जानिए बॉलीवुड के सुनहरे सितारे गुरुदत्त के जीवन की अनोखी बातें

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गुरुदत्त को भारतीय सिनेमा इतिहास में ना सिर्फ एक महान कलाकार अपितु बेहतरीन फिल्म निर्देशक और निर्माता के रूप में जाना जाता है। उन्होंने 1950 और 1960 के दशक में इन्होंने बहुत क्लासिकल फिल्में बनाई। जिनमें प्यासा, कागज के फूल, साहब बीवी और गुलाम तथा चौदहवीं का चांद जैसी मशहूर फिल्म में मुख्य रूप से बहुत हिट साबित हुई थी। प्यासा और कागज के फूल अपने समय की बहुत अधिक कामयाब फिल्मों में से एक बनी। प्यासा को तो टाइम मैगजीन ने “ऑल टाइम”, 100 बेस्ट मूवी अर्थात सौ सबसे बेहतरीन फिल्मों, में शामिल किया था। 2010 के समय में गुरुदत्त को सीएनएन द्वारा “एशिया के 25 सर्व कालीन लोकप्रिय अभिनेता में से एक चुना गया। जो अपने आप में बहुत गर्व की बात थी।

Table Of Contents
  1. आरंभिक जीवन एवं पृष्ठभूमि
  2. कैरियर जीवन के प्रारंभिक वर्ष में अंग्रेजी लेखन से फिल्मी जगत में कैरियर की शुरुआत
  3. कोरियोग्राफर अभिनेता और सहायक निर्देशक के रूप में गुरुदत्त द्वारा किए गए कार्य
  4. देव आनंद द्वारा गुरुदत्त को अपनी कंपनी ‘नवकेतन कंपनी’ के अंदर निर्देशक के रूप में नौकरी करने का प्रस्ताव देना
  5. गुरुदत्त और देव आनंद के बीच रचनात्मक विरोधाभास की शुरुआत
  6. निर्देशक के रूप में गुरुदत्त के कार्य
  7. आखरी समय के कार्य
  8. प्रेम विवाह के बावजूद गुरुदत्त की शादीशुदा जिंदगी थी पूरी तरह से बर्बाद
  9. इससे पहले भी दो बार आत्महत्या का विफल प्रयास कर चुके थे गुरुदत्त
  10. गुरुदत्त के दो महत्वपूर्ण अधूरे प्रोजेक्ट, जिनमें से एक कभी पूरा ही नहीं हुआ
  11. गुरुदत्त द्वारा अपने काम के प्रति समर्पण
  12. गुरुदत्त के प्रति समर्पित की गई श्रद्धांजलि

आरंभिक जीवन एवं पृष्ठभूमि

गुरुदत्त का जन्म भारत के कर्नाटक राज्य के पादुकोण में जो आज के समय में चित्रापुर नाम से जाना जाता है, के सारस्वत ब्राह्मण परिवार में हुआ था। वसंत कुमार शिवशंकर पादुकोण, यह बॉलीवुड के महान कलाकार गुरुदत्त का वास्तविक नाम था। लेकिन बचपन में हुई एक दुर्घटना के कारण उनका यह मूल नाम बदल दिया गया और उन्हें गुरुदत्त के नए नाम से उनका पुनः नामकरण किया गया। यह नाम उनके लिए शुभ है, ऐसा उनके माता-पिता का मानना था। गुरुदत्त के माता पिता मूल रूप से करवार में बसे थे, परंतु बाद में वह वहां से स्थानांतरित हो गए। गुरुदत्त ने अपने बचपन का समय भौवानीपुर में बिताया, जो कोलकाता में एक स्थान का नाम है। बचपन का समय कोलकाता में बिताने के कारण गुरुदत्त को बंगाली भाषा का बहुत अच्छा ज्ञान था और वह बहुत अच्छी धाराप्रवाह बंगाली भाषा बोला करते थे। उनकी एक बहन भी थीं, जिनका नाम ललिता लाजमी था, जो भारत की महान चित्रकारों में से एक थीं। उनकी भतीजी, जिनका नाम कल्पना लाजमी था, भारतीय फिल्म जगत में एक मशहूर निर्देशिका, निर्माता और पटकथा लेखिका के रूप में प्रसिद्ध हुईं।

कैरियर जीवन के प्रारंभिक वर्ष में अंग्रेजी लेखन से फिल्मी जगत में कैरियर की शुरुआत

