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जानिए बॉलीवुड के मशहूर संगीत निर्देशक नौशाद अली से जुड़े दिलचस्प तथ्य

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नौशाद अली भारतीय की हिंदी फिल्मों के मशहूर संगीत निर्देशक थे। उन्हें व्यापक रूप से हिंदी फिल्म उद्योग के महानतम और अग्रणी संगीत निर्देशकों में से एक माना जाता है। उन्हें विशेष रूप से हिंदी फिल्मों में शास्त्रीय संगीत का उपयोग करके उसकी लोकप्रियता सामान्य लोगों के बीच बनाने के लिए जाना जाता है। एक स्वतंत्र संगीत निर्देशक के रूप में उनकी पहली फिल्म 1940 में “प्रेम नगर” थी। उनकी पहली संगीतमय फिल्म “रतन” थी, जो कि 1944 में रिलीज हुई। इसके बाद 35 सिल्वर जुबली हिट, 12 गोल्डन जुबली, 3 डायमंड जुबली मेगा हिट फिल्में रहीं। नौशाद को बॉलीवुड के फिल्म उद्योग में उनके योगदान के लिए क्रमशः 1981 और 1992 में दादा साहब फाल्के और पदम भूषण सम्मान से सम्मानित किया गया।

Table Of Contents
  1. नौशाद अली का प्रारंभिक जीवन और संगीत की शिक्षा
  2. नौशाद विंडसर म्यूजिक एंटरटेनर्स का गठन
  3. जब संगीत जगत में अपनी किस्मत आजमाने के लिए नौशाद ने अपना घर छोड़ दिया
  4. मुंबई आकर गुरु खेमचंद से मुलाकात तथा करियर की शुरुआत
  5. फिल्म “नई दुनिया” से शुरू हुआ सफलता का सफर और 40 रुपये प्रति माह पाने वाले नौशाद अब 25000 रुपये प्रति फिल्म चार्ज करने लगे
  6. काफी समय तक नौशाद को अपने परिवार से अपने संगीत की बात छुपाई थी
  7. ऑस्कर पुरस्कार के लिए नामांकित पहली भारतीय फिल्म के संगीतकार, नौशाद
  8. नौशाद द्वारा लोकप्रिय टीवी धारावाहिक के लिए तैयार किया गया बैकग्राउंड म्यूजिक
  9. नौशाद का परिवार एवं उनका निधन
  10. नौशाद द्वारा रचित “आथवाँ सुर” – एक उर्दू शायरी की किताब
  11. नौशाद की दिलचस्प संगीत शैली
  12. निर्माता के रूप में नौशाद के द्वारा किए गए कार्य
  13. कहानीकार के रूप में नौशाद के द्वारा किए गए कार्य
  14. नौशाद द्वारा ग्रहण किए गए पद
  15. नौशाद को दिए गए सम्मान एवं अवॉर्ड्स
  16. नौशाद को दी गई श्रद्धांजलि

नौशाद अली का प्रारंभिक जीवन और संगीत की शिक्षा

नौशाद अली का जन्म 25 दिसंबर 1919 को उत्तर प्रदेश के लखनऊ शहर में हुआ था। उनका पालन पोषण भी यहीं इसी शहर में हुआ। लखनऊ भारतीय इतिहास में एक ऐसा शहर रहा है जिसकी परंपरा पर भारतीय मुस्लिम संस्कृति की छाप साफ दिखाई देती है। पुराने समय में यह भारतीय मुस्लिम संस्कृति के केंद्र के रूप में जाना जाता था। इनके पिता वाहिद अली, मुंशी (कोर्ट में क्लर्क) का कार्य करते थे। बचपन से संगीत में रुचि रखने वाले नौशाद, लखनऊ से 25 किलोमीटर दूर बाराबंकी “देवा शरीफ” वार्षिक मेले में जाया करते थे, जहां उन दिनों के सभी महान कव्वाल और संगीतकार संगीत प्रेमियों के सामने अपने संगीत का प्रदर्शन प्रस्तुत किया करते थे। उन्होंने हिंदुस्तानी संगीत का ज्ञान उस्ताद गुरबत, उस्ताद युसूफ अली, उस्ताद बब्बन साहब और अन्य लोगों के संगत में सीखा। वह हारमोनियम की मरम्मत भी करते थे। बचपन से ही वे एक जूनियर थिएटर क्लब में शामिल हो गए और क्लब में संगीत कलाकार के रूप में उन्होंने अपनी नाट्य प्रस्तुतियां देना शुरू कर दिया। वह लखनऊ के रॉयल थियेटर में मूक फिल्में देखा करते थे। थिएटर के मालिक उस दौरान संगीतकारों की एक टीम, संगीत बजाने के लिए नियुक्त करते थे। इन संगीतकारों की टीम में तबला, हारमोनियम, सितार और वायलिन बजाने वाले लोग हुआ करते थे। संगीतकार पहले फिल्म देखते थे, फिर नोट्स बनाते और अंत में कहां किस तरह का संगीत देना है यह निर्धारित करते थे। जब शाम को शो शुरू होता, तो वे पर्दे के सामने बैठते थे और दृश्यों अनुसार दृश्यों के लिए संगीत बजाते थे। यह उस समय एक साथ एक ही समय में मनोरंजन और संगीत सीखने का एक शानदार तरीका था। इस दौरान उन्होंने फिल्म की पृष्ठभूमि में संगीत की उपयोगिता और उसकी बारीकियों को अच्छे से समझा।

