तरफ गुजर रहे थे। उन्होंने जब राखल को इस अवस्था में देखा तो उनसे प्रश्न किया, राखल ने भी सब कुछ अपने गुरु को बताया। गुरु ने राखल की बात को ध्यानपूर्वक सुनने के बाद राखल से उनका मुंह खोलने का आग्रह किया। कुछ अस्पष्ट शब्दों को गुनगुनाते हुए गुरु ने राखल की जुबान पर कुछ लिखा जिसके कारण पश्चात राखल को ऐसा महसूस हुआ जैसे उनके मस्तिष्क से सारा बोझ उतर गया हो, उन्होंने राहत महसूस की और उनके मन में आनंद की आंतरिक धारा प्रवाहित हुई, जिसे देख गुरु मुस्कुराते हुए राखल को पुनः ध्यान करने के लिए कहा और वहां से चले गए। राखल के जीवन में ऐसा कई बार हुआ जब उनका मन विचलित हुआ, परंतु हर बार उनके गुरु के आशीर्वाद से उन्होंने अपने आध्यात्मिक यात्रा को पूरा करना जारी रखा।

जब श्री रामकृष्ण परमहंस ने की शिष्य के लिए देवी मां से कठिन प्रार्थना

राखल दक्षिणेश्वर में गुरु के साथ आनंदित समय बिता रहे थे। लेकिन तभी दुर्भाग्य से उन्हें बार बार बुखार आने लगा जिसके कारण उनके गुरु अत्यंत चिंतित हो उठे ‌। उस समय एक और महान शिष्य बलराम बोस वृंदावन जाने वाले थे। उनके साथ राखल को भी जलवायु परिवर्तन के लिए भेज दिया गया। परंतु वहां जाने के पश्चात भी राखल बीमार पड़ गए, जिसके कारण उनके गुरु अत्यंत चिंतित हो उठे। गुरु को भय था कि यदि राखल को अपना पिछला जन्म याद आ गया तो कहीं वह अपना शरीर ना त्याग दें। इसी कारण उनके गुरु ने देवी मां से प्रार्थना करना प्रारंभ किया और तब तक प्रार्थना करते रहे जब तक की देवी मां की तरफ से उन्हें आश्वासन नहीं मिल गया। तीन महीने के बाद राखल दक्षिणेश्वर लौट आए, उनके स्वास्थ्य में हुए सुधार को देखकर उनके गुरु अत्यंत प्रसन्न हुए। गुरु के व्यक्तित्व से आकर्षित होने वाले भक्तों और युवा शिष्यों की संख्या लगातार बढ़ती जा रही थी। कुछ युवा शिष्य राखल के पुराने मित्र और परिचित थे; इसलिए वह उनके साथ सामान्य शिष्यत्व का बंधन पाकर खुश थे। लेकिन वे सभी लंबे समय तक गुरु की पवित्र संगति का आनंद नहीं लेना चाहते थे। श्री रामकृष्ण परमहंस को गले से जुड़ी एक बीमारी हो गई जो वक्त के साथ कैंसर में बदल गई। श्री रामकृष्ण परमहंस को बेहतर इलाज की सुविधा के लिए श्यामपुकुर, कलकत्ता और फिर कोसीपोर ले जाया गया। नरेंद्र नाथ के नेतृत्व में राखल और उनके अन्य साथियों ने गुरु की देखभाल करने में कोई कमी नहीं छोड़ी और पूरी जी जान लगा दी। गुरु की सेवा के साथ इन्होंने आध्यात्मिक अनुशासन का भी पालन किया।