अपने शुरुआती करियर के दौरान सबसे पहले गुरुदत्त ने अपने घर में यह बताया कि उन्हें कोलकाता में लीवर ब्रदर्स के कारखाने में टेलीफोन ऑपरेटर की नौकरी मिल गई है और यह कह कर वह अपने घर से नौकरी करने को निकल गए। परंतु जल्द ही उनका मन इस नौकरी को करने से पूरी तरह भंग हो गया और उन्होंने वह नौकरी छोड़ दी। जिसके बाद सन् 1944 में वह वापस अपने माता पिता के पास मुंबई में रहने के लिए आ गए। हालांकि उनके चाचा ने उन्हें सन् 1944 में ही 3 साल के अनुबंध के तहत एक फिल्म कंपनी में जो पुणे में “प्रभात फिल्म कंपनी” के नाम से प्रतिष्ठित थी, उसमें नौकरी दिलवा दी। इस फिल्म कंपनी में वी. शांताराम ने पहले ही अपनी प्रतिभा का सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन करने के पश्चात, अपनी खुद की प्रोडक्शन कंपनी की शुरुआत की, जिसका नाम “राजकमल काला मंदिर” रखा गया। यहां पर गुरुदत्त को दो ऐसे लोगों से मिले जो आगे चलकर जीवन पर्यंत उनके अच्छे दोस्त बनें रहे। यह दो लोग थे – अभिनेता रहमान और अभिनेता देव आनंद। इनके साथ गुरुदत्त की दोस्ती बहुत लंबे समय तक चली। गुरुदत्त ने सन् 1944 में “चांद” नामक फिल्म में “श्री कृष्ण” की एक छोटी सी भूमिका निभाई थी। सन् 1945 में उन्होंने निर्देशक विश्रम बेडेकर के साथ “लखरानी” नामक फिल्म में सहायक निर्देशक के रूप में उनकी मदद करने के साथ-साथ इस फिल्म में अभिनय भी किया था। इसी प्रकार सन् 1946 में उन्होंने पी. एल. संतोषी की हिन्दी फिल्म “हम एक हैं” में सहायक निर्देशक के साथ साथ नृत्य निर्देशक के रूप में कार्य किया। हालांकि गुरु दत्त साहब का यह अनुबंध सन् 1947 में समाप्त हो गया था, परंतु उनकी मां ने उन्हें “प्रभात फिल्म कंपनी तथा स्टूडियो” के सी.ई.ओ. बाबूराव पाई के साथ एक स्वतंत्र सहायक के रूप में कार्य करने हेतु एक नौकरी दिलवा दी। हालांकि इसके बाद, लगभग 10 महीनों के लिए गुरुदत्त पूरी तरह बेरोजगार रहे और अपने परिवार के साथ मुंबई के माटुंगा में रहने लगे। इस समय के दौरान गुरुदत्त ने अपने भीतर अंग्रेजी में लिखने की एक आदत को विकसित किया और उन्होंने छोटी-छोटी कहानियों को लिखना शुरू किया। वे इन छोटी-छोटी कहानियों को एक स्थानीय इंग्लिश मैगजीन “द इलस्ट्रेटेड वीकली ऑफ इंडिया” के लिए लिखा करते थे।

कोरियोग्राफर अभिनेता और सहायक निर्देशक के रूप में गुरुदत्त द्वारा किए गए कार्य

गुरुदत्त एक अच्छा अभिनेता होने के साथ-साथ एक बहुत ही अच्छे कोरियोग्राफर भी थे। एक बार उनको प्रभात फिल्म कंपनी के द्वारा कोरियोग्राफर के रूप में नौकरी करने का मौका भी प्राप्त हुआ। अपने इस नए कार्य की यात्रा के दौरान, जब उन्होंने प्रभात फिल्म कंपनी के साथ एक कोरियोग्राफर के रूप में कार्य करना प्रारंभ किया तो उन्हें वहां पर अभिनय के क्षेत्र में भी कई प्रकार के मौके प्राप्त हुए और इन्हीं मौकों के परिणाम स्वरूप उन्हें अभिनय क्षेत्र में अपना हुनर दिखाने के कई अवसर प्राप्त हुए। इस दौरान उन्हें सहायक निर्देशक के रूप में भी काम करने का मौका मिला। सन् 1947 के दौरान प्रभात फिल्म कंपनी कई कारणों की वजह से डूब गई और प्रभात फिल्म कंपनी के डूब जाने के कारण गुरुदत्त मुंबई जाने के लिए मजबूर हो गए। मुंबई आने के बाद गुरुदत्त ने उस समय के दो बहुत बड़े फिल्म निर्देशकों के साथ कार्य किया। इन निर्देशकों में से पहले थे अमिया चक्रवर्ती जिन्होंने “गर्ल्स स्कूल” जैसी रचना का निर्देशन किया था और दूसरे निर्देशक के ज्ञान मुखर्जी, जो बॉम्बे टॉकीज से ताल्लुक रखते थे और उन्होंने संग्राम जैसी रचना को लोगों के सामने प्रस्तुत किया था।

