जानिये देवयानी (शुक्र-देव की पुत्री), ययाति और शर्मिष्ठा की कहानी

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देवयानी शुक्रदेव की पुत्री थी, जो सभी असुरों के गुरु थे। शुक्र देव की अर्धांगिनी का नाम ओराजस्वती था। देवयानी को कच्छ ऋषि द्वारा श्राप दिया गया था कि उनका विवाह किसी भी देवता या देवता के पुत्र से नहीं होगा। उस समय असुरों के राजा का नाम वृषपार्वा था, जिनके साथ उसी के महल में शुक्र देव भी निवास कर रहे थे। राजा वृषपार्वा की एक पुत्री थी, जिसका नाम शर्मिष्ठा था। शर्मिष्ठा और देवयानी जल्द ही बहुत करीबी मित्र बन गई।

शर्मिष्ठा द्वारा देवयानी का अपमान

एक दिन शर्मिष्ठा और देवयानी जंगल में अपनी दासियों के साथ खेलने के लिए गई। जब वह दोनों नदी में स्नान कर रही थी, तभी वहां इंद्रदेव उनके साथ एक मजाक करने के उद्देश्य से वहां प्रकट हुए। उन्होंने हवा का रुप धारण किया और देवयानी तथा शर्मिष्ठा के कपड़े उड़ा दिए। कपड़ों को उड़ता हुआ देख, दोनों नदी से बाहर निकलीं और अपने कपड़े वापस पाने का प्रयत्न करने लगीं। शर्मिष्ठा को देवयानी की पोशाक मिल गई और वह उसे पहनने का प्रयास करने लगी। देवयानी ने भी उसी पोशाक को पकड़ रखा था और उसे खींचकर पहनने का प्रयास किया। इस पर शर्मिष्ठा बहुत क्रोधित हो गई और देवयानी पर चिल्ला उठी, उसने देवयानी के पिता अर्थात शुक्र देव को आवारा बोलकर उनका अपमान किया और साथ ही यह भी कहा कि वह उनके पिता की दया पर उनके महल में रह रहे हैं।

राजा ययाति द्वारा देवयानी की रक्षा

इसके बाद शर्मिष्ठा ने देवयानी से उनकी पोशाक छीनकर खुद पहन लीं और देवयानी को कुएं में धक्का देकर स्वयं घर आ गई। उसी समय, वहां राजा ययाति जंगल में शिकार करने के उद्देश्य से आए हुए थे। उन्हें प्यास लगी इसलिए वह कुएं के पास कुछ पानी पीने को गए और वहां उन्होंने देवयानी को ऐसी परिस्थिति में देख कर उनकी रक्षा की। उसके पश्चात राजा ययाति अपने राज्य की ओर चले गए, परंतु देवयानी अपने घर वापस नहीं गई।

शुक्र देव द्वारा वृषपर्वा का राज्य छोड़ना

जब बहुत देर तक देवयानी घर नहीं लौटी, तो शुक्र देव और उनकी पत्नी ओराजस्वती चिंता करने लगे। उन्होंने देवयानी की मित्र गोर्निका को बुलाया ताकि वें देवयानी को खोज कर वापस ला सके। गोर्निका को आसानी से देवयानी का पता लगा लिया परंतु देवयानी ने अपने पिता के पास वापस आने से इंकार कर दिया। उन्होंने कहा से अपने पिता के साथ उस घर में नहीं रहना चाहती जो वृषपर्वा के दान में मिला हैं। यह सुनकर गोर्निका ने सारा वृतांत शुक्र देव और उनकी पत्नी बतलाया। माता-पिता दोनों ही देवयानी से मिलने जंगल आए और तब देवयानी ने शुक्र देव को जंगल में हुई सारी घटना के बारे में बताया। शुक्र देव अत्यधिक कुपित हो गए और उन्होंने वृषपर्वा को सूचित किया कि वे अपने परिवार सहित उसका राज्य छोड़ रहें हैं। वृषपर्वा अच्छी तरह से जानता था कि असुरों की सारी शक्ति शुक्र देव के साथ है इसलिए उसने क्षमा याचना की। तब देवयानी ने राजा से कहा यदि वे राजकुमारी शर्मिष्ठा सहित उनकी सेवा के लिए एक सौ दास दासियां भेजेंगे, तो शुक्र देव वापस आ जाएंगे।

