जानिये भरतनाट्यम की विलक्षण नृत्यांगना ‘रुक्मिणी देवी’ के जीवन के अद्भुत प्रसंग

0
47
rukmini devi

रुक्मिणी देवी भरतनाट्यम शास्त्रीय नृत्य की नृत्यांगना, नृत्य सिखाने वाली (कोरियोग्राफर) और पशुओं के अधिकारों तथा उनके कल्याण के लिए आवाज उठाने वाली एक प्रेरणादायक महिला थीं। भारतीय इतिहास में वह राज्यसभा के सदस्य पद के लिए नामांकित की जाने वाली पहली महिला थी। इन्होंने भरतनाट्यम की सबसे महत्वपूर्ण और प्रचलित धार्मिक शैली “साधीर” का पुनरुत्थान करने के लिए हर संभव प्रयास किया, भरतनाट्यम नृत्य की यह शैली सामान्यता देवदासियों द्वारा मंदिरों में प्रचलित थी, की पारंपरिक भारतीय कला और शिल्प में पुनः स्थापना करने के लिए कार्य किया। उन्होंने उस कारण को जानने की कोशिश की जिसके कारण भरतनाट्यम जैसे महान नृत्य की शैली को अश्लील कला माना जाता था। इन्होंने भरतनाट्यम की साधीर शैली में अंतर्निहित कामुकता को हटाकर उसे स्वच्छ बनाया और साथ ही इसे विक्टोरियन ब्रिटिश नैतिकता और भारतीय उच्च-जाति के कुलीनों के लिए उपयुक्त बनाया।

Table Of Contents
  1. रुक्मिणी देवी का प्रारंभिक जीवन
  2. रुक्मिणी देवी का वैवाहिक जीवन
  3. रुक्मिणी देवी की प्रसिद्ध रूसी बैलेरीना अन्ना पावलोवा से मुलाकात
  4. रुक्मिणी देवी द्वारा ‘साधीर’ के पुनरुत्थान का प्रारंभ
  5. ‘कलाक्षेत्र’ अकादमी की स्थापना
  6. रुक्मिणी देवी की भरतनाट्यम की प्रसिद्ध नृत्य शैली ‘साधीर’ के पुनरुत्थान की कठिन यात्रा
  7. मोंटेसरी पद्धति पर आधारित स्कूल की शुरूआत, ‘बेसेंट अरंडेल सीनियर सेकेंडरी स्कूल’ की स्थापना
  8. रुक्मिणी देवी द्वारा किए गए अन्य महत्वपूर्ण कार्य
  9. जब रुक्मिणी देवी ने राष्ट्रपति पद के नामांकन की पेशकश को बड़े ही साधारण शब्दों में मना कर दिया
  10. रुक्मिणी देवी द्वारा अर्जित की गई उपलब्धियां
  11. Google द्वारा रूक्मिणी देवी को समर्पित की गई श्रद्धांजलि
  12. रूक्मिणी देवी के प्रति समर्पित किए गए सम्मान

रुक्मिणी देवी का प्रारंभिक जीवन

रुक्मिणी देवी का जन्म 29 फरवरी 1904 को भारत के मदुरै में हुआ था। उनके पिता, श्रीमान नीलकांत शास्त्री, लोक निर्माण विभाग में एक इंजीनियर के पद पर कार्यरत होने के साथ ही वह एक विद्वान भी थे और उनकी माता शिषमल एक संगीत-प्रेमी थी। चूंकि रुक्मिणी देवी के पिता की नौकरी हस्तांतरणीय नौकरी थी, जिसके कारण उनका परिवार अक्सर इधर से उधर स्थानांतरित होता रहता था। इनके पिता को 1901 में पहली बार थियोसोफिकल सोसाइटी से सामना हुआ। डॉ. एनी बेसेंट उस समय थियोसॉफिकल मूवमेंट चला रही थी, उनके पिता, डॉ. एनी बेसेंट से बहुत अधिक प्रभावित हुए जिसके परिणाम स्वरूप वह उनके अनुयाई बन गए और रिटायरमेंट के बाद चेन्नई के अडयार में चले गए। जहां उन्होंने थियोसोफिकल सोसाइटी के मुख्यालय के पास ही अपना घर बनाया। यह समय था जब युवा रुकमणी केवल थियोसोफिकल विचारों से ही नहीं अपितु संस्कृति, रंगमंच, संगीत और नृत्य के नए विचारों से अवगत हो रही थीं।