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देव आनंद द्वारा गुरुदत्त को अपनी कंपनी ‘नवकेतन कंपनी’ के अंदर निर्देशक के रूप में नौकरी करने का प्रस्ताव देना

देव आनंद की कंपनी के द्वारा बनाई गई पहली फिल्म दर्शकों के सामने विफल हो जाने के कारण देव आनंद ने गुरुदत्त को अपनी कंपनी के अंदर निर्देशक के रूप में नौकरी करने का प्रस्ताव दिया। देव आनंद की कंपनी “नवकेतन कंपनी” उस समय के फिल्म जगत के इतिहास की सबसे मशहूर कंपनी के रूप में जानी जाती थी। इसके बाद ‘नवकेतन कंपनी’ के साथ गुरुदत्त कार्य करने लगे और कुछ समय उपरांत नवकेतन कंपनी के द्वारा रचित ‘बाजी’ नाम की पहली फिल्म सन् 1991 में सिनेमाघरों के अंदर प्रदर्शित हुई, जिसे गुरुदत्त के द्वारा निर्देशित किया गया था। यह फिल्म हॉलीवुड में पहले से प्रदर्शित हो चुकी फिल्म “नोएर जेनरे” का हिंदी संस्करण थी। हॉलीवुड की यह फिल्म सन् 1940 के दौरान वहां के सिनेमाघरों में धमाल मचा चुकी थी और गुरुदत्त ने जब इसे बाजी के रूप में निर्देशित किया तो उनके अनुसार यह उस हॉलीवुड फिल्म को एक श्रद्धांजलि थी। इस प्रकार पहली बार दर्शकों ने एक नैतिक रूप से विशुद्ध हीरो को देखा तथा फिल्म के अंदर कई प्रकार के प्रकाश के द्वारा पैदा किए गए, रोमांचित कर देने वाले दृश्यों और कई प्रकार की आवाजों को भी दर्शकों के लिए पहली बार उपलब्ध करवाया गया। इसके उपरांत गुरुदत्त की ख्याति दिनों दिन बढ़ने लगी और एक दिन देव आनंद ने गुरुदत्त के साथ एक अनुबंध करने का निश्चय किया। जिसके अनुसार गुरुदत्त और देव आनंद ने अपने बीच में यह करार किया गया कि यदि गुरुदत्त आगे चलकर एक फिल्म निर्माता के रूप में काम करना आरंभ करेंगे तो वह देव आनंद को अपनी फिल्मों में नायक के रूप में नियुक्त करेंगे और यदि देव आनंद किसी फिल्म का निर्माण करना आरंभ करते हैं तो वह इस फिल्म के निर्देशक के रूप में केवल गुरुदत्त को ही नियुक्त करेंगे।

गुरुदत्त और देव आनंद के बीच रचनात्मक विरोधाभास की शुरुआत

गुरुदत्त ने अपनी फिल्म बाजी में देव आनंद को हीरो के रूप में काम करने का मौका दिया तथा उन दोनों के बीच में हो चुके करार के अनुसार देव आनंद ने अपने द्वारा बनाई जा रही सीआईडी फिल्म के निर्देशक के तौर पर गुरुदत्त को नियुक्त किया। गुरुदत्त की मृत्यु हो जाने के उपरांत एक बार देव आनंद ने कहा था कि -“गुरुदत्त एक युवा और जिंदादिल इंसान थे और उन्हें इस प्रकार की अवसाद ग्रस्त (डिप्रेसिंग) फिल्मों का निर्माण नहीं करना चाहिए था।” गुरुदत्त और देव आनंद इन दोनों के गठजोड़ ने दो सुपरहिट फिल्मों का निर्माण किया जिसके नाम थे बाजी और जाल। समय के साथ गुरुदत्त और देव आनंद के भाई चेतन आनंद के बीच में कई प्रकार के रचनात्मक विरोध उत्पन्न हो गए थे। जिसका मुख्य कारण यह था कि चेतन आनंद भी निर्देशक के रूप में कार्य कर रहे थे और इन दोनों के बीच के इस विरोध की वजह से आगे चलकर उन दोनों के बीच कार्य को लेकर कई प्रकार की परेशानियां उत्पन्न होने लगी।

निर्देशक के रूप में गुरुदत्त के कार्य

गुरुदत्त के द्वारा हिंदी फिल्म जगत को दी गई उत्कृष्ट खोजें वहीदा रहमान, जॉनी वाकर, वी. के मूर्ति और अबरार अल्वी