नौशाद विंडसर म्यूजिक एंटरटेनर्स का गठन

समय के साथ नौशाद ने अपने विंडसर म्यूजिक एंटरटेनर्स या सिर्फ विंडसर एंटरटेनर्स का गठन किया, उन्होंने विंडसर नाम सिर्फ इसलिए रखा क्योंकि उन्होंने लखनऊ के आसपास यह नाम देखा था और उन्हें इसका गोलाकार चक्र बहुत पसंद आया। आगे चलकर इंडियन स्टार थिएटर कंपनी जो कि एक थिएटर था और लखनऊ की गोलागंज कॉलोनी में स्थित था, का नेतृत्व किया। उन्हें लड्डन खान से तब तक प्रशिक्षण लिया, जब तक कि वह स्वतंत्र रूप से एक संगीतकार के रूप में कार्य करने के लिए सक्षम नहीं हो गए। इसके बाद ही उन्होंने पंजाब, राजस्थान, गुजरात और सौराष्ट्र जैसी जगहों के लोकगीतों में छुपी दुर्लभ संगीत की बारीकियों को समझा और पूरी तरह से आत्मसात करके अपने संगीत में जोड़ने की कोशिश की। यात्रा करने वाला इनकी यह कंपनी वीरमगाम, गुजरात तक पहुंच गईं, जहां पैसों की कमी के कारण इन सभी को अपने नाटकीय प्रॉप्स और संगीत वाद्ययंत्र बेचने पड़े। उस समय नौशाद के दोस्तों में उनके एक दोस्त की मदद से यह कंपनी वापस लखनऊ आ सकी।

जब संगीत जगत में अपनी किस्मत आजमाने के लिए नौशाद ने अपना घर छोड़ दिया

नौशाद सिनेमा जगत में आने से पहले ही मूक सिनेमा के प्रशंसक बन गए थे और फिर 1931 में भारतीय सिनेमा को जब आवाज और संगीत दोनों मिले, तो ये 13 वर्षीय बालक, नौशाद सिनेमा के प्रति और अधिक मंत्रमुग्ध हो गए। लेकिन उनका परिवार इस्लामिक डिक्टेट का सख्त अनुयायी था और इसी कारण उनके पिता ने उन्हें सख्त हिदायत दी, कि यदि वह घर पर रहना चाहते हैं, तो संगीत छोड़ दें। परंतु नौशाद कहां संगीत छोड़ने वाले थे, ऐसी स्थिति में एक संगीतकार के रूप में अपनी किस्मत आजमाने के लिए वह 1937 के अंत में मुंबई भाग आए।

