जानिये गणित के जादूगर श्रीनिवास रामानुजन के जीवन की 52 बातें

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Srinivas Ramanujan, the famous mathematician from India

श्रीनिवास रामानुजन उन जाने माने गणितज्ञों में से एक है, जिन्होने अपने ज्ञान, अपनी मौलकिता और अपने अचंभित करने वाले गणितीय कार्यों से पूरी दूनिया को स्तब्ध कर दिया था. आइये श्रीनिवास रामानुजन से जुडे तथ्यों के बारे में जानते हैं.

1. श्रीनिवास रामानुजन का जन्म ब्रिटिश भारत में हुआ था। वे मद्रास प्रेसीडेंसी के इरोड (जिसे आज तमिनलाडु के रूप में जाना जाता है) में पैदा हुए थे। उनका जन्म 22 दिसम्बर 1887 को हुआ था।

2. उनका जन्म एक गरीब तमिल ब्राहमण अयंगर परिवार में हुआ था। उनके पिता एक साड़ी की दुकान में एक क्लर्क के रूप में काम करते थे। उनके पिता का नाम के. श्रीनिवास अयंगर था। दूसरी ओर उनकी मां कोमलनता एक गृहिणी थी लेकिन उन्होने स्थानीय मंदिर में गाना गाकर कुछ रूपये भी कमाए।

3. के. श्रीनिवास अयंगर और कोमलनता के पांच बच्चों में रामानुजन सबसे बड़े थे। दूर्भाग्य से रामानुजन के तीन भाई बहनों की मृत्यु, एक वर्ष की आयु तक पहुंचने से पहले ही हो गई थी। रामानुजन के सबसे छोटे भाई का नाम तिरूनारायण था जो 1978 तक जीवित रहे।

4. रामानुजन खुद 1889 में चेचक से ग्रस्त हो गये थे परन्तु भाग्य से उनका स्वास्थ्य ठीक हो गया। उसी वर्ष तंजावुर जिले (जहां रामानुजन का जन्म हुआ था) में 4000 से ज्यादा लोगों की चेचक होने की वजह से मृत्यु हो गई थी।

5. चेचक से उबरने के बाद वह और उनकी मां मद्रास (वर्तमान में चेन्नई के रूप में जाना जाता है) के पास स्थित कांचिपुरम में अपने नाना के घर चले गये। दूर्भाग्य से उनके नाना ने जल्द ही अपनी नौकरी खो दी और इसी वजह से रामानुजन कुंभकोणम (जहां उनका जन्म हुआ था) वापस आ गये।

7. कुंभकोणम में वापस आकर रामानुजन को कंगायन प्राथमिक विद्यालय भेजा गया। बाद में. उनके दादा की मृत्यु हो गई और उन्हें वापस अपने नाना के पास कांचीपुरम जाना पड़ा।

8. वहां उन्हें फिर से एक प्राथमिक विद्यालय भेजा गया। लेकिन उन्हें यह खास पसंद नहीं आया इसलिए उन्होंने स्कूल जाना बंद कर दिया। और इसलिए उनके परिवार ने एक स्थानीय कांस्टेबल को भर्ती कर लिया ताकि वह रोजाना स्कूल जाये।

9. परन्तु फिर भी रामानुजन रोजाना स्कूल नहीं गए और इसी वजह से उनके परिवार को उन्हें कुंभकोणम वापस भेजना पड़ा।

10. कुंभकोणम में वे ज्यादातर अपनी मां के साथ रहे क्यों कि उनके पिता अपना अधिकांश समय काम करने में ही गुजार देते थे। उनकी मां बहुत ज्यादा धार्मिक थी और रामानुजन को भी यहीं शिक्षा देती थी। रामानुजन ने शाकाहारी भोजन का ही सेवन किया और विभिन्न परंपराओं और पुराणों के बारे में सीखा। उन्होने मंदिर में पूजा में मन लगा कर भाग लिया और पूजा करना सीख लिया।

11. नवंबर 1897 में, 10 वर्ष का होने से पहले ही उन्होने कंगायन प्राइमेरी विद्यालय की प्राथमिक परिक्षाओं में उतीर्ण होने में कामयाबी हांसिल की। और उन्होने अंकगणित, भूगोल, तमिल और अंग्रेजी में पूरे जिले में सबसे ज्यादा नंबर हासिल किये।

12. उसी वर्ष उन्होंने टाउन हायर सैकेंडरी स्कूल में प्रवेश लिया। यहीं से उन्होनें अच्छी तरह से गणित सीखने की शुरूआत की। जब वे 11 साल की उम्र के हुए तो उन्होंने कालेज जाने वाले दो छात्रों के गणितीय ज्ञान पर विजय प्राप्त की जो उनके घर किरायेदार थे।