गुरुदत्त के द्वारा निर्देशित की गई फिल्म “बाज़ी” रातों रात सफल फिल्मों की श्रेणी में शामिल हो गई थी। यह गुरुदत्त के लिए रातों रात मिली एक बहुत बड़ी सफलता थी और इसके उपरांत उनके द्वारा बनाई गई फिल्में जाल और बाज ने उन्हें वह सफलता तो नहीं दिलवाई, लेकिन इन दोनों फिल्मों के माध्यम से उन्होंने अपनी लिए एक टीम गठित करने में सफलता जरूर प्राप्त की और आगे चलकर गुरुदत्त की इस टीम के द्वारा कई सफल फिल्मों को प्रदर्शित किया गया। आगे चलकर उन्होंने जॉनी वाकर के अभिनय को पहचाना और फिल्म जगत इतिहास को एक बहुत ही उत्तम प्रकार के कॉमेडियन को दिया। गुरुदत्त के द्वारा ही वी. के मूर्ति और अबरार अल्वी की खोज भी की गई। जो कि अपने समय के बहुत ही उत्तम सिनेमैटोग्राफर तथा लेखक और निर्देशक साबित हुए। गुरुदत्त को ही इस बात का श्रेय दिया जाता है कि उन्होंने हिंदी फिल्म जगत को वहीदा रहमान जैसी उत्कृष्ट अभिनेत्री दी। गुरुदत्त ने वहीदा रहमान का अपनी फिल्मों के माध्यम से हिंदी फिल्म जगत में परिचय करवाया।

गुरुदत्त के द्वारा बनाई गईं कलात्मक फिल्मों एवं लोकप्रिय गीत

1950 के दशक में गुरुदत्त, हिंदी सिनेमा के संदर्भ में लोकप्रिय गीत लिखने तथा कलात्मक फिल्में बनाने के लिए अत्यंत प्रसिद्ध थे। इसके बाद उन्होंने कलात्मक फिल्मों से आगे बढ़कर व्यवसायिक सम्मेलनों में स्वयं के हुनर को आजमाना शुरू किया और उन्होंने इसकी शुरुआत 1957 में अपनी हिंदी फीचर फिल्म “प्यासा” को बनाकर किया। उनके द्वारा किए गए बनाई गई अन्य फिल्मों में भी उनके उत्कृष्ट अभिनय, बेहतरीन निर्देशन की झलक देखने को मिली। सामान्यता उनकी फिल्में रिलीज होते ही पूरे सिनेमाघर खचाखच भर जाते थे, फिर वह चाहे भारत के हो या विदेशों के। विदेशों में विशेष रूप से जर्मनी, जापान और फ्रांस के सिनेमाघरों में गुरु दत्त की फिल्मों को बहुत अधिक लोकप्रिय माना।

गुरुदत्त के द्वारा उनके अभिनय के उत्कृष्ट प्रदर्शन

“बाज” फिल्म को गुरुदत्त के द्वारा ना हीं सिर्फ निर्देशित किया गया था बल्कि उनके द्वारा इस फिल्म में अभिनय भी किया गया था। जिसका मूल कारण यह था कि उन्हें इस फिल्म के लिए कोई भी उपयुक्त अभिनेता नहीं मिल रहा था, जिसे वह इस फिल्म के मुख्य किरदार के लिए चयनित कर सकें। आगे चलकर बाज फिल्म, दर्शकों के दिल में जगह बनाने में कामयाब रही। गुरुदत्त के द्वारा बनाई गई उनकी अगली फिल्म पर उनका भाग्य बहुत अधिक मेहरबान हुआ। सन् 1954 में आई उनकी ब्लॉकबस्टर फिल्म “आर-पार” हिंदी फिल्म जगत के इतिहास की सबसे बेहतरीन फिल्मों में मानी जाती है और इसके उपरांत सन् 1955 में आई उनकी सुपरहिट फिल्म “मिस्टर एंड मिसेज 55” भी एक बहुत ही अच्छी फिल्म साबित हुई। इसके उपरांत गुरुदत्त ने लगातार कई और सफल फिल्मों का निर्देशन भी किया जैसे की सी.आई.डी और उसके बाद सैलाब और 1957 में आई। उनकी फिल्म “प्यासा” जो कि एक कवि की कहानी थी, जो कि इस दुनिया के सिद्धांतों के द्वारा नकार दिया जाता है और अपनी मृत्यु हो जाने के बाद वह बहुत अधिक सफलता प्राप्त करता है। गुरुदत्त ने इन तीनों ही फिल्मों में मुख्य किरदार को निभाया और अपने अभिनय का लोहा मनवाया। उनके अभिनय के इस उत्कृष्ट प्रदर्शन के कारण ही यह तीनों ही फिल्में सफल फिल्मों की श्रेणी में शुमार हुई।

