जानिये ‘शैव साधक’ भगवान गोपीनाथ की सिद्धियाँ और शिक्षाएं

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bhagwan gopinath

भगवान गोपीनाथ जी का जन्म भारतवर्ष की बीसवीं शताब्दी के आरंभिक वर्ष में कश्मीर के अंदर हुआ। गोपीनाथ जी को एक बहुत ही रहस्यवादी और उदारवादी संत के रूप में जाना गया। भगवान गोपीनाथ जी इतने महान संत थे कि उनके द्वारा किए गए कार्यों को आज भी मुख्य तौर पर याद किया जाता है। भगवान गोपीनाथ जी को जीवन मुक्त कहा गया है और उनकी आध्यात्मिक स्थिति को शांभवी अवस्था अर्थात भगवान शिव की स्थिति के रूप में वर्णित किया गया है। उनके समय के समकालीन संतो ने उन्हें अघोरेश्वर भी कहा है। इन सब बातों से भगवान गोपीनाथ जी की स्वर्णिम गाथा का पता चलता है। 1945 से 1956 के दौरान उन्हें उनके भक्तों के द्वारा भगवान की उपाधि से सम्मानित किया गया। भगवान गोपीनाथ के बारे में बहुत सी बातें रहस्यमई है इसलिए उनको एक रहस्यमई संत के तौर पर भी जाना जाता है। आज तक इस बात का ज्ञान किसी को भी नहीं है कि भगवान गोपीनाथ के आध्यात्मिक गुरु कौन थे। लेकिन अक्सर वह इस बात के ऊपर टिप्पणी किया करते थे कि कोई भी भगवत गीता को अपना अध्यात्मिक गुरु मानकर जीवन में सच्चा ज्ञान प्राप्त कर सकता है। अपने द्वारा दिए जाने वाले उपदेशों में उन्होंने आत्म विचार को बहुत ही प्रभावी बताया है। उनके अनुसार आत्म विचार की प्रथा के माध्यम से कोई भी साधक आत्मसाक्षात्कार प्राप्त कर सकता है तथा यह आत्म विचार की प्रथा अत्यधिक प्रभावी है। भगवान गोपीनाथ किसी भी व्यक्ति के अध्यात्मिक विकास में वासना और अहंकार को सबसे बड़ी बाधा मानते थे तथा ईमानदारी और सत्यता के गुणों को सबसे बड़ा समर्थक समझते थे। उनके अनुसार कोई भी व्यक्ति ईमानदारी और सत्यता के गुणों को अपनाकर अपना अध्यात्मिक विकास कर सकता है। भगवान गोपीनाथ किसी भी धर्म के बीच कोई अंतर नहीं समझते थे। अपनी जीवन यात्रा के दौरान भिन्न भिन्न समय में उन्होंने कश्मीर के कई तीर्थ स्थलों पर अपना ध्यान योग करने में काफी समय बिताया, क्योंकि उनके अनुसार कश्मीर के ये स्थान आध्यात्मिक रूप से बहुत ही लाभकारी थे। वह अध्यात्मिक साधना करने के लिए इन स्थानों को उत्तम समझते थे और अन्य व्यक्ति जो भी अध्यात्मिक साधना करना चाहते थे उनको भी इन्हीं स्थानों की सलाह देते थे।

भगवान गोपीनाथ का जन्म और परिवार

भगवान गोपीनाथ का जन्म कश्मीर के एक हिंदू परिवार (जो कि भंश में रहता था) में हुआ। ‘भंश’ कश्मीर के श्रीनगर में स्थित भान मोहल्ले के अंदर स्थित एक छोटी सी जगह है। भगवान गोपीनाथ का जन्म 3 जुलाई 1898 के दिन हुआ था, जो कि हिंदू कैलेंडर के अनुसार आषाढ़ महीने की शुक्ल पक्ष की द्वादशी के दिन होता है। भगवान गोपीनाथ के दादा, जिनका नाम था पंडित लक्ष्मण जुबान था, कश्मीर की तत्कालीन रियासत डोगरा के शासन में राजस्व विभाग के एक वजीर हुआ करते थे। भगवान गोपीनाथ के पिता, जिनका नाम था पंडित नारायण जुमान, कश्मीरी ऊन के एक व्यापारी थे और अपना सारा व्यापार कश्मीर के अंदर किया करते थे।

