‘हेपेटाइटिस सी’ के लक्षणों को जानिए. 100 में से 2 लोग पीड़ित हैं.

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हेपेटाइटिस सी एक वायरस से होने वाला इनफेक्शन है (वायरस का नाम हेपेटाइटिस सी है) जो मुख्यतया लिवर को प्रभावित करता है। इंफेक्शन के शुरुआती दौर में मरीज के शरीर में या तो बहुत कम लक्षण होते हैं या कोई लक्षण नहीं होता। कभी-कभी हल्का बुखार, गहरे रंग का पेशाब, पेट में दर्द और पीलिया देखा जाता है। लिवर में यह वायरस इनफेक्टेड हुए लोगों में से लगभग 80% में पूरे जीवन रहता है। धीरे धीरे कई साल बीतने पर यह इंफेक्शन लिवर को बीमार कर देता है, और सिरोसिस (cirrhosis) पैदा कर देता है. सिरोसिस में लिवर के अंदर कोशिकाएं बडे पैमाने पर नष्ट हो जाती हैं और उनके स्थान पर फाइबर तंतुओं का निर्माण हो जाता है. जिन मरीजों में सिरोसिस हो जाता है उनमें कई दुष्प्रभाव देखे जा सकते हैं, जैसे लिवर का पूरी तरह काम बंद कर देना (जिसे लिवर फेल होना भी कहते हैं), लिवर कैंसर होना या पेट और खाने की नली में खून की नसों का फूल जाना और फटना।

हेपेटाइटिस सी का वायरस मुख्य रूप से रक्त के जरिए एक मरीज से दूसरे स्वस्थ इंसान में फैलता है। जो लोग नस के ज़रिये नशे का इस्तेमाल करते हैं या वह स्वास्थ्य कर्मचारी जिन्हें किसी मरीज के संक्रमित सुई चुभ जाती है उन्हें इस बीमारी का खतरा ज्यादा होता है। अगर ठीक तरह रक्त को चढ़ाने के पहले स्क्रीनिंग की जाए तो खून चढ़ाने की वजह से हेपेटाइटिस सी होने का चांस हर दस लाख में एक को ही बचता है। गर्भवती महिला को यदि हेपेटाइटिस सी का इंफेक्शन है तो जन्म के दौरान उसके बच्चे को भी यह इंफेक्शन हो सकता है। इस बीमारी से बचने के लिए कोई वैक्सीन उपलब्ध नहीं है।

माना जाता है कि भारत में लगभग 1.5 करोड़ लोग हेपेटाइटिस सी की बीमारी से पीड़ित हैं.

दुनिया भर में लगभग 2% लोग हेपेटाइटिस सी के वायरस से संक्रमित हैं। लगभग 15% लोगों में हेपेटाइटिस सी की वजह से तुरंत लक्षण पैदा हो जाते हैं। ज्यादातर यह लक्षण हल्के-फुल्के लगते हैं जैसे भूख कम हो जाना, थकावट रहना, जी मिचलाना, उल्टी आना, वजन कम होना, मांसपेशियां तथा जोड़ों में दर्द होना इत्यादि. बहुत कम ही ऐसा होता है कि हेपेटाइटिस सी होने के बाद जल्दी ही लिवर फेल हो जाए।

लगभग 10% लोगों में हेपेटाइटिस सी का संक्रमण अपने आप ठीक हो जाता है – ज्यादातर जवान लोगों में तथा महिलाओं में ऐसा देखा गया है।लगभग 80% लोग जिनमें हेपेटाइटिस सी का वायरस होता है उनमें यह बीमारी धीरे धीरे पुरानी हो जाती है। हेपेटाइटिस सी की पुरानी बीमारी को क्रॉनिक हेपिटाइटिस सी का नाम दिया गया है।

hepatitis c can spread with iv drugs

हेपेटाइटिस सी के लगभग 80% संक्रमित लोगों में क्रॉनिक हेपिटाइटिस सी हो जाता है. क्रॉनिक हेपेटाइटिस सी का अर्थ है कि शरीर में कम से कम 6 महीने तक वायरस की गतिविधि देखी जाए. ज्यादातर ऐसे मरीजों को शुरुआती कुछ वर्षों में कोई लक्षण उत्पन्न नहीं होता या बहुत कम मात्रा में होता है। कई वर्षों के बाद क्रॉनिक हेपिटाइटिस सी सिरोसिस या लिवर कैंसर पैदा कर सकता है। लगभग आधे संक्रमित लोगों में लिवर के अंदर चर्बी जमा हो जाती है तथा यह सिरोसिस होने के पहले का चरण होता है। पूरी दुनिया में लगभग 27 परसेंट सिरोसिस तथा 25% लिवर कैंसर का कारण हेपेटाइटिस सी का इंफेक्शन है। लगभग 20% संख्या में हेपेटाइटिस सी से संक्रमित लोग लगभग 30 वर्ष के दौरान सिरोसिस की बीमारी पकड़ लेते हैं। साथ ही सिरोसिस उन लोगों में ज्यादा देखा गया है जिनमें हेपेटाइटिस सी के साथ हेपेटाइटिस बी भी है. जो अधिक मात्रा में शराब का सेवन करते हैं उनमें सिरोसिस होने की संभावना 100 गुना तक बढ़ जाती है।