एक समय जब गुरुदत्त अपने आप को दुर्भाग्यशाली मानने लगे थे

लगातार सफल फिल्में दे रहे गुरुदत्त के लिए सन् 1959 में एक समय ऐसा भी आया, जब गुरुदत्त को बहुत अधिक विफलताओं का सामना करना पड़ा। सन् 1959 में आई उनकी फिल्म “कागज के फूल” सिनेमाघरों के अंदर कुछ भी कमाल कर पाने में सफल नहीं हुई और यह फिल्म एक फ्लॉप साबित हुई। इस फिल्म के निर्माण के लिए गुरुदत्त ने बहुत अधिक मेहनत की थी। उन्होंने इस फिल्म को बनाने के लिए बहुत अधिक पैसा और मेहनत भी लगाई थी। उन्होंने अपने पूरे मन के साथ इस फिल्म को बनाया था परंतु यह फिल्म दर्शकों के दिल में जगह बनाने में सफल साबित ना हो सकी। यह फिल्म एक ऐसे निर्देशक की कहानी पर आधारित थी, जो कि केवल अपने आप को ही सबसे अच्छा निर्देशक समझता था और अपने कार्य के दौरान वह एक अभिनेत्री के प्रेम में पागल हो जाता है। इस फिल्म में अभिनेत्री का किरदार वहीदा रहमान के द्वारा निभाया गया था। वहीदा रहमान, गुरुदत्त साहब की असल जिंदगी में भी उनकी प्रेमिका के रूप में विख्यात थी। “कागज के फूल” बॉक्स ऑफिस पर कुछ भी कमाल दिखाने में सफल नहीं हुई थी और यह फिल्म बॉक्स ऑफिस के ऊपर बुरी तरह से फ्लॉप हो गई थी। इस फिल्म के फ्लॉप हो जाने के कारण गुरुदत्त अंदर से बहुत ज्यादा टूट गए थे। जिसके पश्चात वह बहुत ही ज्यादा तनाव पूर्ण जीवन जीने लगे थे। इसके पश्चात उनके द्वारा निर्देशित की जाने वाली अन्य फिल्मों को उनकी टीम के अन्य सदस्य के द्वारा पूर्ण किया गया, क्योंकि कागज के फूल की विफलता के कारण गुरुदत्त अपने आप को बहुत अधिक दुर्भाग्यशाली मानने लगे और उनका मानना था कि बॉक्स ऑफिस पर उनका नाम भाग्य को साधने में सफल नहीं हो पाता।

एक बार फिर जब गुरुदत्त ने अपनी फिल्मों से अपने हुनर का लोहा मनवाया

गुरुदत्त ने एक सफल फिल्म “चौदहवीं का चांद” बनाने में सफलता हासिल की। इस फिल्म ने बॉक्स ऑफिस के ऊपर सफलता के नए झंडे गाड़ दिए। यह फिल्म अपने प्रभाव से दर्शकों के दिल में जगह बनाने में बेहद कामयाब रही। हिंदू और मुस्लिम की प्रेम कहानी पर आधारित, यह फिल्म बहुत अधिक सफल हुई। इस फिल्म के अंदर गुरुदत्त ने मुख्य कलाकार अर्थात नायक भूमिका निभाई और अभिनेत्री के रूप में वहीदा रहमान ने इस फिल्म के अंदर अपने उत्कृष्ट अभिनय को प्रस्तुत किया। इस फिल्म को एम. सादिक के द्वारा निर्देशित किया गया था, जिनकी गणना उस समय के एक अच्छे निर्देशक के रूप में की जाती थी। इस फिल्म का शीर्षक गीत “चौदहवीं का चांद हो या आफताब हो” बहुत ही अधिक प्रसिद्ध हुआ और एम. सादिक के द्वारा इस शीर्षक गीत को रंगीन चित्रण के रूप में भी प्रस्तुत किया गया। “साहब बीवी और गुलाम” भी एक बहुत ही सफल फिल्मों की श्रेणी में शामिल की जाती है। इस फिल्म को गुरुदत्त के द्वारा परिचित कराए गए निर्देशक अबरार अल्वी के द्वारा निर्देशित किया गया था। इस फिल्म के लिए निर्देशक अबरार अल्वी ने सबसे उत्तम फिल्म निर्देशक का फिल्मफेयर अवार्ड जीता। इस फिल्म के अंदर फिल्म जगत की मशहूर “ट्रेजेडी क्वीन” के नाम से मशहूर अदाकारा मीना कुमारी ने अभिनेत्री के रूप में अपने अभिनय का प्रदर्शन किया था। साथ ही गुरुदत्त ने वहीदा रहमान तथा रहमान के साथ सहायक किरदार निभाकर अपना योगदान दिया। मशहूर फिल्म अदाकारा वहीदा रहमान ने फिल्म के दौरान उठ रही इन खबरों को गलत बताया था कि गुरुदत्त ने इस फिल्म को अंदर ही अंदर स्वयं निर्देशित किया था।