भगवान गोपीनाथ के पिता ने अपना अधिकांश समय अध्यात्मिक खोज में लगाया। भगवान गोपीनाथ के पिता ने अपनी सारी पैतृक विरासत अपनी सौतेली मां को दान कर दी थी और उनके द्वारा किए गए इस कार्य के कारण उन्हें काफी पहचान मिली थी। भगवान गोपीनाथ की वास्तविक मां का नाम था हरलाल। वह पंडित प्रसाद जू परिमू की सुपुत्री थी तथा पंडित प्रसाद जू उनके इलाके के एक अध्यात्मिक गुरु के आरंभिक शिष्य थे। उनके साथी तथा उनके भाई उन्हें जाड़ा भरत कहकर पुकारा करते थे। योग वशिष्ठ जैसे हिंदू धर्म ग्रंथों को उनके घर पर होने वाले धार्मिक समारोह में नियमित रूप से पढ़ाया जाता था तथा उनके ऊपर चर्चा की जाती थी। पंडित प्रसाद जू ने अपनी छोटी बेटी (जिनका नाम था जापर डेड) को अध्यात्म की ओर अग्रसर किया और उन्हें जप योग की शिक्षा दी। अपने जीवन काल के पचासवें दशक के दौरान पंडित प्रसाद जू की छोटी बेटी को एक संत के रूप में पहचान प्राप्त हुई। एक समय पर जब पंडित प्रसाद जू कश्मीर की माता खीर भवानी की समाधि पर ध्यान लगाकर बैठे थे तो उन्हें एक देवता के दर्शन हुए थे जिन्होंने उनके परिवार में उनकी बेटी के रूप में जन्म लेने की इच्छा व्यक्त की और इसके तुरंत बाद हरलाल का जन्म हुआ जिनके विवाह के उपरांत भगवान गोपीनाथ को जन्म दिया।

भगवान गोपीनाथ के दो भाई और दो बहने थीं। उनके सबसे बड़े भाई जिनका नाम था पंडित गोविंद जू मान था, वह अपने पूरे जीवन भर एक बाल ब्रह्मचारी के तौर पर रहे। पंडित गोपीनाथ के छोटे भाई जिनका नाम था जियालाल काक। उन्होंने विवाह कर लिया था, परंतु विवाह के उपरांत भी वह गृहस्थ जीवन में बिल्कुल भी शामिल ना हो सके और उन्होंने अपना अधिकांश समय धार्मिक कार्यों को करते हुए बिताया। भगवान गोपीनाथ की बहने उनके पतियों की आकस्मिक मृत्यु के उपरांत विधवा हो गई थी। भगवान गोपीनाथ की बड़ी बहन का नाम था श्रीमती देवा माली – उनकी दो पुत्रियां थी। भगवान गोपीनाथ की छोटी बहन का नाम था श्रीमती जानकी देवी – उनके दो पुत्र तथा दो पुत्रियां थी। भगवान गोपीनाथ की देखभाल उनकी बड़ी बहन तथा उनकी दोनों पुत्रियों ने की। भगवान गोपीनाथ की बड़ी बहन की दोनों पुत्रियों का नाम था श्रीमती कमला जी और श्रीमती चंदा जी। इन दोनों ने अपने पूरे प्रेम भाव के साथ भगवान गोपीनाथ की देखभाल की।

भगवान गोपीनाथ के जीवन के प्रारंभिक वर्ष

अपनी सौतेली मां को अपनी सारी पैतृक संपत्ति एवं पैतृक घर सौपने के बाद पंडित नारायण जू भान ने युवा गोपीनाथ (जो उस समय तकरीबन 10 वर्ष की आयु के थे) के साथ अपना घर भी छोड़ दिया और इधर-उधर विभिन्न स्थानों पर किराए के आवास में रहने लगे। इनकी मां की मृत्यु जब हुई तो यह मात्र 12 वर्ष के थे और पिता की मृत्यु के समय वह 30 वर्ष के आयु के थे। हालांकि 1909 से लेकर इनके अंतिम दिनों तक अर्थात 1968 तक इनके परिवार ने अपना निवास स्थान लगभग 11 बार बदला और हर स्थानों पर रहने की अवधि एक डेढ़ साल से लेकर 11 साल तक रही। एक स्थानीय क्रिश्चियन मिशनरी विद्यालय से जिसका नाम टायंडेल बिस्को स्कूल था, इन्होंने अपनी माध्यमिक शिक्षा तक की शिक्षा को ग्रहण किया, यह विद्यालय श्रीनगर के फतेह कदल इलाके में स्थित था। यहां से इन्होंने संस्कृत, फारसी, उर्दू और शारदा तथा देवनगरी जैसी भाषाएं और लिपियां सीखीं। इनके कुछ भक्तों का यह भी कहना है कि उन्होंने कई बार इन्हें अंग्रेजी बोलते भी सुना था।