नरेंद्र नाथ (स्वामी विवेकानंद) द्वारा राखल को दिया गया नाम

एक दिन गुरु ने नरेंद्र नाथ से गुप्त रूप से कहा, “राखल के पास एक विशाल राज्य का संचालन करने की बुद्धि और क्षमता है।” नरेंद्र नाथ समझ गए कि इसका क्या मतलब है। और समय आने पर उन्होंने राखल के विषय में गुरु की इस राय का फायदा उठाया। युवा शिष्यों ने राखल को बहुत सम्मान दिया क्योंकि वे गुरु की अत्यंत प्रेम और प्रशंसा के पात्र थे। एक दिन नरेंद्र नाथ ने अपने भाई-शिष्यों को सुझाव दिया, “आगे से हम राखल को राजा नाम से पुकारेंगे जिसका अर्थ ‘राजा’ होगा।” प्रत्येक व्यक्ति इस प्रस्ताव पर स्वतःस्फूर्त सहमति प्रदान करता चला गया। जब यह खबर गुरु के कानों तक पहुंची तो वे प्रसन्न हुए और उन्होंने कहा, “वास्तव में यह राखल के लिए एक उपयुक्त नाम है।”

गुरु का अंतिम समय समय

बीतने के साथ गुरु की हालत धीरे-धीरे बद से बदतर होती जा रही थी। एक दिन राखल गुरु से प्रार्थना की कि वह देवी मां से जीवन के लिए प्रार्थना करें। इस पर गुरु ने उन्हें समझाया कि “ईश्वर की इच्छा के विरुद्ध किसी भी विशेष चीज के लिए प्रार्थना करना असंभव है और स्वास्थ्य के लिए तो बिल्कुल भी नहीं यदि ईश्वर की इच्छा है तो स्वीकार करना ही समझदारी है।” अथक प्रयास करने के बावजूद भी 16 अगस्त 1886 के दिन परमेश्वर के परम इच्छा पूर्ण हुई और गुरु ने इस संसार से विदा ली। उनके निधन के पश्चात सभी शिष्य और भक्तों के मध्य शोक की लहर दौड़ गई। एकाएक उन्हें ऐसा लगा जैसे उनके ऊपर की सुरक्षा की छत को हटा दिया गया हो, और उन्हें नहीं पता था कि क्या करना है। इस समय राखल की हालत तो और भी अधिक दयनीय थी क्योंकि वह निरंतर गुरु की देखरेख में लगे हुए थे। गुरु ने उनके जीवन में आई हर कठिनाई से उनको उसी प्रकार बचाया था जैसे पक्षी अपने पंखों से अपने बच्चों की रक्षा करता है। अब राखल के पास उन्हें सांत्वना देने वाला कोई नहीं था सिवाय गुरु की उन स्मृतियों के अलावा।

गुरु के निधन के बाद

कोसीपुर उद्यान-घर जहां गुरु को उनके अंतिम दिनों में रखा गया था, एक मठ की तरह बन गया। वहां का वातावरण शिष्यों के आध्यात्मिक उत्साह के साथ-साथ गुरु की उपस्थिति के उत्थान के प्रभाव से भरा हुआ था। गुरु के निधन के बाद कई युवा शिष्य घर लौट आए। दक्षिणेश्वर आकर वे सभी एक आदर्श गुरु की खोज में लग गए, जो उन्हें एक साथ उनके गुरु के सामान रख सके। अंततः बारानागोर में 1 मठ की स्थापना की गई, जिसमें एक-एक करके, गुरु के शिष्य आने लगे और उन्होंने रामकृष्ण ब्रदरहुड का गठन किया। कुछ समय बाद उन्होंने औपचारिक रूप से संन्यास लिया और अपनख पारिवारिक नाम बदल दिया। इस प्रकार राखल, स्वामी ब्रह्मानंद बन गए। लेकिन उनके भाई-शिष्यों ने उन्हें गहरे प्रेम और सम्मान के प्रतीक के रूप में “राजा” के नाम से संबोधित करना पसंद किया। कुछ समय बाद बारानागोर का जीवन भी उन्हें अपने आध्यात्मिक विकास के लिए सुरक्षित लगने लगा। दूसरी बार स्वामी जी वृंदावन आए। यहां उन्होंने कठोर साधना में अपने दिन गुजारे। यहां इनके साथ स्वामी सुबोधानंद भी थे। लेकिन दोनों में बातचीत कम ही होती थी स्वामी सुबोध आनंद उनके लिए भोजन लाते कभी तो वह भोजन कर लेते थे और कभी अपनी तपस्या में इतना लीन रहते कि भोजन तक करना भूल जाते थे उनके लिए भौतिक सुख कोई महत्व नहीं रखता था।