आखरी समय के कार्य

सन् 1964 में प्रदर्शित हुई फिल्म ‘सांझ और सवेरा’ एक बहुत ही अच्छी फिल्म मानी जाती है। यह फिल्म गुरुदत्त की आखिरी फिल्म भी थी। जिसका निर्देशन ऋषिकेश मुखर्जी ने किया था और इस फिल्म में मीना कुमारी, गुरु दत्त की हीरोइन थी। ‘बहारें फिर भी आएगी’ यह फिल्म गुरुदत्त की वह आखिरी फिल्म थी, जिसमें वह अपने अंतिम दिनों के समय में काम कर रहे थे। अपनी मृत्यु से पहले तक वह इस फिल्म को पूरा करने में व्यस्त थे और उनकी मृत्यु के उपरांत उनके इस किरदार को मशहूर अभिनेता धर्मेंद्र के द्वारा निदा निभाया गया। धर्मेंद्र को यह किरदार गुरुदत्त की मृत्यु के कारण प्राप्त हुआ था। यह फिल्म सन् 1966 में सिनेमाघरों में प्रदर्शित की गई और गुरुदत्त की टीम के द्वारा बनाई गई यह आखिरी फिल्म थी।

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प्रेम विवाह के बावजूद गुरुदत्त की शादीशुदा जिंदगी थी पूरी तरह से बर्बाद

गुरुदत्त की निजी जिंदगी कभी भी बहुत अच्छी नहीं रही। सन् 1953 में गुरुदत्त ने शादी कर ली। उस समय की बहुत ही जानी-मानी प्लेबैक सिंगर गीता रॉय चौधरी के साथ गुरुदत्त ने विवाह किया था। जिन्हें बाद में गीता दत्त के नाम से जाना गया। गीता चौधरी और गुरु दत्त का प्रेम प्रसंग उस समय काफी चर्चा में रहा। इन दोनों लगभग 3 वर्षों तक एक दूसरे के साथ प्रेम के संबंध में रहे और इसके उपरांत इन दोनों ने अपने परिवारों के अत्यधिक विरोध के बावजूद अपने परिवारों को मना कर एक दूसरे से शादी कर ली। शादी के उपरांत गुरुदत्त की पत्नी गीता चौधरी ने 3 बच्चों को जन्म दिया। जिनमें दो पुत्र और एक पुत्री शामिल थे, जिनके नाम थे तरुण, अरुण और नीना। इन तीन बच्चों का लालन-पालन गुरुदत्त के भाई आत्माराम के घर में हुआ और आत्माराम के ही घर में इन तीन बच्चों का बचपन बीता। गीता दत्त के भाई मुकुल रॉय ने भी गुरुदत्त और गीता चौधरी की मृत्यु के उपरांत इन तीन बच्चों के लालन-पलन में अपना पूरा योगदान दिया।

गुरुदत की शादीशुदा जिंदगी बहुत ही खराब दौर से गुजरी थी। गुरुदत्त और गीता चौधरी का आपस का रिश्ता शादी के बाद बहुत ही खराब हो गया था। गुरुदत्त के भाई आत्माराम के अनुसार गुरुदत्त एक बहुत ही अनुशासित व्यक्ति थे। वह अपने काम में किसी भी प्रकार का दखल और अनुशासन की कमी को बर्दाश्त नहीं करते थे। परंतु इसके विपरीत गुरुदत्त अपनी निजी जिंदगी में उतने ही लापरवाह इंसान थे। गुरुदत्त नियमित तौर पर धूम्रपान और शराब का सेवन किया करते थे तथा वह शराब के नशे में देर रात तक जागते रहते थे। गुरुदत्त की इन बुरी आदतों के कारण उनकी निजी जिंदगी बहुत अधिक प्रभावित हो गई थी। परंतु इतना सब होने के बावजूद भी उन्होंने कभी भी अपनी इन बुरी आदतों को सुधारने के लिए अपने अंदर कभी भी परिवर्तन लाने का प्रयास नहीं किया।

गुरुदत्त की निजी जिंदगी और भी अधिक प्रभावित तब होने लगी, जब उनके अफेयर की खबरें अभिनेत्री वहीदा रहमान के साथ आने लगी। अभिनेत्री वहीदा रहमान के साथ आ रही उनके अफेयर की खबरों ने उनकी शादीशुदा जिंदगी को और बुरी तरह प्रभावित किया। जिसके परिणाम स्वरूप उनकी शादीशुदा जिंदगी पूरी तरह से विफल होने के कगार तक पहुंच गई। गुरुदत्त अपने अंतिम समय में जब वह मृत्यु के बिल्कुल करीब थे तो उन्होंने अपनी पत्नी गीता को छोड़कर अलग होने का फैसला किया और वह अकेले रहने लगे। इसके उपरांत सन् 1972 में 41 वर्ष की उम्र में गीता दत्त की मृत्यु हो गई। गीता दत्त की मृत्यु का कारण था शराब का अत्यधिक सेवन। जिसकी वजह से उनका लीवर पूरी तरह से बर्बाद हो गया था।