13. जब वे और ज्यादा सीखना चाहते थे तब उन्हें एस. एल. लोनी द्वारा एक लिखित उन्नत त्रिकोणीयमिति की किताब सौंप दी गई। रामानुजन ने अच्छी तरह किताब का अध्ययन किया उस समय वे केवल 13 वर्ष के थे। उन्होनें उस किताब में महारत हासिल कर ली और उन्हें अपने दम पर विभिन्न प्रकार के प्रमेयों की खोज करने का ज्ञान प्राप्त था।

14. जब वे 14 साल के थे तब उन्हें कई शैक्षणिक पुरस्कार और योग्यता प्रमाण पत्र मिले थे। गणित की परिक्षाओं को हल करने के लिए वे दिये गये समय से केवल आधा समय ही लेते थे और वे अनंत श्रंखला वाले ज्यामीति वाले प्रशनों से बहुत ज्यादा परिचित हो गये।

15. वर्ष 1902 मे, वे पहली बार घन समीकरणों से परिचित हुए। उन्होंने सीखा कि इन्हे कैसे हल करना है और बाद में रामानुजन अपने खुद के हल करने के तरीकों के साथ आये। यहां तक की उन्होंने क्विंटिंक को हल करने का भी प्रयास किया इस तथ्य से अनजान कि उन्हें हल करने के लिए रेडिकल का उपयोग नहीं किया जा सकता है।

Srinivasan Ramanujan was a math geek

16. 1903 में उनके एक मित्र ने उन्हें ‘ए सिनोप्सिस आफ एलीमेंट्री रिजल्टस इन प्योर एंड एप्लाइड मैथमेटिक्स‘ की प्रति सौंपी थी, जिसे जी. एस. कर्र ने लिखा था। यह पुस्तक 5000 प्रमेयों का संग्रह थी। रामानुजन ने बडी अच्छी तरह इस पुस्तक का अध्ययन किया। ऐसा लगता है कि उनके अंदर छिपी प्रतिभा इसी पुस्तक के माध्यम से ही प्रकाश में आई।

17. 1904 में. रामानुजन न केवल गणित में और ज्यादा विकसित हुए बल्कि स्वतंत्र रूप से बर्नौली संख्याओं की जांच भी की। यहां तक की उन्होंने यूलर-मैशेरोनी कांस्टेंट की 15 दशमलव अंकों तक गणना की थी।

18. उसी वर्ष उन्होने टाउन हायर सेकेंडरी स्कूल से स्नातक किया। हमेशा की तरह उन्होनें गणित में उत्कृष्ट प्रदर्शन किया और उनके स्कूल के प्रधानाध्यापक- कृष्णस्वामी अयर ने उन्हें गणित के लिए रंगनाथ राव पुरस्कार से सम्मानित किया। अयर ने यह भी कहा कि रामानुजन को इससे भी ज्यादा नम्बर मिलने चाहिये जितने उन्हें दिये गये हैं।

19. उनके असाधारण प्रदर्शन के लिए रामानुजन को कुंभकोणम में गर्वमेंट आर्टस कालेज में अध्ययन के लिए छात्रवृती दी गई। और यहां दिलचस्प बात यह हुई कि रामानुजन का गणित में इतना गहरा ध्यान था कि वे अन्य सभी विषयों में असफल हो गयें। और इसी असफलता की वजह से उन्होंने अपनी छात्रवृती गवां दी।

20. 1905 मे वे घर से भागकर विशाखापटटनम की ओर चले गये। लगभग एक माह तक वे राजमुंदरी नामक स्थान पर रहे। बाद में उन्होंने मद्रास के पचैयप्पा कालेज में प्रवेश ले लिया। वहां उन्होनें संस्कृत और अंग्रेजी में तो बुरा प्रदर्शन किया लेकिन गणित में काफी अच्छा प्रदर्शन किया। हालांकि गणित में उन्होंने केवल उन्हीं प्रशनों के उतर दिये जो उन्हें आकर्षक लगे और उन्होंने अन्य प्रशनों को छुआ तक नहीं।

21. दिसंबर 1906 में रामानुजन ‘फेलो आफ आर्टस‘ की परीक्षा में फेल हो गये। 1907 में उन्होंने दोबारा कोशिश की लेकिन वे इस बार भी फेल हो गये। तो उन्होंने एफए की डिग्री लिये बिना ही कालेज छोड़ दिया। कालेज छोड़ने के बाद रामानुजन ने गणित में अपना स्वतंत्र शोध प्रारम्भ किया लेकिन वे अत्यधिक गरीबी में रहे, अक्सर भूखे रहते थे।

