Home धर्म और आस्था जानिये वैदिक ऋषिराज ‘महर्षि नारद’ से जुड़ी अद्भुत बातें

जानिये वैदिक ऋषिराज ‘महर्षि नारद’ से जुड़ी अद्भुत बातें

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महर्षि नारद हिंदू धर्म के अनुसार एक वैदिक ऋषि थे। ये एक कथाकार, संगीतकार और संदेश और ज्ञानवर्धक बातों को बताने वाले ऋषि के रूप में जाने जाते हैं। कई हिंदू ग्रंथों में इनका उल्लेख मिलता है। विशेषकर महाभारत में युधिष्ठिर को प्रह्लाद की कहानी बताते समय और रामायण में रावण को चेतावनी देते समय, साथ ही महर्षि नारद का उल्लेख पुराणों में भी कई स्थानों पर मिलता है। ईश्वर ने महर्षि नारद को “ऋषिराज” कहकर संबोधित किया, जिसका अर्थ “वह जो संतो तथा ऋषियों में राजा होता है।” हिंदू धर्म की कई पौराणिक कथाओं में महर्षि नारद नाम कई अलग-अलग व्यक्तियों के उल्लेख के समय प्रकट हुआ है। बौद्ध धर्म की जातक कथाओं में सारिपुत्र से पूर्व जन्म में, साथ ही साथ मध्यकालीन बौद्ध विद्वानों के नाम में और जैन धर्म में भी इनका विवरण मिलता है। नारद मुनि ने भृगु कन्या लक्ष्मी का विवाह विष्णु के साथ करवाया। इन्होने ही इन्द्र को समझा बुझाकर उर्वशी का पुरुरवा के साथ विवाह कराया। ऋषिराज नारद ने महादेव द्वारा जलंधर का विनाश करवाया। कंस को आकाशवाणी का अर्थ समझाया। महर्षि नारद ने वाल्मीकि को रामायण की रचना करने की प्रेरणा दी। इन्होने व्यासजी से भागवत की रचना करवाई। इन्द्र, चन्द्र, विष्णु, शंकर, युधिष्ठिर, राम, कृष्ण आदि को उपदेश देकर इन्होने ही कर्तव्य की ओर अग्रसर किया।

महर्षि नारद का संक्षिप्त परिचय

हिन्‍दू मान्‍यताओं के अनुसार नारद मुनि का जन्‍म सृष्टि के रचयिता ब्रह्माजी की गोद से हुआ था। ब्रह्मवैवर्तपुराण के मतानुसार ये ब्रह्मा के कंठ से उत्पन्न हुए थे। हांलांकि नारद मुनि अधिकांश रूप से अन्य देवताओं की भांति उतने लोकप्रिय नहीं हैं, परंतु उन्होंने विभिन्न युगीन घटनाओं का पूर्ण आनंद लिया। एक बार ऋषि नारद का ज्ञान भगवान की रचना में बाधा बन गया। इसलिए नारद मुनि को श्राप मिला कि यद्यपि वह लोगों से कितना भी सच कहें और उन्हें चेतावनी दे दें, परंतु कोई भी उन पर कभी विश्वास नहीं करेगा। भारतीय ग्रंथों के अनुसार नारद मुनि दूर देशों और लोकों की यात्रा किया करते थे। सामान्यता उनका चित्रण, हाथ में खरताल और तानपुरा के साथ ही किया जाता है, नारद मुनि, आमतौर पर प्राचीन संगीत वाद्ययंत्रों के महान आचार्यों में से एक माने जाते थे। इस यंत्र को “महथी” नाम से जाना जाता था, जिसका उपयोग नारद मुनि अपने भजन, प्रार्थना और मंत्रों के गायन के समय किया करते थे। हिंदू धर्म की वैष्णववाद परंपरा में उन्हें एक ऋषि के रूप में प्रस्तुत किया गया है, जिसमें वह सदैव भगवान विष्णु की ही भक्ति किया करते थे। नारद मुनि को कुछ बुद्धिमान और चतुर दोनों रूपों में वर्णित किया गया है। वैष्णव अनुयाई ने उन्हें शुद्ध, पवित्र आत्मा के रूप में चित्रित किया है, जो अपने भक्ति गीतों के माध्यम से भगवान विष्णु की महिमा का वर्णन किया करते थे और उन्हें “हरि” तथा “नारायण” नाम से संबोधित करते थे और भक्ति योग का प्रदर्शन करते थे। नारद भक्ति सूत्र को पूरी तरह से नारद मुनि को समर्पित किया गया है। आमतौर पर दिखाए जाने वाले दृश्य में वह “नारायण, नारायण” का उच्चारण करते हुए ही कहीं पर भी प्रवेश किया करते थे।