इससे पहले भी दो बार आत्महत्या का विफल प्रयास कर चुके थे गुरुदत्त

गुरुदत्त की मृत्यु 10 अक्टूबर सन् 1964 के दिन हुई थी। गुरुदत्त मुंबई शहर में पेडर रोड पर स्थित एक किराये के अपार्टमेंट के अंदर अकेले ही रहा करते थे। एक दिन वह अपने अपार्टमेंट के अंदर अपने बेड के ऊपर मृत पाए गए। गुरुदत्त का आखरी समय बहुत ही अकेले में गुजरा था तथा उनकी मृत्यु के बारे में कई अलग-अलग तरह के कयास लगाते जाते रहे हैं। परंतु जानकारों के अनुसार गुरुदत्त शराब के अंदर नींद की गोलियों को मिलाकर पिया करते थे। जिसके कारण यह भी आशंका जताई गई थी कि गुरुदत्त की मृत्यु एक आत्महत्या भी हो सकती है। कुछ खबरों के अनुसार यह भी कहा गया कि यह एक लापरवाही के कारण हुई मृत्यु थी। जो वास्तव में शराब के अंदर ज्यादा नींद की गोली मिलाकर पीने के कारण हुई थी। अगर यह माना जाए कि गुरु दत्त ने इस प्रकार आत्म हत्या को अंजाम दिया था, तो यह गुरुदत्त का तीसरा आत्महत्या करने का प्रयास था जिसमें वह सफल हुए थे। गुरु दत्त के बेटे अरुण दत्त ने इसे महज एक दुर्घटना बताया था और उन्होंने इसे एक दुर्घटनावश हुई मौत करार दिया था। जब गुरुदत्त की मृत्यु हुई तो यह पता चला कि गुरुदत्त ने अगले दिन अभिनेत्री माला सिन्हा और अभिनेता राज कपूर को मिलने के लिए अपना वक्त दिया था। गुरुदत्त इन दोनों के साथ मिलकर ‘बहारें फिर आएंगी’ फिल्म पर काम करना चाहते थे और वह इन दोनों से इस बात करके सलाह मशवरा करना चाहते थे कि क्या इस फिल्म को रंगीन फिल्म में बनाया जा सकता है। गुरुदत्त के बेटे अरुण दत्त के अनुसार उनके पिता को रात में ठीक प्रकार से नींद नहीं आती थी इसलिए वह सोने के लिए नींद की गोलियों का इस्तेमाल क्या करते थे। जैसा कि हर वह इंसान करता है जिसे ठीक प्रकार से नींद नहीं आती है और उस दिन भी वो रोज की भांति नींद की गोलियां लेकर सोना चाहते थे। परंतु उस दिन उन्होंने अत्यधिक शराब पी रखी थी और इसी कारण शराब के नशे में दुर्घटनावश उन्होंने जरूरत से ज्यादा नींद की गोलियों का सेवन कर लिया जो कि उनकी मृत्यु का कारण बना।

गुरुदत्त के दो महत्वपूर्ण अधूरे प्रोजेक्ट, जिनमें से एक कभी पूरा ही नहीं हुआ

अपनी मृत्यु के समय गुरुदत्त दो अति महत्वपूर्ण प्रोजेक्ट्स में उलझे हुए थे। जिसमें से पहला था, पिकनिक जिसमें कि वह अभिनेत्री साधना के साथ काम करने वाले थे और उनका दूसरा प्रोजेक्ट था जाने-माने निर्देशक के आसिफ द्वारा निर्देशित की जाने वाली फिल्म लव एंड गॉड। गुरुदत्त की मृत्यु के कारण अभिनेत्री साधना के साथ बनाई जाने वाली फिल्म पिकनिक कभी भी पूर्ण नहीं हो सकी और उनका दूसरा महत्वपूर्ण प्रोजेक्ट जो कि निदेशक के आसिफ के साथ चल रहा था वह भी उनकी मृत्यु के बाद रुक गया जो कि लगभग दो दशक के बाद दर्शकों के सामने प्रस्तुत किया गया जिसमें अभिनेता संजीव कुमार ने गुरुदत्त के द्वारा निभाए जाने वाला किरदार प्रस्तुत किया।

