जानिये पृथ्वी के प्रथम राजा ‘प्रथू’ के बारे में ये अनोखे तथ्य

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यम की पुत्री सुनीता का सुशंख पर आकर्षित होना

ध्रुव के शाही वंश में अंग नामक एक राजा था। उनका विवाह मृत्यु के देवता यम की पुत्री सुनीता से हुआ था। सुनीता का स्वभाव क्रूर था और वो सभी को मारती और सजा देती थी। एक बार वह जंगल में गई, जहां उसने एक अति सुंदर गंधर्व युवक देखा। इस गंधर्व युवक का नाम सुशंख था, यह गेथाकोलाहल का पुत्र था। सुशंख जंगल में तपस्या कर रहा था। वह बहुत सुंदर और संगीत में बहुत माहिर था। सुनीता उसकी ओर बहुत आकर्षित हुई, परंतु सुशंख ने उसकी किसी भी प्रतिक्रिया का कोई उत्तर नहीं दिया। यह देख सुनीता, सुशंख को परेशान करने लगी, लेकिन सुशंख ने अपनी अच्छाई के चलते सुनीता को कोई भी जवाब ना देना ही सही समझा उचित समझा और सब कुछ अनदेखा कर दिया।

सुशंख द्वारा सुनीता को शाप देना

एक दिन सुनीता ने उसे बहुत पीटा। सुशंख ने सुनीता से कहा आप एक स्त्री हैं पर इस तरह का व्यवहार आपको शोभा नहीं देता आपको ऐसा नहीं करना चाहिए इस पर सुनीता ने उसे उत्तर दिया कि “मैं मृत्यु के देवता यम की पुत्री हूं और मैं भी उनकी तरह सजा दूंगी।” जब सुनीता ने अपने पिता को इस घटना के बारे में बताया, तो वह बस चुप रहे। इससे सुनीता को और अधिक क्रोध आया और उसने फिर से सुशंख की पिटाई शुरू कर दी। गुस्से में आकर सुशंख ने सुनीता को श्राप दिया कि “आपका होने वाला पुत्र, आप से भी ज्यादा पापी होगा और वह जीवन पर्यंत सिर्फ देवताओं और ब्राह्मणों को परेशान करेगा।”

ऋषियों द्वारा सुनीता के पुत्र वेना का वध

सुनीता ने सुशंख के श्राप को जरा भी गंभीरता से नहीं सुना तथा समय बीत गया। कुछ समय पश्चात उसे एक पुत्र की प्राप्ति हुई, इस पुत्र का नाम वेना रखा गया। वेना एक अत्यंत क्रूर व्यक्ति था और अपनी प्रजा के साथ-साथ अपने राज्य में रहने वाले महान संतों को भी परेशान करने लगा। उसमें उन सब से कहा कि “आप में से कोई भी देवताओं के लिए कोई यज्ञ आहुति नहीं देगा, यदि आपको यज्ञ आहुति से विशेष लगाव है तो आप उन्हें मुझे अर्पित करें। हालांकि संतो ने वेना को समझाने का प्रयास किया, कि यज्ञ आहुति करने से देवता प्रसन्न होते हैं और उनका आशीर्वाद सदैव राज्य और प्रजा पर बना रहता है। परंतु वेना ने उनकी एक न सुनी। उसके दिन पर दिन बढ़ते अत्याचारों से तंग आकर ऋषियों ने दूर्वा घास को लेकर उसे पवित्र मंत्रों द्वारा सिद्ध करके एक हथियार के रूप में तैयार कर लिया और वेना को मार दिया।

ऋषियों द्वारा मृत वेना के दोनों हाथो का मंथन

अब देश में कोई भी राजा ना होने के कारण पूरे राज्य में चोर और डकैतों के भय का सामना करना पड़ा। प्रजा चोर डकैतों के कारण तरह-तरह के अत्याचारों का सामना करने पर मजबूर हो गई। अंत में सभी ने ऋषियों के पास जाकर उनसे उनके लिए एक राजा बनाने का अनुरोध किया। ऋषियों ने मृत वेना के बाएं हाथ का मंथन किया। उसके बाएं हाथ के मंथन से एक काला छोटा व्यक्ति उभरा। वह वेना द्वारा किए गए पापों का व्यक्तिकरण था। संतों ने उसे निषाद नाम दिया और उसे अपने आप जीवित रहने के लिए स्वयं शिकार की व्यवस्था करने के लिए कह कर उसे जाने को कहा। इसके बाद ऋषि ने वेना के दाहिने हाथ का मंथन किया, उसके दाहिने हाथ के मंथन से एक दिव्य बालक, हाथों में धनुष और तीर के साथ पवित्र चक्र लेकर अवतरित हुआ। संतों और देवताओं ने उसे प्रथू नाम दिया और उसे संपूर्ण धरती पर राज्य करने हेतु राजा घोषित किया। अजगवम नामक पवित्र धनुष और कवच उसके लिए स्वर्ग से उपहार स्वरूप आकर उसके पास गिरे। समुंद्र ने भी उसके स्वागत के लिए बहुमूल्य रत्नों की भेंट दी। भगवान ब्रह्मा ने उसके दाहिने हाथ पर पवित्र चक्र के निशान को देखकर यह समझने में जरा भी देर नहीं लगाई, कि बालक कोई और नहीं अपितु भगवान विष्णु का अवतार स्वरूप है।