रुक्मिणी देवी का वैवाहिक जीवन

चेन्नई के अडयार में इनकी मुलाकात प्रमुख ब्रिटिश थियोसॉफिस्ट डॉ. जॉर्ज अरुंडेल से हुई, यह उनसे बहुत प्रभावित हुई। डॉ. जॉर्ज अरुंडेल, एनी बेसेंट के करीबी सहयोगी थे जो बाद में वाराणसी के सेंट्रल हिंदू कॉलेज के प्रिंसिपल पद पर नियुक्त हुए। रुक्मिणी देवी की डॉ. जॉर्ज अरुंडेल के साथ हुई मुलाकात आगे चलकर शादी के बंधन में तब्दील हो गई। 1920 में, तत्कालीन रूढ़िवादी समाज को बड़ा झटका लगा जब इन्होंने डॉ. जॉर्ज अरुंडेल के साथ शादी कर ली। शादी के बाद, उन्होंने दुनिया भर की यात्रा की, साथ ही अनेकों थियोसोफिस्टों से मुलाकात की और समय के साथ इनकी दोस्ती शिक्षक मारिया मोंटेसरी और कवि जेम्स कजिन्स के साथ बहुत गहरी हो गई।

रुक्मिणी देवी की प्रसिद्ध रूसी बैलेरीना अन्ना पावलोवा से मुलाकात

1928 में, प्रसिद्ध रूसी बैलेरीना अन्ना पावलोवा ने बॉम्बे का दौरा किया और अरुंडेल दंपति उनके प्रदर्शन को देखने के लिए गए और बाद में अरुंडेल दंपत्ति उसी जहाज पर यात्रा कर रहे थे जो ऑस्ट्रेलिया जा रहा था, जिस पर अन्ना पावलोवा भी अपनी कला का प्रदर्शन कर रहीं थीं। इस दौरान यात्रा के दौरान रुक्मिणी देवी के साथ अन्ना पावलोवा की दोस्ती बढ़ती चली गई और जल्द ही रुक्मिणी देवी ने अन्ना के प्रमुख नर्तकों में से एक, क्लियो नॉर्डि से नृत्य सीखना शुरू कर दिया। यह बाद में, अन्ना के कहने पर, रुक्मिणी देवी ने पारंपरिक भारतीय नृत्य की शैलियों की खोज करने के लिए अपना ध्यान केंद्रित किया, जो समय के साथ सामाजिक तिरस्कार का सामना करते हुए कहीं खो गए थे, रुक्मिणी देवी ने अपने शेष जीवन को भारतीय नृत्य की इन्हीं शैलियों के पुनरुद्धार के लिए समर्पित कर दिया।

रुक्मिणी देवी द्वारा ‘साधीर’ के पुनरुत्थान का प्रारंभ

1933 में, मद्रास म्यूज़िक एकेडमी के वार्षिक सम्मेलन में, उन्होंने पहली बार भरतनाट्यम की सबसे महत्वपूर्ण और प्रचलित धार्मिक शैली ‘साधीर’ नामक नृत्य कला की इस शैली का प्रदर्शन देखा। बाद में उन्होंने ‘मायलापुर गोवरी अम्मा’ से नृत्य सीखा, और अंत में ‘पांडनल्लूर मीनाक्षी सुंदरम पिल्लई’ से ई कृष्णा अय्यर की मदद से इस नृत्य की अन्य बारीकियों को अच्छे से सीखा। 1935 में रुक्मिणी देवी ने अपना पहला सार्वजनिक प्रदर्शन ‘थियोसोफिकल सोसाइटी के डायमंड जुबली कन्वेंशन’ में दिया।

‘कलाक्षेत्र’ अकादमी की स्थापना

जनवरी 1936 में, उन्होंने अपने पति के साथ, चेन्नई के अडयार में स्थित प्राचीन भारतीय गुरुकुल प्रणाली के की भांति ही ‘कलाक्षेत्र’ के नाम से एक अकादमी की स्थापना की। यह अकादमी पूरी तरह से नृत्य और संगीत के प्रति समर्पित है। आज यह अकादमी कलाक्षेत्र फाउंडेशन के अंतर्गत एक डीम्ड यूनिवर्सिटी है और सन् 1962 में इसे चेन्नई के तिरुवनमियुर में 100-एकड़ के क्षेत्र में स्थानांतरित कर दिया गया था, वही पर यह आज भी स्थित है। इस अकादमी के विख्यात छात्रों में राधा बर्निअर, सारदा हॉफमैन, अंजलि मेहर, कमलादेवी चट्टोपाध्याय, संजुक्ता पाणिग्रही, सी.वी. चंद्रशेखर, यामिनी कृष्णमूर्ति और लीला सैमसन का नाम मुख्य रूप से प्रसिद्ध है।

रुक्मिणी देवी की भरतनाट्यम की प्रसिद्ध नृत्य शैली ‘साधीर’ के पुनरुत्थान की कठिन यात्रा