भगवान् गोपीनाथ के विभिन्न रोजगार

भगवान गोपीनाथ को जीवन में कभी भी किसी रोजगार को करने में कोई रुचि ना थी। अपने जीवन के शुरुआती वर्षों में उन्होंने किसी भी रूप के रोजगार को अपनाने में कोई रुचि व्यक्त नहीं की। हालांकि उनके परिवार की वित्तीय परिस्थितियों को देखते हुए उनके परिवार की तरफ से उन पर यह दबाव सदैव पड़ता रहा कि उन्हें किसी तरह का रोजगार करना चाहिए, जिससे कि परिवार की आर्थिक स्थिति में कुछ सुधार हो सके। परिवार के इसी दबाव के कारण 1912 में उन्होंने थोड़े समय के लिए अपने मामा के कश्मीरी ऊन (जिसे स्थानीय भाषा में पशमीना कहा जाता था) के कारोबार में उनकी सहायता करने का निर्णय लिया। जिसके पश्चात 3 साल की अवधि के लिए उन्होंने विश्वनाथ प्रिंटिंग प्रेस में एक कंपोजिटर के रूप में कार्य किया। तत्पश्चात उन्होंने सेकीदाफ़र नामक स्थान पर एक किराने की दुकान पर काम करना शुरू किया। 1920 के दौरान कुछ समय के लिए भगवान गोपीनाथ श्रीनगर के चायायडोब नामक एक स्थानीय इलाके में चले गए और वहां पर किराने की दुकान का कार्य करते रहे। अपनी आध्यात्मिक गतिविधियों की शुरुआत करने से पहले 1925 तक उन्होंने किराने की दुकान पर कार्य किया।

भगवान गोपीनाथ का आध्यात्मिक झुकाव

  • अपनी युवावस्था के सालों में उन्होंने स्थानीय संतो द्वारा रचित भवानी सहस्त्रनाम, इंद्रकाशी स्त्रोतम, पंचास्तवी, विष्णु सहस्त्रनाम, शिव महिमा स्त्रोतम, शिवस्तंभावली, गुरु गीता और वाक्य (काव्य दोहों) जैसे पवित्र हिंदू भजनों को हृदय से कंठस्थ कर लिया था।
  • उनके मन में भगवत गीता को लेकर कुछ ज्यादा ही रुचि थी, जिसके कारण उन्होंने इस पुस्तक की एक प्रति अपने पास रख ली थी जिसे उन्होंने अपने अंतिम समय तक ध्यान के लिए अपने साथ रखा।
  • इन सभी ग्रंथों को उन्होंने अपनी युवावस्था में ही याद कर लिया था ऐसा कहा जाता है।
  • युवा अवस्था के दौरान भगवान गोपीनाथ अपने मामा पंडित भगवान दास परिमू के साथ, जो शारिका भगवती के महान भक्त थे (हरी पर्वत की देवी का नाम), पोखरीबाल नामक स्थान में होने वाली वार्षिक और द्विवार्षिक यात्राओं के दौरान जाया करते थे। कम उम्र में ही युवा पुरुषों के नेता के समूह के नेता के रूप में वे कई बार वहां आसपास की स्थानीय मंदिरों की यात्राएं भी आयोजित करते थे जिसमें खीर भवानी मटन महादेव और विचित्र नाक जैसे स्थानीय मंदिर प्रमुख थे।
  • अपनी युवावस्था के दिनों से ही उन्होंने स्थानीय इलाके संतो जैसे कि हब्बाकडल के स्वामी जनकक़ तुफ़ची और सेकीदा इलाके के स्वामी बालाक काव जिन्हें जटाधारी साधु के नाम से भी जाना जाता था, के सानिध्य में जाने के लिए अधिकतर उनसे मिलते-जुलते थे। भगवान गोपीनाथ को कई बार स्वामी बालाक काव के पैरों को दबाते हुए भी देखा गया था।
  • एक अन्य संत जिनका नाम स्वामी जीवन साहिब था, उनसे भी वह नियमित तौर पर मिलने जाया करते थे।
  • वह कश्मीर में स्थित बोधगेरे इलाके के स्वामी नारायण जू भान से भी वह मुलाकात करने के लिए नियमित तौर पर जाते थे। इन संतो के द्वारा समय-समय पर आयोजित होने वाली सभाओं में जो विशेष तौर पर आध्यात्मिक और दार्शनिक विषय पर चर्चा करते थे जो वेदांत योग सूत्र, पतंजलि के योग सूत्रों और कश्मीर के शैव धर्म पर आधारित होती थी, में भाग लिया करते थे।
  • अपनी रोजगार के दिनों में, भी जब वह किराने की दुकान पर कार्य किया करते थे, तो कई बार दुकान में कैश काउंटर संभालते समय वह अक्सर ध्यान में तल्लीन हो जाया करते थे और कभी-कभी तो वह इसी तरह ध्यान में रहते हुए पूरी रात दुकान में बिता देते थे।
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भगवान गोपीनाथ के आध्यात्मिक गुरु