महान संत विजय कृष्ण गोस्वामी, जिन्होंने दक्षिणेश्वर में राखल को देखा है और जानते थे कि वे श्री रामकृष्ण परमहंस के कितने प्रिय थे, इस समय वृंदावन में रह रहे थे। जब उन्होंने देखा कि स्वामी ब्रह्मानंद की कठोर तपस्या हो रही है, तो उन्होंने उनसे पूछा: “आपको इतनी साधना करने की क्या आवश्यकता है? क्या गुरु ने आपको वह सब नहीं दिया जो आध्यात्मिक जीवन में लोभ योग्य है?’ इस पर स्वामी जी ने केवल मुस्कुरा कर उत्तर दिया, “मुझे उनसे जो मिला है, मैं उसे पूरी तरह से आत्मसात करके अपने जीवन में जीवन पर्यंत रखना चाहता हूं।” संत समझ गए कि स्वामी जी अपनी साधना के प्रति अत्यंत समर्पित हैं अतः कुछ समय बाद स्वामी सुबोधानंद तीर्थ यात्रा के लिए हरिद्वार चले गए और स्वामी ब्रह्मानंद वृंदावन अकेले ही रहने लगे। कनखल में स्वामी विवेकानंद कुछ शिष्यों के साथ अप्रत्याशित रूप से स्वामी ब्रह्मानंद से मिलने आए। स्वामी विवेकानंद को डर था कि स्वामी ब्रह्मानंद इतनी कठोर तपस्या और अकेले में रहना कहीं उनके स्वास्थ्य पर विपरीत असर ना डाल दे। इसी कारण उन्होंने स्वामी जी को मेरठ के रास्ते अपने साथ चलने पर मजबूर कर दिया। परंतु कुछ समय पश्चात स्वामी जी पुनः मत लौट आए हैं।

श्री रामकृष्ण परमहंस के मठ एवं मिशन की अध्यक्षता

स्वामी ब्रह्मानंद के मठ में लौटने के दो साल बाद, स्वामी विवेकानंद भी भारत लौट आए। जब वह, स्वामी ब्रह्मानंद से मिले तो उन्होंने अपने भारतीय काम के लिए एकत्र की गई संपूर्ण धनराशि को स्वामी ब्रह्मानंद को सौंपते हुए कहा कि “अब मुझे राहत मिली है। मैंने यह पवित्र ट्रस्ट एक सही व्यक्ति को सौंपा है।” स्वामी ब्रह्मानंद हर दृष्टि से स्वामी विवेकानंद के “मित्र, दार्शनिक और मार्गदर्शक” थे। उन्होंने अपने स्वास्थ्य का ख्याल रखा, अपनी योजनाओं के विषय में सलाह दी, अपने दौरों की व्यवस्था की और अपने विचारों को अमल में लाए। जब राम-कृष्ण मिशन सोसाइटी की शुरुआत हुई तो स्वामी विवेकानंदन सामान्य अध्यक्ष बने और स्वामी ब्रह्मानंद को कलकत्ता केंद्र का अध्यक्ष बनाया गया। लेकिन ज़कोज़ की शुरुआत में स्वामी विवेकानंद ने स्वामी ब्रह्मानंद के पक्ष में अपना पद त्याग दिया, और स्वामी ब्रह्मानंद ने अपने अंतिम दिन तक राम-कृष्ण मठ और मिशन के अध्यक्ष के रूप में काम किया। स्वामी विवेकानंद और स्वामी ब्रह्मानंद के बीच का रिश्ता अद्भुत था और जिसने भी इसे देखा, उसके लिए बहुत सुखद था। स्वामी विवेकानंद को जानवरों से बहुत लगाव था। स्वामी ब्रह्मानंद पौधों और बगीचों के प्रेमी थे। स्वामी विवेकानंद को स्वामी ब्रह्मानंद के प्रति अत्यंत विश्वास था। उनका कहना था कि “कोई भी उनका साथ छोड़ सकता है, परंतु स्वामी ब्रह्मानंद हमेशा उनके साथ खड़े रहेंगे।” इन दोनों महान दिग्गजों ने एक साथ कंधे से कंधा मिलाकर अपने गुरु रामकृष्ण को प्रति समर्पित करते हुए अनेकों कार्य करना प्रारंभ किया।