मुंबई आकर गुरु खेमचंद से मुलाकात तथा करियर की शुरुआत

मुंबई आकर शुरुआत में वह कोलाबा में लखनऊ (उत्तर प्रदेश) से परिचित के साथ रहने लगे। परंतु थोड़े दिन उपरांत वह वहां से निकल कर दादर के फुटपाथ पर सोने लगे, जो कि ब्रॉडवे थियेटर के विपरीत था। उन्होंने उस्ताद झंडे खान (जो उस समय अपनी कैरियर की सफलता के चरम पर थे) के यहां 40 रुपये के मासिक वेतन पर नौकरी की। इसके बाद उन्होंने एक फिल्म में काम किया, जिसका प्रड्यूसर एक रूसी नागरिक था और स्टूडियो चेंबूर में था। परंतु यह फिल्म कभी पूरी ना हो सकी। नौशाद एक पियानो वादक थे इसलिए उन्होंने उस्ताद मुश्ताक हुसैन की ऑर्केस्ट्रा में कुछ समय पियानो वादक के रूप में कार्य किया। उन्होंने अधूरी फिल्म स्कॉर्पियो पूरा किया और मुश्ताक हुसैन के सहायक के रूप में उनको श्रेय दिया गया। इसके पश्चात संगीतकार खेमचंद प्रकाश ने उन्हें 60 रुपए प्रति माह के वेतन पर रंजीत स्टूडियो में “कंचन” फिल्म के सहायक के रूप में अपने पास काम पर रख लिया। जिसके लिए नौशाद ताउम्र उनके आभारी रहे और उन्होंने एक साक्षात्कार के दौरान खेमचंद को अपना गुरु तक कहा।

नौशाद के दोस्त और गीतकार डी.एन. मधोक ने नौशाद की इस असामान्य प्रतिभा और संगीत के प्रति उनके रुझान को देखते हुए उन पर भरोसा किया और उन्हें विभिन्न फिल्म निर्माताओं से परिचित करवाया। रंजीत स्टूडियो के मालिक चंदूलाल शाह ने अपनी आने वाली फिल्मों में से एक के लिए नौशाद को साइन करने की पेशकश कर दी। नौशाद ने भी बड़े उत्साह से इस फिल्म के लिए “बता दे कोई कौन गली श्याम” नामक ठुमरी की रचना की। लेकिन दुर्भाग्यवश यह फिल्म कभी भी रिलीज नहीं हुई। इसके बाद वह पंजाबी फिल्म मिर्जा साहब 1939 के सहायक संगीत निर्देशक बने।

फिल्म “नई दुनिया” से शुरू हुआ सफलता का सफर और 40 रुपये प्रति माह पाने वाले नौशाद अब 25000 रुपये प्रति फिल्म चार्ज करने लगे

नौशाद ने शास्त्रीय संगीत की रागों और लोक संगीत के आधार पर अपनी धुनों को बनाकर फिल्मों में एक संगीत का चलन शुरू किया। जो लोगों द्वारा बहुत पसंद भी किया गया। उन्होंने 1940 में स्वतंत्र रूप से अपनी पहली हिंदी फिल्म प्रेम नगर की रचना की। इस पिक्चर की कहानी को कच्छ में सेट किया गया। जिसके लिए इन्होंने यहां के लोक संगीत के विषय में काफी शोध किया। ए. आर. करदार की फिल्म “नई दुनिया” (1942) में उन्हें एक संगीत निर्देशक के रूप में पहली बार प्रसिद्धि मिली और उन्होंने ‘करदार प्रोडक्शंस’ के लिए नियमित रूप से काम करना प्रारंभ कर दिया। हालांकि करदार प्रोडक्शन ने उन्हें इतनी छूट दी थी, कि वह करदार प्रोडक्शन के बाहर भी काम कर सकते थे और यह छूट उनके करियर के दौरान जारी रही। ए. आर. करदार का ध्यान उन पर पहली बार फिल्म शारदा (1942) के दौरान गया। रतन (1944) वह फिल्म थी, जिसने नौशाद को शीर्ष पर पहुंचा दिया, इसी की वजह से उन दिनों में भी एक फिल्म के लिए 25000 रुपये चार्ज करने में सक्षम हो गए थे।

फिल्म विशेषज्ञ और लेखक राजेश सुब्रमण्यन का कहना है कि 1944 में करदार प्रोडक्शन ने रतन जैसी फिल्म बनाने के लिए उस समय 75,000 रुपये खर्च किए थे। नौशाद साहब का संगीत इतनी शानदार तरीके से लोगों के बीच लोकप्रिय हुआ, कि कंपनी ने पहले ही साल में ग्रामोफोन की बिक्री से रॉयल्टी के रूप में 300,000 रुपये कमा लिए थे। 1942 से 1960 के दशक के अंत तक, उनकी गिनती हिंदी फिल्मों के शीश संगीत निर्देशकों में होने लगे थे। उन्होंने अपने जीवन काल में कुल 65 फिल्में कीं। उनमें से 26 फिल्मों ने सिल्वर जुबली (25 सप्ताह चलने) का जश्न मनाया 8 ने स्वर्ण जयंती (50 सप्ताह चलने) का जश्न मनाया, 4 ने डायमंड जुबली (60 सप्ताह चलने) का जश्न मनाया। नौशाद ने कई गीतकारों के साथ काम किया, जिनमें शकील बदायूनी, मजरूह सुल्तानपुरी, डी. एन. मधोक, जिया सरहदी, युसूफली कीचरी और खुमार बाराबंकवी शामिल हैं।