22. 1910 तक रामानुजन की प्रतिभा के बारे में किसी को पता नहीं था। उस वर्ष वे मद्रास में थे और आजिविका चलाने के लिए कुछ छात्रों को टयुशन देते थे। वे अपनी गरीबी को कम करने के लिए लेखांकन सेवाओं से जुडी नौकरीयों को ढुढने के लिए पुरे शहर में घुमते थे।

23. उसी वर्ष वे सरकार के राजस्व विभाग में नौकरी करने चले गये। वहां उन्होंने वी. रामास्वामी नामक एक अधिकारी से मुलाकात की। उस समय रामानुजन 23 साल के हो गये थे। रामास्वामी अयर को प्रोफेसर रामास्वामी के नाम से जाना जाता था।

24. जब रामानुजन ने रामास्वामी अयर से मुलाकात की तब रामानुजन के पास केवल एक पुस्तक थी जिसमें उन्होंनें अपने सभी गणितीय कार्यों को लिखा था। रामानुजन यहां भाग्यशाली रहे क्यों कि रामास्वामी भारतीय गणितीय सोसाइटी के संस्थापक थे।

25. रामास्वामी ने तुरंत पहचान लिया कि रामानुजन कोई साधारण व्यक्ति नहीं थे। बल्कि वे तो बेजोड प्रतिभा के मालिक थे। रामानुजन के काम पर एक नजर डालने के बाद, रामास्वामी ने भारतीय गणितीय सोसाइटी के सचिव- आर. रामचन्द्रन राव से सम्पर्क करने का फैसला किया।

26. रामास्वामी ने रामचन्द्रन राव को रामानुजन के लिए कुछ वित्तीय सहायता उपलब्ध करवाने को कहा। हालांकि रामचन्द्रन जो काम से प्रभावित होने के बावजूद हमेशा यहीं सोचते थे कि रामानुजन ने जो कुछ भी प्रस्तुत किया है वह उसके द्वारा किया गया कार्य नहीं है बल्कि प्रतिष्ठित गणितज्ञों से चुराया गया कार्य था।

27. सी. वी. राजगोपालाचारी- रामानुजन के ऐसे मित्र जिन्होंने रामानुजन की शैक्षणिक अखण्डता के बारे में रामचन्द्रन के संदेह को कम करने की कोशिश की। राजगोपालाचारी के अनुरोध पर रामाचन्द्रन ने रामानुजन से मिलने का फैसला किया। और इसी समय रामानुजन व रामाचन्द्रन के बीच हाइपरजोमेट्रीक श्रंखला, इलप्टिक इंटीग्रेल और डाइवरजेंट श्रंखला जैसे विषयों पर विस्तृत चर्चा हुई। इस चर्चा के बाद रामाचन्द्रन समझ गये कि रामानुजन एक आसाधारण गणितज्ञ थे।

28. इसी के बाद से ही रामाचन्द्रन ने रामानुजन को वित्तीय सहायता प्रदान की। इसने रामानुजन को अपने शोध को जारी रखने की अनुमति दी, और वी. रामास्वामी अय्यर ने जर्नल आफ इंडियन मैथमेटिकल सोसाइटी मे रामानुजन के कार्यों को प्रकाशित करना शुरू कर दिया।

29. जब रामानुजन की रचनाएं प्रकाशित हुई तो शुरूआत में एम. टी. नारायण जो कि पत्रिकाओं के सम्पादक थे उन्होंने इसमें बहुत सी खामियां निकाली। परन्तु यह खामियां रामानुजन के गणित की नहीं थी बल्कि लिखावट की थी। उनकी रचनाएं प्रतिभाशाली थी लेकिन लिखावट स्पष्ट नहीं थी, परन्तु एक साधारण गणितज्ञ उनकी रचनाओं को आसानी से समझ लेता था।

30. 1930 में रामानुजन की वित्तीय स्थिति में सुधार हुआ। पहले उन्होंने मद्रास में महालेखाकार कार्यालय में नौकरी की, यह एक अस्थाई काम था जिसमें उन्हें प्रति माह 20 रूपयें मिलते थे। रामानुजन ने कुछ हफ्तों तक यह नौकरी की और बाद में उन्हें मद्रास पोर्ट ट्रस्ट में लेखा क्लर्क की नौकरी मिल गई। इस महिने से उन्हें 30 रूपयें प्रति माह मिलने लगे। हालांकि यह नौकरी उन्हें प्रोफसर ई. डब्ल्यू. मिडलमास्ट की सिफारिश के कारण मिली।