इस बात को कोई भी निश्चित रूप से नहीं जानता कि भगवान गोपीनाथ के आध्यात्मिक गुरु कौन थे। उनके कुछ रिश्तेदारों का मानना था कि उन्होंने आध्यात्मिक ज्ञान की शिक्षा अपने स्वयं के पिता से प्राप्त की। उनकी छोटी बहन जानकी देवी का कहना था कि स्वामी बालक काव उनके आध्यात्मिक गुरु थे। हालांकि भगवान गोपीनाथ की मृत्यु से कुछ साल पूर्व जब एक भक्त ने उनसे पूछा कि उनके आध्यात्मिक गुरु कौन थे, तो भगवान गोपीनाथ ने इसके उत्तर में भगवद्गीता की ओर संकेत करते हुए कहा कि इन सात सौ श्लोकों में से किसी को भी आध्यात्मिक गुरु माना जा सकता है। एस एन फोतेदार (भगवान गोपीनाथ की जीवनी के प्रमुख लेखकों में से एक) उनसे दो दशकों से अधिक समय के लिए जुड़े हुए थे परंतु इस संबंध में उनके विचार भी पूरी तरह से स्पष्ट नहीं थे। अंत में उन्होंने यही कहा कि स्वामी जनकक़ तुफची ही (उनके अनुसार) उनके आध्यात्मिक गुरु थे। हालांकि बाद में स्वामी आफताब जू वांगू के छोटे भाई पंडित बालजी वांगू ने एस एन फोतेदार की कही बात पर ही हामी भरी कि उनके (भगवान गोपीनाथ के) आध्यात्मिक गुरु स्वामी जनकक़ तुफची ही थे। हालांकि एस एन फोतेदार बात से स्वयं सहमत हो गए थे परंतु फिर भी इस तथ्य को भगवान गोपीनाथ के भक्तों के बीच में निर्णायक रूप से स्वीकृति दिलाने में सक्षम ना हो सके। भगवान गोपीनाथ द्वारा भगवद्गीता के ऊपर कहीं गई टिप्पणियों के अनुसार उनके ज्यादातर भक्तों का जिनमें से की कुछ धार्मिक लेखक भी शामिल थे, वह यही मानते थे कि उन्होंने (भगवान गोपीनाथ ने) स्वयं को ही दीक्षा दी।

इस प्रकार की कुछ खबरें इतिहास से मिलती है कि एक बार जब स्वामी विवेकानंद 1898 के दौरान कश्मीर की यात्रा पर गए हुए थे तो उसी समय भगवान गोपीनाथ का जन्म हुआ था और उन्होंने भंश के इस परिवार से मुलाकात की थी। जबकि कुछ खबरों के अनुसार स्वामी विवेकानंद भगवान गोपीनाथ के घर से कुछ दूर पहले ही एक दर्जी की दुकान पर रुक गए थे और उन्होंने भगवान गोपीनाथ के घर में प्रवेश लेने की बजाय उस दर्जी की दुकान पर रुक कर अमेरिका के झंडे को सिलवाया था ताकि वह उस झंडे को अगले दिन 4 जुलाई की सुबह फराह सके और यह सब लगभग उसी समय की बात है जब उन्होंने अपनी द फोर्ट ऑफ जुलाई नामक कविता को लिखा।

भगवान गोपीनाथ का आध्यात्मिक अभ्यास

हालांकि भगवान गोपीनाथ के परिवार ने उन्हें विवाह करके सांसारिक जीवन व्यतीत करने की सलाह दी और उन पर दबाव भी डाला। परंतु भगवान गोपीनाथ ने स्वयं के लिए ब्रह्मचर्य जीवन जीने का मार्ग पहले ही चुन लिया था और वह उसी पर अडिग रहे तथा अपनी आध्यात्मिक साधना करते हुए उन्होंने कश्मीर में स्थित श्रीनगर के विभिन्न इलाकों का विचरण किया। भगवान गोपीनाथ की आध्यात्मिक कार्यकाल को नीचे दिए गए तीन चरणों में विभाजित किया जा सकता है।

आध्यात्मिक अभ्यास का प्रारंभिक चरण (1908 – 1930)

