Home धर्म और आस्था जानिये देवी माया के विषय में प्रचलित पुराणों की ये अनोखी कथाएं

जानिये देवी माया के विषय में प्रचलित पुराणों की ये अनोखी कथाएं

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अग्नि पुराण के अनुसार माया देवी के वंश की जानकारी

हिम्सा (हिंसा) ने अधर्म (बेईमान कर्म) से विवाह किया। उनकी दो संतानें हुई, एक अनुरथम (कार्य करने की कमी) और निकृथी (बेईमानी)। बदले में, आगे चलकर इन दो संतानों की चार संताने हुई। जिनका नाम क्रमशः भयम (भय), नारकम (नरक), माया (भ्रम) और वेदना (दर्द)। माया ने मृथु (मृत्यु) और वेदना ने दुखा (दुःख) को जन्म दिया। वहीं मृथु ने आगे चलकर चार बच्चों क्रमशः व्याधि (बीमारी), जरा (बुढ़ापा), सोका (दुःख), तृष्णा (आकर्षण) और क्रोध (क्रोध) को जन्म दिया। पुराणों में देवी माया के विषय में 2 कहानियां प्रचलित हैं।

गाधि ब्राह्मण और माया देवी की कथा

कोशल देश में गाधि नाम का एक ब्राह्मण रहता था। एक दिन वह जंगल में गया और वहां गर्दन तक के गहरे पानी में जाकर खड़ा हो गया और भगवान विष्णु की तपस्या करने लगा। इस प्रकार तपस्या करते हुए जब 8 महीने बीत गए, तब भगवान विष्णु उसके सामने प्रकट हुए। भगवान विष्णु ने उससे कहा कि वे उससे प्रसन्न है अतः यदि वह कोई वरदान मांगना चाहता है तो मांग ले। गाधि ने कहा कि वह देवी माया के दर्शन करना चाहता है। भगवान विष्णु ने उसकी इच्छा पूर्ति करते हुए कहा कि वह अंततः उसे देवी माया के दर्शन जरूर प्राप्त होंगे। यह कहकर भगवान विष्णु वापस बैकुंठ चले गए।

साल बीतते गए लेकिन गाधि को अब तक देवी माया के दर्शन नहीं हुए। एक दिन वज्ञ स्नान करने के लिए एक झील के पास गया, अभी उसने झील में प्रवेश किया ही था कि अचानक वह सब कुछ भूल गया। उसके मन में अचानक एक बदलाव सा आया। उसने खुद को अपने ही घर में एक लाश के रूप में पड़ा देखा, उसने देखा कि उसके रिश्तेदार दुखी थे, उसकी पत्नी उसके पैरों पकड़ कर रो रही थी। आगे, उसने देखा कि उसकी लाश को उसके रिश्तेदार श्मशान घाट ले जाते हैं और वहां उसने अपनी ही शरीर का अंतिम संस्कार भी होते हुए देखा। इसके बाद वह देखता है कि उसकी आत्मा शरीर से निकलकर बाहर आ गई और एक चांडाल महिला के गर्भ में प्रवेश कर गई। उसके बाद, उसने देखा कि उस चांडाल महिला ने एक अत्यंत काले रंग के पुत्र को जन्मा है। वह काला पुत्र कोई और नहीं स्वयं गाधि ही है। उसने खुद को इस नए रूप में उसने देखा और आश्चर्यचकित रह गया। धीरे-धीरे वह अत्यंत काले लड़के के रूप में ही बड़ा होने लगा और कुछ समय पश्चात जब वह युवावस्था में पहुंच गया तब उस काले लड़के (अर्थात स्वयं खुद) का विवाह एक अत्यंत सुंदर कन्या से होता है। वह अपनी पत्नी के साथ दांपत्य जीवन का सुख उठा रहा है। उसने यह भी देखा कि वह कुछ बुरे पुत्रों का पिता भी बनता है। इसके बाद उसने अपने पोते पोतियों को बड़ा होते देखा और खुद को अत्यंत बूढ़ा होते हुए भी देखा। दृश्य आगे बढ़ता है और वह देखता है कि कुछ समय पश्चात अचानक उसकी पत्नी और उसके सभी पुत्र उसकी आंखों के सामने मरने लगते हैं। इस कारण वह अपनी जन्मभूमि छोड़कर बिना किसी उद्देश्य के इधर-उधर भटकने लगता है।फिर उसने खुद को एक बड़े नगर में देखा जहां पहुंचकर एक हाथी एक माला लिए उसका इंतजार कर रहा होता है। नगर में पहुंचते ही हाथी ने वह माला उसके गर्दन में डाल दी और नगर के लोग उसे उस देश का राजा घोषित कर देते हैं। वह आगे देखता है कि उस राजा की सभी पत्नियां अब उसकी पत्नियां बन गई और वह उस देश में अच्छी तरह से शासन का कार्य कर रहा है। वहां के लोग उसे “गालव” नाम से पुकारते हैं। उसने खुद को 8 वर्षों तक उस देश पर शासन करते हुए देखा। फिर अचानक से एक दिन वह साधारण कपड़ों में अपने महल से बाहर निकल जाता है। उसने देखा कि वह एक झुग्गी-झोपड़ी के इलाके में जाता है, जहां सभी लोग उसे “पुलकसा – नीच गुलाम” के रूप में पहचानते हैं, और आगे देखता है कि इसी वजह से उसके देश की रानियां और मंत्री उसका अपमान कर रहे हैं और उसे महल से दूर लेकर जा रहे हैं।