स्वामी ब्रह्मानंद, एक महान व्यक्तित्व

स्वामी ब्रह्मानंद के संबंध में, श्री रामकृष्ण अपने अद्वितीय तरीके से कहा करते थे कि “राखल एक आम की तरह है जो पके होने पर कोई बाहरी संकेत नहीं देता।” उनका मतलब था कि राखल के भीतर महान आध्यात्मिक क्षमता थी जिसे वे बाहरी दुनिया से सदैव छिपा कर रखते। परंतु स्वामी ब्रह्मानंद द्वारा अपनी शक्तियों को छिपाए रखने के तमाम प्रयासों के बावजूद, उनका आध्यात्मिक व्यक्तित्व सभी लोगों के सामने बाहर आ ही गया और बड़ी से बड़ी संख्या में जिसमें कि सभी वर्गों के लोग शामिल थे जैसे कि अभिनेता और नाटककार, वकील और डॉक्टर, बूढ़े और जवान उनके पास आने लगे। जरूरी नहीं था कि स्वामी जी उनसे आध्यात्मिक बातें करें वास्तव में स्वामी जी अत्यंत शांत स्वभाव के थे लेकिन यदि उनसे कोई आध्यात्मिक प्रश्न पूछता तो वह बहुत ही अच्छे तरीके से उसे समझाते थे। लेकिन फिर भी बहुत से ऐसे लोग थे जो दिन में कम से कम एक बार स्वामी को न देखने पर दुखी होते थे। शायद इस चुंबकीय आकर्षण का एक रहस्य सभी के प्रति उनका गहरा प्रेम था। वे कहते थे, “जो प्रेम बाहर से प्रकट होता है, वह पर्याप्त गहरा नहीं होता।” उनकी खामोशी के पीछे लोगों को अंदाजा नहीं था कि उनका उनके लिए प्रेम कितना महान था। ऐसे असंख्य जीवन थे जो उनके स्पर्श से बदल गए। उनके इस आध्यात्मिक प्रेम की अभिव्यक्ति में अनेकों नवयुवकों ने संसार और सांसारिक आकांक्षाओं का परित्याग कर दिया था। इन नव युवकों का मानना था कि स्वामी जी से मिला प्यार उनके स्वयं के माता पिता के द्वारा किए गए प्रेम से भी अधिक गहरा है। काफी लंबे समय तक स्वामी ने कोई निजी शिष्य नहीं बनाया। वह इस तथ्य से अवगत थे कि शिष्य बनाना उस संबंधित व्यक्ति की आध्यात्मिक जिम्मेदारी अपने ऊपर लेना है और जब तक शिष्य को अपनी मुक्ति नहीं मिल जाती, गुरु स्वेच्छा से उसकी अपनी इच्छा को त्याग देता है। स्वाभाविक रूप से वह केवल उन लोगों को दीक्षा देना चाहते थे जो वास्तव में अपने आध्यात्मिक जीवन को लेकर गंभीर थे। यही कारण था कि वह आध्यात्मिक बातों के बारे में आसानी से बात नहीं करते थे। जो सच्चे साधक थे, उन्हें उनसे उचित मार्गदर्शन मिलता था। उनका मानवीय संबंध अद्भुत था। हमने देखा है कि कैसे हर किसी ने उनके असीम प्रेम का स्पर्श महसूस किया। विचारकों और समाज के नेताओं से लेकर एक विनम्र सेवक तक, हर कोई उनसे बहुत सम्मान पाता था। उनकी शिष्टता और गरिमा उल्लेखनीय थी। उनका मात्र रूप दूसरों उनके प्रति श्रद्धा देने के लिए विवश कर देता था।