बहुत छोटी आयु से ही भगवान गोपीनाथ अपना अधिकांश समय धार्मिक समारोहों में बिताया करते थे। उन्हें धार्मिक गीत गाने वाले गायकों (भजन मंडली) के साथ ईश्वर के गीत गाने में (विशेषकर खीर भवानी और हरि परबत मंदिर के देवताओं की महिमा का गुणगान करने में) अधिक रूचि थी। वे आध्यात्मिक विषयों पर चर्चा करने वाले धार्मिक नाटक (रास- लीला) और धार्मिक पुरुषों की सभाओं (सत्संग) में, जहां अध्यात्म से जुड़े विषयों पर चर्चा की जाती है, बढ़ चढ़कर हिस्सा लिया करते थे। उनके द्वारा रचित हस्तलिपि के कुछ अवशेषों और भजनों के आधार पर यह कहा जा सकता है कि उन्होंने स्वयं को महा गणेश, हिंदू मां देवी, भगवान नारायण, भगवान शिव तथा अपने आध्यात्मिक गुरु के प्रति पूरी तरह से समर्पित कर रखा था। उनके भक्तों का मानना था कि उन्होंने अध्यात्म के इस रूप का अभ्यास जिसे “सनातन पंचांग उपासना” अथवा “पंचायतन पूजा” भी कहा जाता है, को अपनी आध्यात्मिक जीवन के शुरुआत में करना शुरू कर दिया था। जिसके अनुसार चार देवी, देवताओं और एक आध्यात्मिक गुरु की पूजा की जाती है। 22 वर्ष की अल्पायु से ही उन्होंने श्रीनगर में स्थित हरि परबत मंदिर की परिक्रमा करना शुरू किया और इसे अपनी दैनिक दिनचर्या की एक प्रथा बना ली। उन्हें कई बार मंदिर के आंगन में पाइप (जिसे स्थानीय भाषा में चिल्लम भी कहा जाता है) से धूम्रपान करते हुए लंबे समय तक उसी मुद्रा में ध्यान करते हुए भी देखा गया। ऐसा भी कहा जाता है 25 वर्ष की आयु में हरि परबत की देवी माता श्री भवानी ने भगवान गोपीनाथ को अपने तो दर्शन दिए। इसके बाद धीरे-धीरे लोगों के बीच में विश्वास फैल गया कि भगवान के दैहिक रूप के ऊपर ध्यान दिए बिना भी भगवान का ध्यान करना किया जा सकता है, इसे हिंदू धर्म में निर्गुण उपासना का नाम दिया गया।

आध्यात्मिक अभ्यास का मध्यवर्ती चरण (1931 – 1937)

अपनी आध्यात्मिक यात्रा के इस चरण में उन्होंने नियंत्रण की चरम सीमा तक स्वयं को पहुंचा दिया। उन्होंने आत्म त्याग का अभ्यास किया जिसमें वे महीनों तक व्रत रहा करते थे। जिसमें कभी-कभी वह दिन में सिर्फ एक कप चाय पीते और कभी भारी मात्रा में भोजन खा लेते। इस समय के दौरान उन्होंने खुद को एक अंधेरे कमरे में सिर्फ छोटे से दीपक की रोशनी के उजाले में रखा यह दिया। यह दीपक पूरे समय के लिए जलता था। भगवान गोपीनाथ को कई बार दीवार की तरफ मुंह करके बिस्तर पर लेटे हुए पाया गया। आध्यात्मिक यात्रा के इस चरण के दौरान उन्होंने बहुत सारे लोगों से मिलना जुलना बंद कर दिया था और बहुत कम ही लोगों को उनके कक्ष में आने की अनुमति थी। उनका पूरा कमरा और उनके बिस्तर पूरी तरह से धूल मिट्टी से घिरे रहते और चारों तरफ मकड़ियों के जाले बने होते थे। परंतु वे ना तो स्वयं उन्हें साफ करते ना ही किसी और को करने देते। इतना ही नहीं, वह इन सब से जरा भी विचलित तक नहीं होते थे। एक बार एक चूहे ने उनकी एड़ी में काट लिया था, परंतु भगवान गोपीनाथ को जरा भी दर्द का एहसास नहीं था वह तो अपनी ही धुन में थे। कई बार उन्हें खून की उल्टियां भी होती थी। अफीम के सेवन के कारण उनका पूरा शरीर सूज कर कमजोर हो गया था। एक बार ऐसे समय में उनकी बहन ने उन्हें उन वित्तीय कठिनाइयों की याद दिलाई जिनसे उस समय उनका परिवार जूझ रहा था। अपनी बहन की बातों को सुनकर उन्होंने कहा “हमारी नाव अभी समुद्र के बीच में है अब या तो हम डूब जाएंगे और या किनारे सुरक्षित पहुंच जाएंगे।” कुछ धार्मिक लेखकों को लगता है कि उन्होंने इस दौरान तांत्रिक साधना के अंतर्गत प्राणभास की कला का अभ्यास भी किया होगा। उनकी इस कठिन आध्यात्मिक साधना के सात वर्षों के बाद उनके भक्त इस बात की पुष्टि करते हैं कि वे हिंदू धर्म के अनुसार सिद्ध पुरुष बन चुके थे ( सिद्ध पुरुष का होता है जिसके पास असीम आध्यात्मिक शक्तियां होती हैं, जो सांसारिक समस्याओं को हल करने में सक्षम होता है)। भगवान गोपीनाथ भी अपनी 7 वर्षों की आध्यात्मिक साधना के पश्चात लोगों की सांसारिक समस्याओं को हल करने में सक्षम हो गए थे। लोग उनके चारों तरफ झुंड बनाकर आ जाते और उनसे अपनी समस्याओं के हल मांगते थे।

आध्यात्मिक अभ्यास का अंतिम चरण (1938 – 1968)

