पूजा-उपासना में इन 20 बातों का अवश्य ध्यान रखिये

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हिन्दू धर्म में वेदों, पुरानों और उपनिषदों में पूजा-उपासना के तरीकों की व्याख्या की गई है. यह जानना ज़रूरी है कि क्या निषेध है और क्या उपयुक्त है.

  • शिवलिंग पर चढ़ाये हुए फल, फूल, पत्र, जल तथा अन्य नैवेद्य ग्रहण करने के लिए उपयुक्त नहीं समझे जाते. हालांकि यदि इनका स्पर्श शालिग्राम से हो जाये तो ये ग्रहण के योग्य हो जाते हैं.
  • घर के अन्दर तीन गणेश, दो शालिग्राम, दो शिवलिंग, दो सूर्य की प्रतिमा, तीन देवी की प्रतिमा, दो गोमती चक्र का पूजन निषेधित माना जाता है. ऐसा करने से गृहस्वामी को अशांति और अवसाद की संभावना बढती है.
  • घर में स्थापित सभी मूर्तियों या प्रतिमाओं का आकार एक अंगूठे से एक बित्ते के बीच का ही होना चाहिए. एक अंगूठे से छोटी और एक बित्ते से बड़ी प्रतिमा की घर में स्थापना करने से उद्वेग उत्पन्न हो सकता है.
  • पद्म पुराण में लिखा है की शालिग्राम को बेचने वाला और खरीदने वाला दोनों ही पाप के भागी होते हैं.
  • तांबा भगवान को अत्यंत प्रिय है. ताम्बे के पात्र में रखकर कोई भी भोग अर्पित किया जाए तो भगवन उसको सहर्ष स्वीकार करते हैं. वाराहपुराण में यह कथन है कि भगवान को जल, फल तथा आहार इत्यादि तांबे के पात्र में रखकर अर्पण करनी चाहिए.
  • वाराहपुराण के अनुसार भगवान् विष्णु की उपासना में नीला, लाल, या काला वस्त्र पहनना उचित नहीं है.
    देवताओं की पूजा अर्चना उत्तर या पूर्व दिशा की तरफ मुख कर करनी चाहिए. पितरों की पूजा दक्षिण की ओर मुंह करके करनी चाहिए.
  • घी का दिया देवता या देवी के दायीं तरफ और तिल के तेल का दिया उनके बायीं तरफ रखना चाहिए.
  • नारदपुराण में लिखा है कि देवी के मंदिर की परिक्रमा एक बार करनी चाहिए. शिव के मंदिर की परिक्रमा आधी बार, विष्णु के मंदिर की चार बार, सूर्य के मंदिर की सात बार, और गणेश के मंदिर की सात बार करनी चाहिए.
  • सूर्यदेव को नमस्कार प्रिय है, कार्तवीर्य अर्जुन को दीप. गणेश भगवान को तर्पण प्रिय है और देवी माता को अर्चना. विष्णु भगवान् को स्तुति प्रिय है और शिव को अभिषेक. वस्तुतः इन देवताओं को प्रसन्न करने के लिए इनके द्वारा प्रिय कार्य ही करने चाहिए.
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  • भगवान शिव की पूजा में केतकी, नागकेसर, मालती, कुटज और बंधूक नाम के पुष्प नहीं चढ़ाने चाहिए. दुर्गा माता को दूर्वा, आंवला, मदार और आक के फूल नहीं चढ़ाने चाहिए. गणेश जी के पूजन में तुलसी जी को सर्वथा इस्तेमाल नहीं करना चाहिए.
  • घर में ऐसी प्रतिमा नहीं रखनी चाहिए जो जली हुई हो, खंडित हो, टेढ़ी हो, जिसका अंग-भंग हो या आँख फूटी हो.
  • लिखितस्मृति में ये अंकित है कि गीले वस्त्र पहन के किया हुआ जप, हवन, अभिषेक और दान निष्फल होता है.