मूल रूप से “साधीर” के नाम से प्रसिद्ध भरतनाट्यम की इस शैली को भारतीय शास्त्रीय नृत्य में इसके वर्तमान नाम तक लाने में ई कृष्णा अय्यर और रुक्मिणी देवी अरुंधले का नाम प्रमुख है। जिन्होंने अपने सतत॒ प्रयासों द्वारा भरतनाट्यम की पांडनल्लूर शैलीको संशोधित करके इसमें से श्रंगार और कामुक तत्वों को (जो कि पुराने समय की देवदासी एसोसिएशन की विरासत थे) पूरी तरह से हटा दिया और भरतनाट्यम को वैश्विक ध्यान में लाने के लिए अकथ प्रयास किया। जल्द ही उन्होंने इस नृत्य शैली का पूरा चेहरा ही बदल दिया, उन्होंने इस नृत्य में संगीत उपकरणों जैसे कि वायलिन, प्रकाश देने वाली डिजाइनर लाइट्स, परिवर्तनात्मक वेशभूषा और मंदिर की मूर्तियों से प्रेरित आभूषणों को इस नृत्य शैली में मजबूत जगह प्रदान की। एक शिक्षक के रूप में विभिन्न कलाओं और शास्त्रीय नृत्यों के लिए उन्होंने प्रख्यात गुरुओं से संपर्क किया, नृत्य की प्रस्तुतियों के लिए, रुक्मिणी देवी ने शास्त्रीय संगीतकारों और कलाकारों और प्रसिद्ध विद्वानों से संपर्क किया। इन सारे प्रयासों का परिणाम यह हुआ कि उन्होंने भारतीय महाकाव्य पर आधारित नृत्य नाटकों का नेतृत्व किया। जिनमें मुख्य रुप से वाल्मीकि द्वारा रचित “रामायण” और जयदेव की “गीता गोविंद” प्रमुख थी। इसके पश्चात तो जैसे उनका यह नृत्य नाटक पूरी तरह से प्रसिद्ध हो गया और इसके बाद उन्होंने कुछ और भी नृत्य नाटक किए जैसे सीता स्वयंवर, श्री राम वनगमनम,पादुका पट्टभिषेकमऔर सबरी मोक्षम इतना ही नहीं यह सिलसिला आगे बढ़ाते हुए उन्होंने कुत्रल कुरुवनजी, रामायण, कुमगुरुओंरा संभवम, गीता गोविंदम और उषा परिनाम में भी अपनी नृत्य कला का प्रदर्शन कर प्रसिद्धि हासिल की और साथ ही भारतीय नृत्य की भरतनाट्यम से जुड़ी शैलियों को लोगों से अवगत करवाया।

मोंटेसरी पद्धति पर आधारित स्कूल की शुरूआत, ‘बेसेंट अरंडेल सीनियर सेकेंडरी स्कूल’ की स्थापना

मोंटेसरी पद्धति पर आधारित स्कूल पहली बार भारत में तब शुरू हुए, जब डॉ. जॉर्ज अरुंडेल ने डॉ. मारिया मोंटेसरी को 1939 में ‘बेसेंट थियोसोफिकल हाई स्कूल’ में पाठ्यक्रम शुरू करने के लिए आमंत्रित किया और बाद मोंटेसरी पद्धति से प्रभावित होकर डॉ. जॉर्ज अरुंडेल ने कलाक्षेत्र परिसर के भीतर ही ‘बेसेंट अरंडेल सीनियर सेकेंडरी स्कूल’ की स्थापना की। साथ ही परिसर के भीतर द कॉलेज ऑफ फाइन आर्ट्स, द बेसेंट थियोसोफिकल हाई स्कूल, द मारिया मॉन्टेसरी स्कूल फॉर चिल्ड्रन, द क्राफ्ट एजुकेशन एंड रिसर्च सेंटर और यूवी स्वामीनाथ अय्यर लाइब्रेरी की स्थापना भी की गई।

रुक्मिणी देवी द्वारा किए गए अन्य महत्वपूर्ण कार्य

  • रुक्मिणी देवी को पशु कल्याण में विशेष रूचि थी, यही कारण था कि वह विभिन्न मानवीय संगठनों से जुड़ी हुई थी और राज्यसभा के सदस्य के रूप में उन्होंने “पशु क्रूरता निवारण अधिनियम” के लिए और उसके बाद “पशु कल्याण बोर्ड” की स्थापना हेतु कानून बनवाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
  • रुक्मिणी देवी ने देश में शाकाहार को बढ़ावा देने के लिए बहुत प्रयास किया। वह सन् 1955 से 31 साल तक अंतर्राष्ट्रीय शाकाहारी संघ की उपाध्यक्षा के पद पर बनी रहीं, जब तक कि उनकी मृत्यु नहीं हो गई।
  • 1978 में कपड़ा छपाई से जुड़े प्राचीन भारतीय शिल्प को पुनर्जीवित करने के लिए रुक्मिणी देवी ने कलाक्षेत्र में “कलमकारी केंद्र” (पेनक्राफ्ट) की स्थापना की।