स्वामी ब्रह्मानंद का अंतिम महत्वपूर्ण कार्य

स्वामी ब्रह्मानंद का अंतिम महत्वपूर्ण कार्य उनकी व्यक्तिगत देखरेख में पुर से कुछ मील दूर भुवनेश्वर में एक आश्रम का निर्माण करना था। उनका मत था कि भुवनेश्वर में ऐसा आध्यात्मिक वातावरण है कि यदि वहां साधना की जाती तो प्रगति बहुत तेज होती। उन्होंने देखा कि जिन भिक्षुओं को साधना करने की हिदायत दी गई उनके पास स्वयं से साधना करने के लिए पर्याप्त समय नहीं बचता। और जो लोग विशेष रूप से तपस्या करने के लिए ऋषिकेश और अन्य स्थानों पर गए थे, उनका स्वास्थ्य तपस्या करने के कारण बिगड़ता जा रहा था। इसी कारण उनकी इच्छा थी कि एक ऐसा स्थान हो जहां भिक्षुओं को साधना करने के लिए उचित सुविधाएं मिल सकें। एक ऐसा आश्रम जो किसी विशाल खुले स्थान पर हो यहां आस-पास चारों तरफ बगीचे हो।

स्वामी ब्रह्मानंद का अंतिम समय

जब गुरु रामकृष्ण ने पहली बार राखल को देखा था तो उन्होंने इनकी पहचान एक बालक के रूप में की थी, परंतु उन्होंने इनके वास्तविक रूप के विषय में केवल कुछ लोगों को ही बताया था उनका मानना था कि यदि राखल को अपने वास्तविक परिचय का भान हो गया तो वह इस शरीर को छोड़ देंगे। अब जब स्वामी ब्रह्मानंद अपने गुरु के समान ही परमानंद की स्थिति में पहुंचने लगे तो उन्होंने ऐसे ही एक दृष्टांत का उल्लेख किया जिसको सुनने के पश्चात लोग चौकन्ना हो गए।
धीरे-धीरे करके दिन बीते और 10 अप्रैल की शाम स्वामी ब्रह्मानंद ने अपनी आंखें बंद की समाधि लगाने के लिए साथ ही वह उस आत्मा को जो मानवता के कल्याण के लिए इस नश्वर शरीर में आई थी, मुक्त किया। वास्तव में, स्वामी ब्रह्मानंद को देखने के लिए, प्रत्यक्ष रूप से यह समझना जरूरी था कि वह इस दुनिया के थे ही नहीं वह तो किसी और ही दुनिया से संबंध रखते थे वह मानवता के स्तर से कहीं ऊपर थे जैसे ही उनका देवी उद्देश्य पूरा हो गया वे वापस अपनी दुनिया में चले गए।

जो लोग श्री रामकृष्ण परमहंस और स्वामी ब्रह्मानंद दोनों को जानते थे, वे कहते थे कि स्वामी ब्रह्मानंद अपने गुरु की कुछ विशेषताओं का प्रतिनिधित्व करते थे; साथ ही उन दोनों की शारीरिक बनावट में भी कुछ समानताएं थी। जब तक भक्त और शिष्य, स्वामी आनंद के साथ रहे उन्होंने आनंद आनंद का अनुभव किया उनके मन में कभी ऐसा ख्याल तक नहीं आया कि एक दिन इसका अंत होगा। लेकिन उनके देहावसान के बाद अब सभी को ऐसा लग रहा था कि जैसे हिमालय की एक महान चोटी अचानक से शरीर से हटा दी गई है। हर कोई अपने आप से पूछने लगा, “अब, भविष्य के बारे में क्या?”

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