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काफी समय तक नौशाद को अपने परिवार से अपने संगीत की बात छुपाई थी

लखनऊ में स्थित उनका परिवार इस समय भी उनके संगीत के सख्त खिलाफ रहा और नौशाद को अपने परिवार से इस तथ्य को छुपाना पड़ा कि इस फिल्म के संगीत की रचना उन्होंने की थी। जिस समय नौशाद की शादी हुई, तब बैंड बाजे वाले नौशाद की फिल्म “रत्तन” के सुपरहिट गानों की धुन बजा रहे थे और इधर नौशाद के पिता और ससुर संगीतकार की निंदा कर रहे थे, जिसने इन गानों की रचना की थी। उस समय भी नौशाद के अंदर यह बताने का साहस ही नहीं हुआ कि यह वह संगीत है जिसे उन्होंने तैयार किया है। नौशाद हिंदू मुस्लिम की संस्कृति और उनकी भाषाओं की संस्कृतियों की अच्छी समझ रखते थे।

ऑस्कर पुरस्कार के लिए नामांकित पहली भारतीय फिल्म के संगीतकार, नौशाद

मदर इंडिया 1957 की बेहतरीन फिल्मों में से एक थी। इसका संगीत भी नौशाद ने ही बनाया था। यह पहली भारतीय फिल्म थी जिसे ऑस्कर पुरस्कार के लिए नामांकित किया गया था। 1981 में नौशाद को भारतीय सिनेमा में उनके जीवन भर के योगदान के लिए दादा साहब फाल्के पुरस्कार से सम्मानित किया गया। 1988 में मलयालम फिल्म “ध्वनि” के लिए नौशाद ने एक गाना बनाया जिसे पी. सुशीला और केजे येसुदास ने गाया, यह गीत सदाबहार सुपर हिट गाना बना, और तीन दशकों से भी ज्यादा का समय बीतने के बावजूद यह लोगों के बीच लोकप्रिय बना रहा। उनके सहायकों में, मोहम्मद शफी, जैरी अमलदेव, गुलाम मोहम्मद जो कि संगीतकार थे, प्रमुखता से उनके साथ खड़े रहे।

नौशाद द्वारा लोकप्रिय टीवी धारावाहिक के लिए तैयार किया गया बैकग्राउंड म्यूजिक

नौशाद ने 1988 में टीवी धारावाहिक “अकबर द ग्रेट” के लिए बैकग्राउंड म्यूजिक भी तैयार किया था, जो कि हिंदी फिल्म अभिनेता संजय खान और फिरोज खान के भाई अकबर खान के द्वारा निर्देशित किया गया था। “टीपू सुल्तान की तलवार” भी संजय खान और अकबर खान द्वारा निर्मित और निर्देशित था, यह लोगों के बीच बेहद लोकप्रिय धारावाहिक रहा।

नौशाद का परिवार एवं उनका निधन

वह छह बेटियों जुबेडा, फेहमीदा, फरीदा, सईदा, रशीदा, और वहीदा और तीन बेटों रहमान नौशाद, राजू नौशाद और इकबाल के पिता थे। रहमान नौशाद ने उनकी कुछ फिल्मों में उनके सहायक के रूप में कार्य किया। साथ ही, नौशाद ने, रहमान नौशाद द्वारा निर्देशित दो फिल्में माई फ्रेंड (1974) और तेरी पायल मेरे गीत (1989) के लिए संगीत भी तैयार किया। नौशाद को भारतीय फिल्म उद्योग के सबसे सम्मानित और सफल संगीत निर्देशकों स्थान दिया गया। नौशाद ने महाराष्ट्र राज्य सरकार से “हिंदुस्तानी संगीत” को बढ़ावा देने के लिए एक संस्थान खोलना चाहते थे, जिसके लिए उन्होंने सरकार से एक भूखंड को मंजूरी देने का अनुरोध भी किया। उनके जीवनकाल के दौरान उस भूखंड के लिए सरकार ने मंजूरी दे दी और “नौशाद अकादमी ऑफ हिंदुस्तानी संगीत” का गठन किया गया। नौशाद की मृत्यु 5 मई 2006 को 86 वर्ष की आयु में हृदयगति रुकने के कारण मुंबई में हुई थी। उन्हें जुहू में स्थित मुस्लिम कब्रिस्तान में दफनाया गया था।