जब रुक्मिणी देवी ने राष्ट्रपति पद के नामांकन की पेशकश को बड़े ही साधारण शब्दों में मना कर दिया

1977 में, मोरारजी देसाई ने उन्हें भारत के राष्ट्रपति पद के लिए नामित करने की पेशकश की, परंतु उन्होंने उनकी इस पेशकश को बड़े ही साधारण शब्दों में मना कर दिया।

रुक्मिणी देवी द्वारा अर्जित की गई उपलब्धियां

  • रुक्मिणी देवी को अप्रैल 1952 में भारतीय संसद की राज्य परिषद (राज्य सभा) के सदस्य के रूप में नामित किया गया था और 1956 में फिर से उनको नामांकित किया गया राज्यसभा में नामांकित होने वाली पहली भारतीय महिला थीं। 1962 तक वह राज्यसभा में चेयरमैन के पद पर रहीं। 1986 में उनके निधन के समय तक वह बोर्ड की सदस्य के रूप में रहीं।
  • सन् 1956 में इन्हें पदम भूषण के सम्मान से सम्मानित किया गया तथा 1967 में संगीत नाटक अकादमी की फेलोशिप से भी इनको सम्मानित किया गया।
  • 1923 में वह “ऑल-इंडिया फेडरेशन ऑफ यंग थियोसोफिस्ट्स” की अध्यक्षा बनी, और दो वर्ष उपरांत ही 1925 में उन्हें “वर्ल्ड फेडरेशन ऑफ यंग थियोसोफिस्ट्स” की अध्यक्षा के पद पर नियुक्त कर दिया गया।
  • पदम भूषण पुरस्कार (वर्ष 1956)
  • संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार (वर्ष 1957)
  • देसीकोथामा (वर्ष 1972), विश्व भारती विश्वविद्यालय
  • सन् 1967 संगीत नाटक अकादमी फैलोशिप
  • प्राण मित्र ( सन् 1968), सभी जानवरों के मित्र, (एनिमल वेलफेयर बोर्ड ऑफ़ इंडिया)
  • क्वीन विक्टोरिया सिल्वर मेडल, रॉयल सोसाइटी फॉर द प्रिवेंशन ऑफ क्रुएल्टी टू एनिमल्स, लंदन
  • कालिदास सम्मान ( सन् 1984), मध्य प्रदेश सरकार द्वारा
  • विश्व महासंघ द्वारा जानवरों के संरक्षण के लिए रोल ऑफ ऑनर के अलावा, हेग
  • मानद डॉक्टरेट, वेन स्टेट यूनिवर्सिटी , संयुक्त राज्य अमेरिका
  • ऑनर्स, काउंटी और लॉस एंजिल्स के शहर के स्क्रॉल

Google द्वारा रूक्मिणी देवी को समर्पित की गई श्रद्धांजलि

2016 में, Google ने रूक्मिणी देवी के 112वें जन्मदिन के अवसर पर उन्हें एक डूडल के साथ सम्मानित किया और बाद में इस महीने को ‘कलाक्षेत्र फाउंडेशन’ के 80वें वर्ष के साथ ‘रुक्मिणी देवी को याद’ करते हुए संगीत और नृत्य के साथ उत्सव के रूप में प्रदर्शित किया। गूगल ने अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस के लिए उनको 2017 में चित्रत्र किया।

रूक्मिणी देवी के प्रति समर्पित किए गए सम्मान

  • रूक्मिणी देवी का नाम इंडिया टुडे की उन 100 लोगों की सूची में शामिल किया गया जिसका शीर्षक “100 लोग जिन्होंने भारत को आकार दिया” था।
  • वर्ष भर चलने वाले समारोहों, संगोष्ठियों और त्यौहारों सहित, उनकी 100 वीं जयंती के दिन अर्थात 29 फरवरी, 2004 को कलाक्षेत्र और दुनिया के कई हिस्सों में, इस दिन विशेष को एक समारोह के रूप में चिन्हित किया गया और दुनिया भर से छात्रों को एक दिन के लिए गाने और सुनाने के लिए इकट्ठा किया गया।
  • 29 फरवरी को नई दिल्ली के ललित कला गैलरी में उनके जीवन पर आधारित एक फोटो प्रदर्शनी को भी खोला गया और उसी दिन तत्कालीन राष्ट्रपति एपीजे अब्दुल कलाम ने एक फोटो-जीवनी का आयोजन, डॉ. सुनील कोठारी तथा उनके साथ पूर्व राष्ट्रपति आर. वेंकटरमन द्वारा लिखित जीवनी के साथ पहली बार लोगों के सामने किया।

Leave a Reply