31. नये कार्यालय में वे अपना काम बहुत जल्दी करते थे। और अपने गणितीय अनुसंधान के लिए खाली समय का उपयोग करते थे। सर फ्रांसिस स्प्रिंग- रामानुजन के मालिक और एस. नारायण अयंगर (रामानुजन के सहकर्मी और इंडियल मैथेमेटिकल सोसाइटी के कोषाध्यक्ष) दो ऐसे लोग थे जो अपने शोध को आगे बढाने के लिए हमेशा रामानुजन को प्रोत्साहित करते थे।

32. 1913 के वसंत में तीन लोगों द्वारा ब्रिटिश गणितज्ञों को रामानुजन के कार्यों को प्रस्तुत करने का प्रयास किया गया। ये तीन लोग- ई. डब्ल्यू. मिडलमास्ट, नारायण अययर और रामचन्द्रन राव थे।

33. युनिवर्सिटी कालेज लंदन के एम. जे. एम. हील ने यह कहते हुए वापस लौटा दिया कि रामानुजन के पास गणित की कुछ क्षमता थी लेकिन उनके पेपर में कमियाँ थी और रामानुजन के पास आधार और शैक्षिणिक पृष्ठ्भूमि दोनों का अभाव था। जो गणितज्ञों को उनके काम को स्वीकार करने के लिए आवश्यक था।

34. रामानुजन ने हार नहीं मानी और कैम्ब्रिज युनिवर्सिटी के गणितज्ञों को लिखने का फैसला किया। ई. डब्ल्यू. हाब्सन और एच. एफ. बेकर दो प्रोफेसर थे जिन्होनें बिना किसी टिप्पणी के रामानुजन के कागजात वापस कर दिये।

35. 16 जनवरी 1913 को रामानुजन ने गाडफ्रे हेरोल्ड हार्डी को अपने कागजात भेजे। हार्डी, कैम्ब्रिज विश्वविद्यालय में एक शुद्ध गणितज्ञ थे और अपने समय के सबसे प्रतिष्ठित विद्वानों मे से एक थे।

36. रामानुजन ने हार्डी को अपने द्वारा किये गये कार्यो को भी साथ में भेजा। हार्डी ने उनके काम को अच्छी तरह से पढा। और पहले तो हार्डी को लगा कि उनका कोई मित्र उनके साथ मजाक कर रहा है।

37. रामानुजन द्वारा किये गये कार्य को प्राप्त करने के बाद हार्डी ने अपने मित्र जेई लिटिलवुड को बुलाया- जो कैम्ब्रिज विश्वविद्यालय के ही विख्यात गणितज्ञ थे। हार्डी और लिटिलवुड ने लगभग 20 से 30 मिनट तक रामानुजन के काम को देखा और आखिरकार एक निष्कर्ष पर पहुंचे कि वे एक आसाधारण ज्ञान वाले अज्ञात गणितज्ञ के कागजों को देख रहे हैं।

38. हार्डी ने 8 फरवरी 1913 को रामानुजन को वापस लिखा। यह बताते हुए कि उन्हें रामानुजन का काम बेहद पसंद आया और वे बस इसका सबूत देखना चाहते हैं। रामानुजन तक पत्र पहुंचने से पहले ही, हार्डी ने रामानुजन की ब्रिटेन आने की सारी व्यवस्थाएं करवा दी।

39. हार्डी द्वारा की गई व्यवस्था के बारे में जानने के बाद रामानुजन ने मना कर दिया क्यों कि उनकी ब्राम्हण परवरिश उन्हें किसी विदेशी भुमि पर जाने की अनुमति नहीं देती। इसके बाद रामानुजन के काम को ट्रिनिट कालेज, कैम्ब्रिज के पूर्व व्याख्याता गिलबर्ट वाकर द्वारा आगे बढाया गया.