नौशाद द्वारा रचित “आथवाँ सुर” – एक उर्दू शायरी की किताब

नौशाद एक सम्मानित और उच्च श्रेणी के कवि भी थे और उन्होंने “आथवाँ सुर” (“द एट नोट”) नामक शीर्षक से अपनी उर्दू शायरी की किताब को औपचारिक रूप से लांच किया और नवरस लेबल ने इसे एल्बम का रूप देते हुए इसका नाम आठवां सुर – द अदर साइड ऑफ नौशाद, इसमें उन्होंने नौशाद की 8 गजलों को लिया, इसको “हौसलों के बुक फेयर” और “बुक मेला उत्सव” के दौरान नवंबर 1998 में लांच किया गया। इस एलबम की बोल और रचना नौशाद द्वारा बनाई गई थीं और हरिहरन ने इन गजलों को गाया था एवं उत्तम सिंह ने इसे व्यवस्थित किया था। इसमें मौजूद आठ गजलों की सूची कुछ इस प्रकार है-

  • कभी मेरी याद उनको आगी से होगी – ए हरिहरन और प्रीति उत्तम सिंह
  • आबदियोन में दश्त का मुंजर भी आया – ए हरीहरन
  • आज की बात कल पे क्या करें – ए हरिहरन और प्रीति उत्तम सिंह
  • मुज को मुअइज किजीये – ए हरिहरन
  • घटा छाई थी सावन खुल के बरस – प्रीति उत्तम सिंह
  • सावन के जब बड़ल छाये – ए हरिहरन
  • पीनय वेलाय बेखुदी कह कै ले – ए हरिहरन और प्रीति उत्तम सिंह
  • तन्हा ख़ुद बोलो करूँ – प्रीति उत्तम सिंह
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नौशाद की दिलचस्प संगीत शैली