प्रथू द्वारा राज्यग्रहण करना

इस बालक प्रथू ने उन सभी लोगों को एकीकृत किया जो इनके पिता द्वारा परेशान और विभाजित कर दिए गए थे और प्रजा ने उन्हें “राजा” (वह जो एकीकृत करता है) के नाम से संबोधित किया। यह इतने महान थे कि जब कभी वह पहाड़ को पार करने जाते तो समुंद्र स्वयं उन्हें मार्ग बनाकर दे देता था। भगवान ब्रह्मा द्वारा निमित्त सुता और मगध नामक दो कवियों ने प्रथू की प्रशंसा में लिखा है कि “यह राजा हमेशा सच कहेगा, अपने द्वारा किए गए वचनों पर सदैव अटल रहेगा, धर्मार्थ होगा और सभी अच्छे चरित्र के गुणों को आत्मसात करेगा।”

प्रथू द्वारा गाय रुपी पृथ्वी का कष्ट दूर करना

एक बार प्रथू को एक बड़ी विकट समस्या का सामना करने करना पड़ा। उनके पिता के कुशासन के दौरान सभी पेड़ पौधों को पृथ्वी देवी ने पृथ्वी के अंदर खींच लिया था, जिस कारण इस समय किसी भी व्यक्ति के पास खाने के लिए कोई भी वनस्पति शेष ना बची। प्रथू ने पृथ्वी का शिकार करने की कोशिश की, जिन्होंने एक गाय का रूप धारण किया और भागना प्रारंभ कर दिया। प्रथू ने देवी पृथ्वी का अनुसरण किया। जहां जहां वह गई, वह भी उनका पीछा करते गए। अंत में प्रथू में गाय (देवी) पर तीर चलाने को का फैसला किया। इससे गाय (देवी) ने प्रथू से पूछा “हे राजा तुम मुझे मारने की कोशिश क्यों कर रहे हो? मैं तो एक स्त्री हूं।” राजा ने उत्तर दिया “जो लोग बुरे कर्म करते हैं, धर्म उन्हें मारने की अनुमति देता है। तुम मेरे लोगों को भूखा मार रही हो।” गाय ने प्रत्युत्तर में कहा “यदि तुम मुझे मार दोगे, तो तुम्हारे प्रजा के पास रहने के लिए कोई स्थान ना होगा।” राजा ने उत्तर दिया “मैं अपनी दिव्य शक्तियों द्वारा उनके रहने के लिए एक उचित स्थान का निर्माण करूंगा।” तब गाय ने उनसे कहा- “मैं दूध के रूप में आपको सभी पेड़ पौधे और भोजन वापस दे दूंगी, लेकिन उसके लिए, आपको मेरे लिए एक बछड़ा बनाना होगा और उसे मेरा दूध पिलाना होगा।”

प्रथू ने देखा चारों तरफ सिर्फ पहाड़ ही पहाड़ थे, इसलिए खेती करना संभव ना था। उन्होंने सभी पहाड़ों को एक साथ खींचा और एक खेती लायक भूमि बना दी। उसके बाद उन्होंने स्वायंभुव मनु को एक बछड़ा बनाया और गाय रुपी पृथ्वी का दूध पिलाया। इस प्रकार उन्होंने सभी पेड़ पौधों और पशुओ को वापस पा लिया, और इसी कारण वह पृथ्वी के पिता बन गए और पृथ्वी का नाम प्रथू की वजह से पृथ्वी पड़ा। इसके बाद प्रथू संपूर्ण पृथ्वी के सम्राट बन गए और प्रजा की देखभाल करने लगे, जिसमें सभी प्रकार के प्राणी शामिल थे। महाराज पृथु ने ही पृथ्वी को समतल किया जिससे वह उपज के योग्य हो पायी। महाराज पृथु से पहले इस पृथ्वी पर पुर-ग्रामादि का विभाजन नहीं था; लोग अपनी सुविधा के अनुसार बेखटके जहाँ-तहाँ बस जाते थे।

राजा प्रथू द्वारा किये गए अश्वमेध यज्ञ

राजा प्रथू ने 99 अश्वमेध यज्ञ किये थे। सौवें यज्ञ के समय इन्द्र ने अनेक वेश धारण कर अनेक बार घोड़ा चुराया, परन्तु महाराज पृथु के पुत्र इन्द्र को भगाकर घोड़ा ले आते थे। इन्द्र के बारंबार कुकृत्य से महाराज पृथु अत्यन्त क्रोधित होकर उन्हें मार ही डालना चाहते थे कि यज्ञ के ऋत्विजों ने उनकी यज्ञ-दीक्षा के कारण उन्हें रोका तथा मन्त्र-बल से इन्द्र को अग्नि में हवन कर देने की बात कही, परन्तु ब्रह्मा जी के समझाने से पृथु मान गये और यज्ञ को रोक दिया। सभी देवताओं के साथ स्वयं भगवान् विष्णु भी पृथु से परम प्रसन्न थे।

राजा प्रथू का पंचतत्वों में विलीन होना

वृद्धावस्था में पहुंचने पर प्रथू ने अपने पुत्र विजयथश्व को पृथ्वी का सारा कार्यभार सौंप दिया और स्वयं वनों में तपस्या करने के लिए चले गए। घोर तपस्या करने के पश्चात वह भगवान में विलीन हो गए।

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