वह रोने लगता है और बहुत रोता है, अपनी किस्मत को भी कोसता है और इसी दुख में अग्नि में जाकर कूद जाता है।
अचानक उसी समय उसे होश आ जाता है और उसने खुद को नदी में खड़ा पाया। वह वापस घर आ जाता है। कुछ समय पश्चात एक बहुत दुबला पतला ब्राह्मण उससे मिलने आता है। ब्राह्मण का पूरा जिसका पूरा शरीर जगह-जगह से जला हुआ होता है। जब गाधि ने उससे उसकी इस दयनीय स्थिति का कारण पूछा तो उस अतिथि ने वह पूरी कहानी गाधि को सुना दी, जो उसने नदी में खड़े होकर के देखी थी। गाधि उसके उत्तर से आश्चर्यचकित रह जाता है और महसूस करता है कि उसके साथ जो कुछ भी हुआ, वह देवी माया के संपर्क में आने की वजह से था। इसके बाद वह घर छोड़कर जंगल की ओर प्रस्थान करता है और भगवान विष्णु की तपस्या में लग जाता है। इस समय वह भगवान विष्णु से मुक्ति की प्रार्थना करता है।

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ऋषि नारद और माया देवी की कथा

एक बार भगवान विष्णु ने ऋषि नारद से कहा कि इस दुनिया में कुछ भी वास्तविक नहीं हम जो कुछ भी देखते हैं, वह सब माया देवी के चंचल कृतियों के कारण हैं। ऋषि नारद ने भगवान विष्णु के इस कथन के प्रति असहमति व्यक्ति की और उन्होंने भगवान विष्णु से माया देवी की शक्तियों का अनुभव करने का अनुरोध किया। भगवान विष्णु ने ऋषि नारद की बात का मान रखने के लिए उन्हें अपने साथ एक बहुत घने जंगल में लेकर पहुंचे। वहां एक बहुत बड़ी झील थी। भगवान विष्णु ने ऋषि नारद से उस झील में स्नान करने का अनुरोध किया। ऋषि नारद ने अपनी वीड़ा जिसे वह महथी कहते थे और हिरण की खाल जिस पर वह ध्यान किया करते थे, दोनों को एक स्थान पर रखकर स्नान करने के लिए झील में प्रवेश कर किया। अचानक ऋषि नारद, एक बहुत सुंदर स्त्री के रूप में परिवर्तित हो गए। झील से बाहर आकर उन्होंने अपने आसपास की प्रकृति की सुंदरता का आनंद लेने लगे। उसी समय थलध्वज नामक एक राजा, तट के पास पहुंचा। वह उस स्त्री की सुंदरता पर मोहित हो गया और उनसे शादी का अनुरोध करने लगा। स्त्री ने राजा के इस अनुरोध को मान लिया और दोनों ने विवाह कर लिया।

दोनों के विवाह को 12 वर्ष बीत गए, इन 12 वर्षों में उन्हें एक पुत्र रत्न की प्राप्ति हुई, जिसका नाम उन्होंने वेरवर्मा रखा। इसके पश्चात वह स्त्री प्रत्येक 2 वर्ष में गर्भवती होती रही और संतानें पैदा करती रही। इस तरह 24 वर्षों के भीतर वह 12 बच्चों की मां बन गई। समय के साथ आगे चलकर उसने 8 और बच्चों को जन्म दिया। धीरे-धीरे सभी बच्चे अपनी युवावस्था में पहुंच गए और सभी का विवाह यथोचित कन्याओं के साथ करा दिया गया।धीरे धीरे उन बच्चों के भी बच्चे हुए और स्त्री के बहुत सारे नाती पोते हो गए। उसी समय अचानक शत्रु देश के राजा ने थलध्वज के देश पर आक्रमण कर दिया। इस युद्ध में उसके बहुत सारे बच्चे और नाती पोते मारे गए। थलध्वज भी अपने जीवन की रक्षा करने हेतु वहां से भाग गया। उसने अपने देश को छोड़कर, अपनी पत्नी के साथ उसी स्थान पर, उसी झील में के पास आ पहुंचा, जहां वह स्त्री उसे मिली थी। यहां भगवान विष्णु, ब्राह्मण का रूप धारण किए उनका इंतजार कर रहे थे। भगवान विष्णु ने उनसे कहा कि वे झील में स्नान कर लें। जैसे ही उस स्त्री ने झील में प्रवेश किया, नारद जी को पुनः अपना वास्तविक रूप को प्राप्त हो गया और इसके बाद ऋषि नारद ने एहसास किया कि उनके साथ क्या कुछ घटित हुआ था। भगवान विष्णु ने तब उन्हें बताया कि वह जो कुछ भी उनके साथ घटित हुआ, वह एक भ्रम था, जो वास्तविक लग रहा था परंतु यह सब माया देवी की माया थी।

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