  • नौशाद ने फिल्मी गीतों के लिए शास्त्रीय संगीत के साथ कुछ इस तरह का ताना-बाना बुना कि यह नया स्टाइल हर किसी को बहुत पसंद आया। “बैजू बावरा” जैसी कुछ ऐसी फिल्मों रही, जिनके लिए उन्होंने शास्त्रीय संगीत की सभी राग-विधाओं को संगीतबद्ध किया। “बैजू बावरा” के लिए उन्होंने जाने-माने गायक आमिर खान को इस फिल्म के संगीत सलाहकार के रूप में नियुक्त किया। नौशाद शहनाई से लेकर मेंडोलिन और अन्य पश्चिमी वाद्य यंत्रों की भी अच्छी समझ रखते थे। वे अपनी रचनाओं में पश्चिमी संगीत के मुहावरों को शामिल करते थे। यहां तक कि उन्हें पश्चिमी शैली के आर्केस्ट्रा की रचना तक करना आता था। उनके संगीत में एक नयापन था, जो उस समय के बाकी संगीतकारों के संगीत में देखने को नहीं मिलता था।
  • 1940 दशक की शुरुआत में, आधी रात को शांत पार्कों और उद्यानों में रिकॉर्डिंग की जाती थी, क्योंकि उन दिनों स्टूडियो साउंडप्रूफ रिकॉर्डिंग रूम जैसे नहीं होते थे। बगीचों में, टिन की छतों वाले स्टूडियो में गूंजती आवाज़ जैसी कोई प्रतिध्वनि और गड़बड़ी नहीं होती थी।
  • कुछ फिल्में जैसे कि “उड़न खटोला” और, “अमर” के लिए, उन्होंने एक विशेष प्रकार से कलाकार की आवाज को रिकॉर्ड किया। इसके लिए उन्होंने पहले कलाकार की आवाज को 90 के पैमाने पर रिकॉर्ड किया, फिर इसे 70 पर, फिर 50 पर और इसी तरह आगे रिकॉर्डिंग जारी रखीं। पूरी रिकॉर्डिंग के बाद, जब इसके गीतों को सुना गया, तो जो प्रभाव हुआ वह बहुत जबरदस्त था।
  • नौशाद पहले व्यक्ति थे जिन्होंने साउंड मिक्सिंग को फिल्मों में जगह दिलवाई साथ ही उन्होंने आवाज को पहले अलग से रिकॉर्ड किया और बाद में म्यूजिक ट्रैक के साथ रिकॉर्डिंग करवाई ऐसे करवाने का प्रभाव काफी अलग और बेहतरीन साबित हुआ।
  • साथ ही नौशाद बांसुरी और शहनाई, तथा सितार और मैंडोलिन को संयोजित करने वाले भी पहले व्यक्ति थे।
  • उन्होंने अकॉर्डियन को हिंदी फिल्मों के संगीत में जगह दिलवाई।
  • फिल्म की कहानी के पात्र के मूड और संवाद के अनुसार बैकग्राउंड संगीत पर भी ध्यान केंद्रित हो सके, ऐसे संगीत की रचना की।
  • नौशाद के सबसे बड़े योगदान में भारतीय शास्त्रीय संगीत को फिल्मों में लाना माना जाता है। उनकी रचनाएं रागों से भी प्रेरित थीं, इसे लोगों के बीच लोकप्रिय बनाने के लिए, इन्होंने अपने संगीत के लिए कुछ प्रतिष्ठित शास्त्रीय कलाकारों को जैसे आमिर खान और डी. वी. पलुस्कर को “बैजू बावरा” और बड़े गुलाम अली खान को “मुग़ल-ए-आज़म” (1960) के लिए चुनाव किया।
  • “बैजू बावरा” (1952), ने नौशाद की शास्त्रीय संगीत की समझ और उनकी क्षमता का प्रदर्शन सभी के सामने प्रदर्शित किया, जिसके लिए उन्होंने 1954 में पहला फ़िल्मफ़ेयर सर्वश्रेष्ठ संगीत निर्देशक का पुरस्कार जीता।
  • नौशाद ने “बैजू बावरा” के बारे में रिलीज से पहले मीडिया के साथ बैठक में एक टिप्पणी की, कि “जब लोगों ने सुना कि फिल्म शास्त्रीय संगीत और रागों से भरी होगी, तो उन्होंने विरोध किया, ‘लोगों को सिरदर्द होगा’ और ‘वे भाग जाएंगे।’ परंतु मैं अपने निश्चय पर अडिग था। मैं लोगों का शास्त्रीय संगीत के प्रति रवैया और सोच बदलना चाहता था, कुछ ऐसा फिल्मों में लाना चाहता था जो लोगों को पसंद भी आए और हमारी संस्कृति के संगीत के साथ जुड़ा हुआ भी हो, इसीलिए हमने उन्हें अपनी संस्कृति के संगीत के साथ इसे प्रस्तुत किया और लोगों ने इस काम को पसंद भी किया।”
  • फिल्म आन (1952) के लिए वह पहले व्यक्ति थे, जिन्होंने 100 ऑर्केस्ट्रा का इस्तेमाल किया।
  • वह भारत में, पश्चिमी अंकन की प्रणाली को विकसित करने वाले पहले संगीतकार थे।
  • फिल्म “आन” के संगीत का अंकन लंदन में एक पुस्तक के रूप में भी प्रकाशित किया गया।
  • फिल्म “उड़न खटोला” (1955) में, उन्होंने ऑर्केस्ट्रा के उपयोग के बिना ही एक पूरे गाने को रिकॉर्ड किया, उन्होंने संगीत वाद्य यंत्रों की जगह गुनगुनाने की ध्वनि को इस्तेमाल किया।
  • फिल्म “मुग़ल-ए-आज़म” (1960) का गीत “ऐ मोहब्बत जिंदाबाद”, के लिए उन्होंने 100 व्यक्तियों की कोरस में इस्तेमाल किया।
  • फिल्म केेे एक अन्य गीत “प्यार किया तो डरना क्या” के लिए उन्होंने लता मंगेशकर को बाथरूूम में बंद किया और गीत के एक हिस्से को प्रस्तुत करने के लिए कहा, सब कुछ उन्होंने गूंज के प्रभाव को प्राप्त करने के लिए किया था।
  • फिल्म “गंगा जमुना” (1961), में उन्होंने पूरी तरह से भोजपुरी बोली में गीत का इस्तेमाल किया।
  • इसी प्रकार कुछ अलग करने की चाह में उन्होंने फिल्म “मेरे महबूब” (1963), के शीर्षक गीत में सिर्फ छह उपकरणों का इस्तेमाल किया।
  • 2004 में, क्लासिक मुग़ल-ए-आज़म (1960) का एक रंगीन संस्करण जारी किया गया, जिसके लिए आज के संगीतकारों द्वारा, नौशाद के लिए एक बार फिर से एक ऑर्केस्ट्रा संगीत का इंतजाम किया गया (जो मूल रूप से डॉल्बी डिजिटल में था ) जबकि मूल साउंडट्रैक से सभी एकल संगीत को बनाए रखा गया।
  • उन्होंने 86 वर्ष की आयु में एक शाश्वत लव स्टोरी ताजमहल की धुनों की रचना की यह फिल्म 2005 में बनी थी।