  • नवरात्रि में कन्या पूजन के भी अपने नियम हैं. कुमारी वही कन्या होती है जिसकी आयु कम से कम दो वर्ष हो. तीन वर्ष की कन्या ‘त्रिमूर्ति’ कहलाती है. चार वर्ष की कन्या को ‘कल्याणी’ कहते हैं. पांच वर्ष की कन्या ‘रोहिणी’ कहलाती है. छः वर्ष की कन्या को कालिका कहते हैं. सात वर्ष की कन्या ‘चंडिका’ स्वरुप होती है. आठ वर्ष वाली कन्या को ‘शाम्भवी’ और नौ वर्ष वाली कन्या को ‘दुर्गा’ कहते हैं. जो कन्या दस वर्ष की हो उसको ‘सुभद्रा’ की उपाधि दी गयी है. दो वर्ष से नीचे और दस वर्ष से ऊपर की कन्या का पूजन नवरात्रि के कन्यापूजन में नहीं करना चाहिए.
  • सूर्य देव से आरोग्य की याचना करनी चाहिए. शिव से ज्ञान की और विष्णु से मोक्ष की प्रार्थना करनी चाहिए. दुर्गा माता से रक्षा की, भैरव से कठिनाईयों के हरण की और गणेश भगवन से विघ्न हटाने की स्तुति करनी चाहिए. सरस्वती माँ से ज्ञान की, पार्वती माँ से सौभाग्य की, स्कन्द से संतान वृद्धि की और लक्ष्मी माता से ऐश्वर्य वृद्धि की याचना करनी चाहिए.
  • मंदिरों में या चित्रों में सूर्यदेव के पैरों को नहीं बनाना चाहिए. जो भी सूर्यदेव के पैरों का निर्माण करता है वह दुखों को भोगता है. आइये जानते हैं ऐसा क्यों माना जाता है – त्वष्टा की पुत्री ‘संज्ञा’ का विवाह सूर्यदेव से हुआ था. संज्ञा सूर्य के तेज को सहने में असमर्थ थी. त्वष्टा ने सूर्यदेव से याचना की कि यदि सूर्य देव की आगया हो तो वह उनका थोडा तेज छांट कर अलग कर सकें. सूर्यदेव इस बात के लिए मान गए. त्वष्टा ने सूर्यदेव के तेज को छांट कर अलग किया और उससे अस्त्र-शस्त्र का निर्माण किया. सुदर्शन चक्र का निर्माण भी सूर्य के तेज से किया गया. परन्तु त्वष्टा सूर्य के पैरों को ना देख सके इसलिए सूर्य के पैरों का तेज ज्यों का त्यों रह गया.
  • कूर्मपुराण में कहा गया है कि जब गुरु क्रुद्ध हो जाये तो उसके मुख पर दृष्टि नहीं डालनी चाहिए.
  • स्कन्दपुराण में उल्लिखित है कि गंध, गौ, पुष्प, दही, साग, फल, मूल, ईंधन और अभय दक्षिणा किसी निकृष्ट व्यक्ति से भी प्राप्त हों तो ग्रहण कर लेनी चाहिए.
  • अमावस्या, पूर्णिमा, द्वादशी, संक्रांति, रात्री और दोनों संध्याओं के समय तुलसी के पत्तों को तोड़ना वर्जित है. ब्रह्मवैवर्त पुराण में कहा गया है कि ऐसा करने वाले मानो श्री हरि के मस्तक में छेद करने के बराबर अपराध करते हैं.
  • सूखे और बासी फूलों और पत्तों से भगवान का पूजन नहीं करना चाहिए. नारद पुराण के अनुसार यदि बेल (बिल्वा), आंवला, खैर और तमाल के पत्ते कटे-फटे भी हों तब भी पूजन हेतु उपयुक्त होते हैं. इसी प्रकार कमल का पुष्प तीन दिन तक शुद्ध रहता है. तुलसीदल और बेलपत्र हमेशा शुद्ध रहते हैं. इनको एक बार चढ़ाने के बाद दुबारा भी चढ़ा सकते हैं.

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