जब बृहस्पति देव से बहस करते हुए ऋषि नारद ने अपनी योग्यता सिद्ध की

महाभारत काल में, नारद मुनि को वेदों और उपनिषद का ज्ञाता के रूप में चित्रण किया गया है। वह इतिहास और पुराणों से भी भलीभांति परिचित हैं रहे हैं। उन्हें छह अंग की महारथ हासिल है। जिसमें उच्चारण, व्याकरण, छंद-शास्त्र, नियम, धार्मिक संस्कार और खगोल शामिल हैं। सभी खगोलीय प्राणी उनके ज्ञान के लिए उनका सम्मान करते हैं। उन्हें सभी प्राचीन कल्प (समय चक्र) से जुड़ी विभिन्न प्रकार की बातों का तजुर्बा है। वह न्याय (तर्क) और नैतिक विज्ञान से जुड़ी बातों को सत्य के साथ करने में सदैव तत्पर रहे। नारद मुनि पुनः संकलित ग्रंथों और विशेष विषयों में सामान्य सिद्धांतों को लागू करने और उनमें विभेद करने में निपुण थे। वह किसी भी स्थिति में विरोधाभासी व्याख्यान की व्याख्या तेजी से करने में निपुण थे। वह वाक्यपट्टू, संकल्पवान, बुद्धिमान, शक्तिशाली तथा तीव्र स्मृति के स्वामी थे। उन्हें नैतिकता एवं राजनीतिक विज्ञान की अच्छी खासी जानकारी थी। वह साक्ष्यों से निष्कर्ष निकालने में अत्यंत कुशल थे। वह बहुत अच्छी चीजों में से हीन (कम अच्छी) चीजों को अलग करने में अत्यंत कुशल थे। पांच प्रस्तावों से मिलकर भी बने जटिल कथनों या जटिल स्थिति में सही और गलत के बीच का अंतर पहचानने में पूर्णतया सक्षम थे। वह धर्म, धन, सुख और मोक्ष के विषय में निश्चित निष्कर्ष पर पहुंचने में सक्षम थे। उनके पास इस पूरे ब्रह्मांड और उसके आस-पास की सभी चीजों के विषय का ज्ञान है। वह सफलतापूर्वक जवाब देने में सक्षम थे। एक बार बृहस्पति देव से बहस करते हुए उन्होंने बृहस्पति देव तक को सफलतापूर्वक जवाब देने में अपनी योग्यता सिद्ध की थी। वह सांख्य और योग दर्शनप्रणालियों के स्वामी थे, उन्हें युद्ध के ज्ञान के साथ भीतर की चीजों को बिना देखे, प्रत्यक्ष ज्ञान के साथ निष्कर्ष निकालने में भी निपुणता हासिल थी। वह संधि, युद्ध, सैन्य अभियानों, शत्रु के पदों की नियुक्ति घात और भंडार की रणनीति के छः विज्ञानों के विषय में अच्छा ज्ञान था। सीखने की हर शाखा के संपूर्ण स्वामी थे और संगीत तथा युद्ध के शौकीन थे। उन्हें किसी भी विज्ञान या कृत्य के द्वारा निरस्त करना असंभव था।

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नारद मुनि के आध्यात्मिक ज्ञान की कथा

पृथ्वी पर जन्म लेने का श्राप

भागवत पुराण में नारद मुनि के आध्यात्मिक ज्ञान की कहानी का वर्णन मिलता है। नारद मुनि को देवताओं के बीच सूचना पहुंचाने का प्राथमिक स्रोत माना जाता था। ऐसा भी कहीं-कहीं वर्णन मिलता है कि वह पृथ्वी पर किसी भी संदेश को सबसे पहले ईश्वर तक पहुंचा देते थे। अपने पिछले जन्म में नारद मुनि, एक गंधर्व (स्वर्ग दूत) थे, जिन्हें परमपिता परमात्मा के बजाय देवताओं का महिमा गान करने के लिए सांसारिक ग्रह अर्थात पृथ्वी पर जन्म लेने का श्राप मिला। उनका जन्म संत पुजारी के घर काम करने वाली एक नौकरानी के पुत्र के रूप में हुआ था। पुजारी उनसे और उनकी मां की सेवा से अति प्रसन्न होकर उन्हें आशीर्वाद स्वरुप में भगवान विष्णु को चढ़ाए गए भोग में से कुछ प्रसाद खाने की अनुमति देता था। धीरे-धीरे उन्हें इन ऋषियों से और आशीर्वाद मिला और उन्होंने कई आध्यात्मिक विषयों पर होने वाली चर्चाओं को सुना। अपनी माँ के निधन के बाद, उन्होंने ‘सर्वोच्च निरपेक्ष सत्य’ को समझने और ज्ञान की खोज में जंगल में घूमने का फैसला किया। एक शांत वन स्थान पर पहुंचकर, पास की धारा से अपनी प्यास बुझाने के बाद, वह ध्यान में एक पेड़ के नीचे बैठ गए और भगवान विष्णु के परमात्मा रूप को जो उनके हृदय में था, उस पर ध्यान केंद्रित करना प्रारंभ किया, जैसा कि उन्होंने पुजारियों द्वारा उनकी सेवा करने के दौरान सीखा था।