ययाति और देवयानी का विवाह

कुछ समय बाद देवयानी की मुलाकात ययाति से उसी जंगल में हुई जहाँ वे शिकार करने के लिए उस दिन भी आए थे। देवयानी ने कहा कि जिस दिन उन्होंने उन्हें बचाया था उन्होंने तभी से मन से उन्हें अपने पति के रूप में चुन लिया था। ययाति यह जानते थे कि देवयानी शुक्र देव की पुत्री है। उसने कहा कि मैं आपसे विवाह करने को तैयार हूं लेकिन तभी यदि उनके पिता शुक्र देव इस विवाह की अनुमति दें। देवयानी ने जंगल में आए अपने माता-पिता को ययाति की इस शर्त के विषय में बताया। शुक्र देव तुरंत स्वेच्छा से अपनी पुत्री का विवाह ययाति से करने के लिए तैयार हो गए। जब देवयानी, ययाति के राज्य में गईं, तो अपने साथ शर्मिष्ठा को दासी के रूप में साथ लेकर गई। शुक्र देव ने ययाति को अपने पास बुलाया और चेतावनी दी कि वह गलती से कभी भी शर्मिष्ठा को हाथ न लगाएं।

ययाति द्वारा देवयानी और शर्मिष्ठा से पुत्र प्राप्ति

कुछ समय पश्चात ययाति और देवयानी को पुत्र रत्न की प्राप्ति हुई, जिसका नाम यदु रखा गया। यह वह समय था जब शर्मिष्ठा गुप्त रूप से राजा ययाति से मिलने लगी थी और उसने ययाति से एक पुत्र प्राप्ति का अनुरोध भी किया। परंतु ययाति शुक्र देव की धमकी से इतना डरा हुआ था कि उसने मना कर दिया। परंतु शर्मिष्ठा ने अपनी बुद्धिमता का उपयोग करके ययाति को अपने प्रस्ताव के लिए मना लिया और शर्मिष्ठा और राजा ययाति के इस पुत्र का नाम द्रुहु रखा गया। देवयानी को शर्मिष्ठा के पुत्र के जन्म के विषय में पता चला, परंतु वह इस बात से अनजान थी कि इस पुत्र का पिता कौन है? साल बीतते गए और इन वर्षों में देवयानी के अगले पुत्र का नाम तुर्वसु रखा गया। वहीं इस बीच शर्मिष्ठा के भी दो पुत्र हुए एक का नाम अनद्रुह्यु और दूसरे का नाम पूरु रखा गया।

शुक्र देव द्वारा ययाति को शाप देना

एक बार देवयानी और राजा ययाति महल के बगीचे में घूम रहे थे, तभी शर्मिष्ठा के तीनों पुत्र वहां आ गए। देवयानी को उन तीनों पुत्रों में राजा ययाति से मिलती जुलती समानताएं दिखाई दीं। असमंजस की स्थिति से निपटने के लिए देवयानी ने उसके पुत्र को बुला कर और उससे उसके पिता का नाम पूछा, बालक ने बिना झिझक अपने पिता का नाम राजा ययाति बताया। इस बात को जानकर देवयानी अत्यधिक क्रोधित हुई और फौरन वहां से अपने पिता शुक्र देव के पास जा पहुंची और उन्हें इस सारी घटना के बारे में बताया। शुक्र देव ने कुपित होकर ययाति को श्राप दिया कि वह सौ वर्षीय वृद्ध हो जाएगा।

ययाति और शर्मिष्ठा के पुत्र पुरु द्वारा शाप विमोचन

ययाति वहां पहुंचकर शुक्रदेव से क्षमा याचना करने लगा। इस पर शुक्र देव ने उससे कहा कि यदि कोई इच्छा से अपना यौवन उसकी सौ वर्षीय वृद्धावस्था के साथ बदलना चाहेगा तो उसे वापस अपना पुराना रूप मिल जाएगा। ययाति ने वापस आकर अपने प्रत्येक पुत्र को बुलाया और उनसे अनुरोध किया कि वे उसके साथ अपने यौवन का आदान प्रदान करें, लेकिन सभी ने मना कर दिया केवल शर्मिष्ठा का पुत्र पुरु उनकी इस बात के लिए तैयार हो गया। इसके बाद ययाति ने सौ वर्षों तक राजा के रूप में राज्य किया और उनके बाद पुरु राजा बना।

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