इस चरण के दौरान, भगवान गोपीनाथ ने कश्मीर के शैव धर्म के अनुसार 36 तत्वों में से ध्यान की कुछ तकनीकों का अभ्यास करके उनको साधना अर्थात नियंत्रित करना सीख लिया जिसमें की आग और पानी जैसे तत्व मुख्य थे। उन्होंने अपने फायर पॉट (जिसे स्थानीय भाषा में कंगार कहा जाता है ) के माध्यम से चारकोल द्वारा हवा को कई घंटों के लिए आग के साथ बहाना सीख लिया उन्होंने अदृश्य लोगों से बात करना भी सीख लिया, जो सामान्य लोगों को दिखाई नहीं देते थे। उनसे बात करने के दौरान वह उनके निर्देशनों का भी पालन करते नजर आए, कभी-कभी तो उनके शरीर के विभिन्न हिस्से जैसे उनके कंधे और घुटने थरथराने भी लगते थे। आध्यात्मिक यात्रा के दौरान औपचारिक रूप से उनका पहला शिष्य, एक सिख था, जो दूसरे प्रांत से उनको देखने के लिए आया और 3 महीने तक उनके घर में उनके साथ रहा, और उन से प्रभावित होकर उनका पहला शिष्य बना। इस समय के दौरान भगवान गोपीनाथ के द्वारा किए गए अन्य कई चमत्कारों को दर्ज किया गया। इस दौरान लोग उनके पास अपनी सांसारिक समस्याओं के समाधान की मांग करते हुए आते थे और भगवान गोपीनाथ उनकी समस्याओं का समाधान करते हुए नजर आते। 1946-56 के बीच की अवधि वह समय था जब भगवान गोपीनाथ को उनके कुछ भक्तों ने भगवान कहना कह कर संबोधित करना शुरू कर दिया था इस समय के दौरान भगवान गोपीनाथ नियमित तौर पर माता शारिका भगवती और माता रागन्य भवानी के मंदिर में जाकर माता के दर्शन करते थे। सन् 1957 में कुछ समय बाद, प्रत्येक रविवार की दोपहर को उनके स्थान पर स्थानीय जाने-माने संगीतकारों के द्वारा भारतीय शास्त्रीय संगीत एवं स्थानीय संगीत के कार्यक्रमों का आयोजन किया जाता था। उनकी साधना के प्रारंभिक और अंतिम चरण के दौरान उनके द्वारा भ्रमण किए गए कुछ अन्य मंदिरों में निम्नलिखित मंदिर भी शामिल थे; खरे का ज्वाला जी मंदिर, हंदवाड़ा का भद्रकाली मंदिर, श्रीनगर का ज्येष्ठ भगवती मंदिर, निशांत बाग के पास स्थित गुप्त गंगा मंदिर, श्रीनगर और अमरनाथ में स्थित तुषार राजा भैरव का मंदिर।

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भगवान गोपीनाथ की साधना और शिक्षाएं

भगवान गोपीनाथ अंतर्मुखी होने के कारण, ज्यादा बोलते नहीं थे। यदि उनके व्यवहार की बात करें तो वह सीधे साधे शब्दों में सीधी बात करते थे। उन्हें हमेशा प्रचार से दूर रहने वाले और खुद को गुमनामी में रखने के लिए जाना जाता है। भगवान गोपीनाथ अपने आप में रहने वाले व्यक्ति थे। ऐसा व्यापक रूप से माना जाता है कि उन्होंने कश्मीर शैव (जिसमें देवी भैरवी, अघोरेश्वरी भगवान से ऊपर विराजमान हैं और भैरव भगवान की मुख्य रूप से पूजा की जाती है) के तांत्रिक सिद्धांत ‘अद्वैत’ के नियमों का पालन किया। उनके द्वारा लिखे गए विभिन्न भजनों से यह स्पष्ट होता है कि उनका भक्ति परंपरा के प्रति भी झुकाव था, जो कि भारतीय शास्त्रीय संगीत के प्रति उनके लगाव की तरफ इशारा करता है। गुरु नानक देव तथा राम कृष्ण की तस्वीरें उनके कमरे की दीवारों को सुशोभित करती थीं।

एक बार अपने भक्तों के बीच भगवान के विभिन्न आध्यात्मिक विषयों के अंतर्संबंध की व्याख्या करते हुए उन्होंने कहा कि “ब्रह्मा (एक ऐसे भगवान जिनका कोई रूप नहीं है) के विषय में सोचो कि वह एक पेड़ के समान हैं और यदि कोई उस पेड़ की छाया के लिए उसकी किसी भी शाखा के नीचे बैठे, (यहां शाखा से तात्पर्य विभिन्न आध्यात्मिक विषयों से है) तो भी उसका लक्ष्य एक ही होता है और वह उसे अंततः प्राप्त कर ही लेता है।” उन्होंने एक बार टिप्पणी की, कि “ओंकार (हिंदू प्रतीक) वास्तव में भगवान के सिर के समान हैं, जिसके बिना कुछ भी संभव नहीं है।” एक बार, अमरनाथ मंदिर के दर्शन करते हुए, उन्होंने कहा कि टिप्पणी की कि “शिव हर जगह नृत्य कर रहे हैं” और इतना कहने के बाद उनके भक्तों का कहना है कि भगवान गोपीनाथ पूरे दिन आनंदमय रहे। कभी-कभी वह यज्ञ के पात्रों में यज्ञ करते और आग की लपटों को भगवान नारायण के पैर कहकर संबोधित किया करते थे। वह स्वयं अपने पैरों को “लकड़ी का कुंदा” कह कर संबोधित करते थे तथा स्वयं के शरीर को वह मृत्यु के देवता (महाकाल) का भोजन कहा करते थे। इतना ही नहीं वह मानव के शरीर को भी मानव के अस्तित्व से जोड़कर नहीं देखते थे। उन्होंने कभी भी किसी को अपने परिवार को छोड़ने या आत्म साक्षात्कार की तलाश में अपना परिवार छोड़ देने की सलाह नहीं दी। उन्होंने लोगों को निर्देशित किया कि वह ब्रह्मचर्य का पालन करें।