निर्माता के रूप में नौशाद के द्वारा किए गए कार्य

  • बाबुल (1950)
  • उड़न खटोला (1955)
  • मालिक (1958) इस फ़िल्म के संगीत निर्देशक गुलाम मोहम्मद थे।

कहानीकार के रूप में नौशाद के द्वारा किए गए कार्य

  • पालकी (1967)
  • तेरी पायल मेरे गीत (1989)

नौशाद द्वारा ग्रहण किए गए पद

  • आलम-ए-उर्दू सम्मेलन (दिल्ली) के अध्यक्ष
  • सिने म्यूजिक डायरेक्टर्स एसोसिएशन के अध्यक्ष
  • महाराष्ट्र स्टेट एंगलिंग एसोसिएशन के अध्यक्ष
  • भारतीय प्रदर्शन अधिकार सोसायटी के अध्यक्ष
  • मुंबई के विशेष कार्यकारी मजिस्ट्रेट का शीर्षक

नौशाद को दिए गए सम्मान एवं अवॉर्ड्स

  • 1954: फिल्मफेयर सर्वश्रेष्ठ संगीत निर्देशक पुरस्कार – बैजू बावरा
  • 1961: बंगाल फिल्म जर्नलिस्टस एसोसिएशन का बंगाली फिल्म गंगा जमुना (1961) के लिए सर्वश्रेष्ठ संगीत निर्देशक का पुरस्कार
  • 1975: टेलीविज़न सेंटर, मुम्बई द्वारा निर्मित “नौशाद अली”, 30 मिनट की एक डॉक्यूमेंट्री फ़िल्म
  • 1981: दादा साहब फाल्के पुरस्कार1984: लता मंगेशकर पुरस्कार (मध्य प्रदेश राज्य सरकार का पुरस्कार)
  • 1987: अमीर खुसरो पुरस्कार
  • 1990: टीपू सुल्तान टीवी श्रृंखला “टीपू सुल्तान की तलवार” के लिए सर्वश्रेष्ठ संगीत
  • 1992: संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार1992: भारतीय सिनेमा में उनके जीवनकाल के योगदान के लिए पदम भूषण पुरस्कार
  • 1993: उत्तर प्रदेश सरकार द्वारा अवध रत्न पुरस्कार
  • 1994: महाराष्ट्र गौरव पुरस्कार पुरस्कार
  • 2000: स्क्रीन लाइफ टाइम अचीवमेंट अवार्ड

नौशाद को दी गई श्रद्धांजलि

  • नौशाद के जीवन और कार्यों के ऊपर पांच फिल्में बनी। जीवनी संबंधी पुस्तकों की बात करें तो शशिकांत किणीकर की दास्तान-ए-नौशाद (मराठी) हैं, आज गावत मन मेरो (गुजराती), शमा और सुषमा पत्रिकाओं में क्रमशः “नौशाद की कहानी, नौशाद की जुबानी” शीर्षक से हिंदी और उर्दू जीवनी रेखाचित्र, जिसका बाद में मराठी में अनुवाद शशिकांत किनिकर द्वारा किया गया था। किनिकर ने “नौशाद के नोट्स” नामक एक पुस्तक भी निकाली, जिसमें नौशाद के जीवन के कुछ दिलचस्प किस्से हैं।
  • 2008: बांद्रा में स्थित कार्टर रोड का नाम बदलकर उनकी स्मृति मेंसंगीतसम्राट नौशाद अली मार्ग कर दिया गया।

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