40. वाकर के समर्थन से रामानुजन के लिए मद्रास विश्वविद्यालय में छात्रवृति की व्यवस्था हुई। रामानुजन को 75 रूपये प्रतिमाह छात्रवृति मिली ताकि वे अपने अनुसंधान को जारी रख सके। इसी बीच हार्डी ने अपने दोस्त ई. एच. नेविल से पूछा- जो मद्रास में एक पोस्ट मास्टर के रूप में नियुक्त थे। जिन्होंने रामानुजन को कैम्ब्रिज जाने की सलाह दी। और 17 मार्च 1914 को वे अपने सपनों को पूरा करने के लिए लंदन के लिए रवाना हो गये।

41. रामानुजन के लंदन पहुंचने के बाद हार्डी के दोस्त नेविल ने उनका स्वागत किया। 4 दिन बाद नेविल रामानुजन को कैम्ब्रिज के चेस्टर्टन रोड स्थित अपने घर में ले गए। वहां से रामानुजन ने हार्डी और लिटिलवुड के साथ काम करना शुरू कर दिया। वैसे यहां एक दिलचस्प बात यह हुई कि रामानुजन के इंग्लेण्ड पहुंचते ही प्रथम विश्व युद्ध छिड़ गया।

42. रामानुजन 6 महीने तक नेविल के घर पर ही रहे। इसके बाद वे व्हीलेट कोर्ट में चले गये जो हार्डी के कमरे से केवल 5 मिनट की दूरी पर था। हार्डी और लिटिलवुड ने जब रामानुजन के साथ काम किया तब वे उनके काम को देखकर आश्चर्यचकित रह गये थे। उन दोनों ने रामानुजन के साथ लाई गयी पुस्तकों को अच्छे से अध्ययन किया।

43. उन पुस्तकों में हजारों समीकरणें, प्रमेय, और पहचाने थी जो 1903 से 1914 के बीच की अवधि में काम करते थे। रामानुजन के उन कार्यों में से कुछ को तो पहले ही खोज लिया गया था। उनमें से कुछ रामानुजन की अनुभवहीनता के कारण गलत थे परन्तु बाकी सारे एकदम सही और नये थे।

44. हार्डी और रामानुजन के बीच कुछ मतभेद थे क्यों कि उन दोनों की संस्कृतियां व परवरिश अलग अलग थी। हार्डी ने सबूत मांगे जबकि रामानुजन ने सहजता से काम लिया और अपने ज्ञान का श्रेय अपने पारिवारिक देवता नमगिरी को दिया।

45. हार्डी ने वास्तव में रामानुजन को नियमों का पालन करनें और अपने काम के कड़े सबूत उपलब्ध करवाने की कोशिश की और रामानुजन की शिक्षा को और बेहतर बनाने की कोशिश की। हालांकि यह दोनों के लिए बिल्कुल भी आसान नहीं था।

46. रामानुजन ने लगभग 5 साल कैम्ब्रिज में बिताए और इस पुरे समय के दौरान उन्होंने हार्डी व लिटिलवुड के साथ काम किया। रामानुजन के कैम्ब्रिज से जाने के दो साल बाद ही उन्हें शोध द्वारा विज्ञान में स्नातक की उपलब्धि प्राप्त हुई। इस डिग्री को बाद में पी.एच.डी. नाम दिया गया। उन्होने मार्च 1916 में यह डिग्री प्राप्त की।

उन्हें अत्यधिक समग्र संख्या पर काम करने के कारण ही पी.एच.डी. की उपाधी प्रदान की गई। अगले साल, 6 दिसंबर 1917 में उन्हें ‘लंदन मैथमेटीकल सोसाइटी‘ का सदस्य चुना गया।

48. उन्हें थ्योरी आफ नम्बर्स और एलिप्टीकल कार्यों के लिए 1918 में रोयल सोसाइटी का सदस्य चुना गया। वह ‘फेलो ऑफ़ रॉयल सोसाइटी’ के रूप में चुने जाने वाले दूसरे भारतीय थे। पहले भारतीय आर्देसी कुर्टेजी थे जिन्होने 1841 में यह उपलब्धी हांसिल की।

49. उसी वर्ष 13 अक्टूबर 1918 को उन्हें ट्रिनिटी कालेज, कैम्ब्रिज का सदस्य भी चुना गया। और ये उपलब्धी पाने वाले वे पहले भारतीय थे।

50. 1919 तक इंग्लेंड में रहने के बाद उनका स्वास्थय खराब हो गया। उन्हें टी.बी की बीमारी के साथ विटामिन की कमी भी हो गई थी।

51. 1919 में रामानुजन भारत वापस आ गये। 26 अप्रेल 1920 में उनकी मृत्यु हो गई जब वे केवल 32 वर्ष के थे।

52. 1964 में डाक्टर डी.एन.यंग द्वारा उनके मेडिकल रिकार्डस की जांच की गई। यंग ने अपने रिकार्डस से ये निष्कर्ष निकाला कि वे टी.बी के कारण नही मरे थे। बल्कि हेपेटिक अमीबासिस (लिवर के इन्फेक्शन) के कारण उनकी मृत्यु हुई थी।

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