भगवान गोपीनाथ के बारे में अन्य संतों के विचार

दिसंबर 1973 में, पुट्टपर्थी में भगवान गोपीनाथ के भक्तों में से एक से मिलने के पश्चात सत्य साईं बाबा ने भगवान गोपीनाथ के विषय में कहा था कि “भगवान गोपीनाथ वास्तव में सबसे महान कश्मीरी संत थे, जिन्हें वास्तविक अर्थों में जीवन मुक्त कहा जा सकता है। हालांकि इस बात के कोई साक्ष्य नहीं मिले कि सत्य साईं बाबा की मुलाकात कभी भगवान गोपीनाथ से उनके जीवन में हुई भी थी या नहीं‌। स्वामी काश काक जो कश्मीर के समकालीन संत थे वह कहते हैं कि भगवान गोपीनाथ, कश्मीर में स्थित हरि परबत मंदिर की देवी, माता शारिका भगवती की विशेष कृपा प्राप्त करने वालों में से एक थे। ‌भगवान गोपीनाथ का माता शारिका भगवती के प्रति विशेष लगाव था और स्वामी नंद बाबा, जो उस समय के समकालीन संतों में एक थे उनका मानना था कि कश्मीर के संतों में भगवान गोपीनाथ का स्थान सर्वोच्च है। भगवान राम जी जिन्होंने वाराणसी में क्रेम कुंड से अघोर योग का ज्ञान प्राप्त किया था, उन्होंने भगवान गोपीनाथ को अघोरेश्वर के रूप में वर्णित किया है।

भगवान गोपीनाथ द्वारा किये गए कुछ चमत्कार

1938 के आसपास से, भगवान गोपीनाथ के कुछ भक्तों ने उनके द्वारा होने वाले विभिन्न चमत्कारों को रिकॉर्ड करना प्रारंभ कर दिया था इन चमत्कारों में विशेष रूप से असाध्य रोगों के इलाज करना, निसंतान दंपत्ति को बच्चों का आशीर्वाद देना, कई बार तो मृत शरीर उनके सामने लाया जाता था और उसे जीवित करने की मांग भी की जाती थी, एक ही समय में दो स्थानों पर होना, किसी के दिमाग को मस्तिष्क में क्या चल रहा है यह उसके बिना बोले बता देना, लोगों की मदद करने के लिए खीर भवानी और हरि पर्बत जैसे स्थानीय तीर्थों के देवता को मानव रूप में अवतरित कर देना इत्यादि। उनके भक्तों ने उनकी मृत्यु के बाद भी उनके द्वारा किए जाने वाले चमत्कार की सूचना दी। 3 जुलाई 1999 द ग्रेनेडियर्स रेजीमेंट की अट्ठारहवीं बटालियन का एक अधिकारी भारतीय सेना की रेजिमेंट ने कथित तौर पर कारगिल युद्ध के दौरान लड़ाई के मोर्चे पर उसे देखा, टाइगर हिल्स को वापस लेने के लिए हमले के संचालन का निर्देश दिया। इसी तरह का एक दृश्य भारतीय सेना के अधिकारी ने 1947 के युद्ध के दौरान भी देखा था जो अपने आप में एक चमत्कार था।