भगवान विष्णु के दिव्य रूप का दर्शन एवं नारद मुनि की निराशा

कुछ समय पश्चात नारद मुनि ने अनुभव किया कि विष्णु भगवान उनके सामने खड़े हैं और मुस्कुरा रहे हैं तथा बोले, “उस क्षण उन्हें देखने का आशीर्वाद होने के बावजूद, नारद मुनि तब तक उनके (विष्णु के) दिव्य रूप के दर्शन नहीं कर पाएंगे, जब तक कि उनकी मृत्यु नहीं हो जाती।” भगवान विष्णु ने इसका कारण बताते हुए कहा कि “उन्होंने स्वयं को दिखाने का यह एक मौका उन्हें इसलिए दिया क्योंकि उनके समर्पण में सुंदरता और प्रेम, प्रेरणा का स्रोत होगा और प्रभु के साथ रहने की उनकी सुप्त इच्छा को पूरा करेगा। नारद मुनि को इस प्रकार का निर्देश देने के बाद भगवान विष्णु उनकी दृष्टि से गायब हो गए। जब नारद मुनि अपने ध्यान से जागे तो वह रोमांचित और निराश दोनों हुए। शेष जीवन नारद मुनि ने भक्ति, ध्यान और भगवान विष्णु की आराधना पर ध्यान केंद्रित करने में व्यतीत किया। उनकी मृत्यु के बाद भगवान विष्णु ने उनके आध्यात्मिक रूप “नारद” को आशीर्वाद दिया।

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हिंदू धर्मग्रंथ एवं नारद मुनि की भूमिका

कई हिंदू धर्मग्रंथों में नारद मुनि को भगवान का साक्षात्-अवतार या आंशिक-प्रकट (अवतार) भी माना गया है, जिन्होंने भगवान विष्णु के लिए कई चमत्कारी कार्यों को पूर्ण करने में अहम भूमिका निभाई। देवर्षि नारद को महर्षि व्यास, महर्षि वाल्मीकि और महाज्ञानी शुकदेव का गुरु माना जाता है। दक्ष प्रजापति के 10 हजार पुत्रों को नारदजी ने संसार से निवृत्ति की शिक्षा दी। प्रसिद्ध मैत्रायणी संहिता में नारद को आचार्य के रूप में सम्मानित किया गया है। देवताओं के ऋषि होने के कारण नारद मुनि को देवर्षि कहा जाता है। नारद ऋषि का वर्णन बृहस्पति के शिष्य के रूप में भी मिलता है। अथर्ववेद में भी अनेक बार नारद नाम के ऋषि का उल्लेख है। भगवान सत्यनारायण की कथा में भी महर्षि नारद का विस्तृत उल्लेख है।

हालांकि ऋषि नारद मुनि के कुछ ही मंदिर भारत में स्थित है, जिनमें से सबसे प्रमुख कर्नाटक का “श्री नारद मुनि मंदिर”, चिगातेरी में स्थित है। पद्मपुराण और कुछ अन्य ग्रंथों में नारद मुनि को एक बार स्त्री के रूप में भी परिवर्तित किया गया है ऐसे उदाहरण भी मिलते हैं। एक बार भगवान ने फैसला किया कि यह सही समय है, नारद मुनि के पृथ्वी पर अवतरित होने का, जिससे कि वह पृथ्वी पर सभी मामलों को सही तरह से व्यवस्थित कर दें। इसलिए भगवान ने धरती पर ऋषि नारद को भेजने का फैसला किया और उन्होंने ऋषि नारद को भूतकाल, वर्तमान काल और भविष्य तीनों कालों ज्ञान के जानकारी के वरदान के साथ धरती पर अवतरित किया। नारद मुनि के नाम पर लिखे गए अन्य ग्रंथों में नारद पुराण और नारदस्मृति (छठी शताब्दी के पूर्व पाठ) शामिल हैं, जिन्हें नारदस्मृति में “उत्कृष्ट न्यायिक पत्र के बराबर” कहा गया है यह एकमात्र ऐसा धर्म शास्त्र है जो धार्मिक आचरण और तपस्या की अनदेखी करता हुआ केवल न्यायिक मामलों से पूरी तरह संबंधित है।

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