वे मरीज जिनमें सिरोसिस हो चुका है हो चुका है उनमें लिवर कैंसर की संभावना 20 गुने तक बढ़ जाती है।

लिवर सिरोसिस की वजह से पेट और खाने की नली में खून की नसें फूल सकती हैं तथा उनके फटने से खून की उल्टी आ सकती है. ऐसे मरीजों में पीलिया हो सकता है, पेट के अंदर पानी भर सकता है, लिवर खराब होने की वजह से दिमाग में गफलत आ सकती है तथा पोर्टल हाइपरटेंशन भी हो सकता है।

देखा गया है कि टैटू बनवाने से हेपेटाइटिस सी होने का खतरा दो से तीन गुना बढ़ जाता है। यह ज्यादातर इसलिए होता है कि या तो कीटाणुरहित सुई का इस्तेमाल नहीं किया जाता या स्याही संक्रमित होती है। जिन लोगों में हेपेटाइटिस सी के मरीज के रक्त से संक्रमित सुई चुप जाती है उनमें लगभग 2% चांस होता है कि उन्हें भी यह बीमारी होगी। यह खतरा तब बढ़ जाता है जब चुभने वाली सुई अंदर से खोखली हो और चुभने वाला घाव गहरा हो। मरीज के रक्त से संक्रमित चीजों को इस्तेमाल करने से जैसे रेजर, टूथब्रश, मैनीक्योर या पेडीक्योर करने के यंत्र इत्यादि से हेपेटाइटिस सी का खतरा बढ़ता है। यह जानना जरूरी है कि हेपेटाइटिस सी त्वचा को छूने से, गले मिलने से, छूने से, साथ भोजन करने से या साथ खाना पकाने से नहीं फैलता , ना ही यह खाने या पानी के जरिए फ़ैल सकता है। 10% से भी कम प्रेगनेंसी में गर्भवती महिला से बच्चे को हेपेटाइटिस सी हो सकता है।

हेपेटाइटिस सी की जांच करने के लिए कई तरह के टेस्ट उपलब्ध हैं जैसे कि हेपेटाइटिस सी वायरस एंटीबॉडी एलाईसा टेस्ट, पीसीआर टेस्ट इत्यादि. इन टेस्ट को करने के लिए खून का सैंपल लिया जाता है. यदि रिपोर्ट में हेपेटाइटिस सी की पुष्टि हो तथा शारीरिक लक्षण भी ऐसे हो कि लिवर में हेपेटाइटिस सी के दुष्प्रभाव की संभावना हो तो लिवर की बायोप्सी की जाती है ताकि यह देखा जा सके कि लिवर के अंदर कितना नुकसान हो चुका है

hepatitis c can be diagnosed with blood test

हेपेटाइटिस सी के इन्फेक्शन की वजह से लगभग 80% संक्रमित लोगों में क्रॉनिक हेपिटाइटिस सी अर्थात हेपेटाइटिस सी की लंबी बीमारी रहती है। इनमें से लगभग 95% लोग इलाज की वजह से ठीक रहते हैं। बहुत कम केसेस में देखा गया है कि बिना इलाज के भी मरीज का इन्फेक्शन अपने आप ठीक हो गया हो। ऐसे मरीजों को यह सलाह दी जाती है कि वह शराब का सेवन ना करें तथा लीवर के लिए घातक दवाओं का भी इस्तेमाल ना करें। उन्हें हेपेटाइटिस ए और हेपेटाइटिस बी के लिए वैक्सीन भी लगवानी चाहिए तथा सामान्य रूप से खाई जाने वाली दर्द की दवा से परहेज करना चाहिए क्योंकि इनसे ब्लीडिंग होने का खतरा बढ़ जाता है। ऐसे मरीजों को समय समय पर अल्ट्रासाउंड करा कर लिवर सिरोसिस और लिवर कैंसर की स्क्रीनिंग करने चाहिए।

क्रॉनिक हेपिटाइटिस सी के सभी मरीजों में एंटीवायरल दवाई दी जानी चाहिए। जिन लोगों में कॉम्प्लिकेशन की संभावना अधिक है उनका इलाज प्राथमिकता से किया जाना चाहिए। किस प्रकार का हेपेटाइटिस सी वायरस है इस पर निर्भर होता है कि कौन सी एंटीवायरल दवा दी जाएगी। हेपिटाइटिस सी की वजह से होने वाले सिरोसिस के इलाज के लिए लिवर ट्रांसप्लांटेशन या लिवर प्रत्यारोपण किया जाता है। हालांकि लगभग 90% केस में यह वायरस बाद में दोबारा संक्रमित कर देता है। यदि प्रत्यारोपण के बाद इंटरफेरॉन और रिबाविरिन दी जाए तो दोबारा इन्फेक्शन होने का खतरा घटकर 70% देखा गया है। ऐसे में यह कहना ठीक होगा कि हेपेटाइटिस सी से बचाव ही प्रमुख है तथा यदि संक्रमण हो गया है तो बिना देर किए इलाज शुरू कर देना चाहिए।

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