भगवान गोपीनाथ का देह त्याग

मरने से कुछ साल पहले उन्हें अक्सर यह कहते हुए सुना जाता था कि वह बूढ़े हो गए हैं और वह ऐसा कह कर अपने अंतिम दिन के पास आने के विषय में अपने भक्तों के लिए संकेत छोड़ रहे थे। 28 मई 1968 की सुबह अपनी दिनचर्या के रूप में उन्होंने अपना चेहरा धोया, अपनी पगड़ी बाँधी और अपने माथे को भगवा निशान ( हिंदू धर्म में इसे तिलक कहा जाता है) से सजाया । उस पूरे दिन, कई लोग उनसे मिलने आए थे। दोपहर के बाद, कुछ साधु (भटकते भिक्षु) भी उनसे मिलने आए थे। वह इन आने वाले साधुओं को भिक्षा देते थे तथा उनके पास जो भी पैसे थे वह देकर उन्हें विदा किया। उसके बाद उन्हें लगभग साढ़े पांच बजे तक ध्यान (हिंदू धर्म में समाधि कहा जाता है ) में चले गए कुछ समय पश्चात उन्होंने पीने के लिए पानी मांगा और साथ में ही उन्होंने कहा कि कुछ मीठा पानी भी दे दें। लगभग 5:45 बजे उनका निधन हो गया और उनके अंतिम शब्द ओम नमः शिवाय ( भगवान शिव का मंत्र ) थे। उनकी मृत्यु पर, स्वामी नंद लाल ने बताया कि जिस दिन भगवान गोपीनाथ ने इस देह का त्याग किया था उसी दिन कश्मीर में भूकंप आया था। भगवान गोपीनाथ ने स्वयं भी 1 हफ्ते पूर्व अपनी मृत्यु की भविष्यवाणी भी कर दी थी।

भगवान गोपीनाथ की मुख्य शिक्षाएं

भगवान गोपीनाथ कश्मीर शैव सिद्धांत (त्रिका शास्त्र) के अनुयायी थे और उन्होंने कभी औपचारिक तरीके से शिक्षा नहीं दी। हालाँकि, वह समय-समय पर, भक्तों के सवालों के जवाब में या उनके बीच में रहते हुए स्वयं कुछ ज्ञान की बातें कह दिया करते थे। चूंकि भगवान गोपीनाथ एक अंतर्मुखी व्यक्तित्व के स्वामी थे। अतः उन्हें ज्यादा बोलने की आदत ना थी और वह छोटे वाक्यों का उपयोग करके अपने द्वारा कहे गए प्रासंगिक अर्थ को समझाते थे। उनके कुछ ऐसे कथन, जिनका यहाँ अनुवाद अंग्रेजी द्वारा किया गया है, जिन्हें उनके भक्तों ने उनके उपदेशों के रूप में प्राथमिकता दी है, वह इस प्रकार हैं:

  • किसी भी व्यक्ति को धार्मिक नैतिक आचरण द्वारा विचार, वचन और कर्म में सीधेपन, ईमानदारी और पवित्रता जैसे तीन गुणों का उत्पादन और संरक्षण करना चाहिए।
  • आत्म बोध तब होता है जब एक व्यक्ति स्वयं के अंदर से अहंकार को पूरी तरह से नष्ट कर देता है।
  • ‘वासना’ वास्तव में आध्यात्मिक विकास की राह में सबसे बड़ी बाधा होती है।
  • बौद्धिक चिंतन और आत्म ज्ञान की मदद से कोई भी व्यक्ति ईश्वर के सभी पहलुओं को महसूस कर सकता है।
  • आध्यात्मिक साधकों को उस पथ पर जाने से डरना नहीं चाहिए जो आत्म-साक्षात्कार की कठिनाइयों से भरा हुआ होता है।
  • धर्म, जाति या पंथ के संकीर्ण विभाजन से ऊपर उठकर सभी मानवता के साथ शांति स्थापित करना प्रत्येक मनुष्य का कर्तव्य होना चाहिए।
  • भगवद्गीता के किसी भी श्लोक को लोग आध्यात्मिक गुरु मान सकते हैं।
  • सच्चे आध्यात्मिक प्रयास और गुरु की कृपा से ही साधक को आत्म-साक्षात्कार होता है।
  • एक साधक को अपने ह्रदय और आत्मा के साथ गुरु के चरणों में समर्पण करना चाहिए।
  • यदि लालच जैसी बुरी आदत से दूर रहना है तो दान देने की आदत को अपने अंदर जन्म लेने देना चाहिए, क्योंकि दान ही लालच को खत्म कर सकता है।

भगवान गोपीनाथ का भारत में सार्वजनिक सम्मान

  • भारतीय डाक सेवा ने 3 जुलाई 1998 को अपनी 100 वीं जयंती के अवसर पर भगवान गोपीनाथजी के नाम पर एक डाक टिकट जारी किया जिसका शीर्षक “भगवान गोपीनाथ जी” था। इसे 21 जुलाई 2011 को मूल रूप से संग्रहित किया गया।
  • दूरदर्शन ने वर्ष 1996 में भगवान गोपीनाथ के जीवन चरित्र पर एक वृत्त चित्र बनाया।
  • भगवान गोपीनाथ हेरिटेज हॉल का उद्घाटन जम्मू में 21 नवंबर 2010 को हेरिटेज हॉल का उद्घाटन भगवान गोपीनाथ आश्रम में किया गया।
  • दिल्ली के मुख्यमंत्री ने 26 दिसंबर 2007 को भगवान गोपीनाथ की जीवनी “भगवान गोपीनाथ की जीवनी” नामक शीर्षक से प्रसारित की।

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