गुरुदत्त द्वारा अपने काम के प्रति समर्पण

गुरुदत्त बहुत ही रचनात्मक तरीके से अपनी फिल्मों को व्यापार के रूप में इस्तेमाल किया करते थे। गुरुदत्त के द्वारा बनाई गई कई सफल फिल्में जैसे कि सी.आई.डी., बाज़ी, प्यासा, कागज के फूल, चौदहवीं का चांद तथा साहिब बीवी और गुलाम जैसी फिल्में अपने आप में बिल्कुल अलग तरह की फिल्में थीं। जिसे हिंदी सिनेमा के दर्शकों के सामने प्रस्तुत किया गया और दर्शकों ने इन फिल्मों को बहुत सराहा भी। गुरुदत्त के द्वारा बनाई गई एक मात्र फिल्म जिसका नाम था “कागज के फूल” वह दर्शकों की आकांक्षाओं पर उस समय खरी नहीं उतरी। परंतु आज के समय में यह फिल्म बहुत प्रसिद्ध है और पुराना सिनेमा देखने वाले दर्शकों के बीच अत्याधिक लोकप्रिय भी है। जब गुरुदत्त ‘कागज के फूल’ बना रहे थे तो उन्होंने इसके निर्माण पर सत्तरह करोड़ रुपए खर्च किए थे, जो फिल्म के फ्लॉप हो जाने के कारण उन्होंने गंवा दिए थे। उस समय के हिसाब से यह रकम बहुत ही बड़ी मानी जाती थी। इतने बड़े नुकसान को उठाकर भी गुरुदत्त ने कभी हार नहीं मानी और जब उन्होंने अपनी अगली फिल्म ‘चौदहवीं का चांद’ बनाई, तो उन्होंने अपने इस सारे नुकसान को अपनी इस फिल्म के माध्यम से पूरा कर लिया था। गुरुदत्त ने कभी भी अपनी टीम के ऊपर से अपना विश्वास नहीं खोया और उन्होंने हमेशा अपनी फिल्मों के डिस्ट्रीब्यूटर्स को प्रेरित किया और उनके ऊपर विश्वास बनाए रखा। जैसे ही गुरुदत्त के द्वारा बनाए जाने वाला कोई प्रोजेक्ट पूरा होता था गुरुदत्त तुरंत ही अगले प्रोजेक्ट पर काम करना आरंभ कर देते थे।

गुरुदत्त के प्रति समर्पित की गई श्रद्धांजलि

  • सन् 2002 में एक चुनाव करवाया गया, इस चुनाव के माध्यम से सबसे उत्तम फिल्मों को पुरस्कार दिया जाने वाला था। यह चुनाव साइट एंड साउंड क्रिटिक्स एंड डायरेक्टर्स संस्था के द्वारा करवाया गया। इस चुनाव में प्यासा और कागज के फूल, 160 फिल्मों में सबसे उत्तम फिल्म चुनी गई थी और इसी दौरान सन् 2002 में इसी संस्था के द्वारा गुरुदत्त को सबसे सफल फिल्म निर्देशकों की तालिका में 73वें नंबर पर स्थान दिया गया था। जिसकी वजह से गुरुदत्त एशिया के अंदर आठवें सबसे उत्तम फिल्म मेकर चुने गए थे।
  • भारतीय डाक के द्वारा सन् 2004 में 11 अक्टूबर के दिन एक डाक टिकट जारी किया गया, जिसके ऊपर गुरुदत्त की तस्वीर को प्रदर्शित किया गया। यह कार्य भारतीय डाक के द्वारा गुरुदत्त को दी गई श्रद्धांजलि के अंतर्गत था।
  • गुरुदत्त के भाई आत्माराम ने अपने द्वारा निर्देशित फिल्म ‘चंदा और बिजली’ को अपने भाई की याद में उन्हें समर्पित किया।
  • “प्यासा” एक ऐसी फिल्म थी, जिसे टाइम मैगजीन के द्वारा 100 सबसे उत्तम फिल्मों की श्रेणी में शुमार किया गया है।
  • फिल्म ‘काग़ज़ के फूल’ की डीवीडी के साथ एक एक्स्ट्रा फीचर उपलब्ध करवाया गया था जिसके तीन हिस्से थे। ‘चैनल फार’ नामक कंपनी के द्वारा गुरुदत्त के ऊपर एक छोटी फिल्म बनाई गई थी, जिसमें उनके जीवन पर आधारित कई घटनाओं का वर्णन किया गया था और इस फिल्म को नाम दिया गया था ‘इन सर्च ऑफ गुरुदत्त’। जिसे फिल्म ‘कागज के फूल’ की डीवीडी के साथ स्गलंन करके दर्शकों तक पहुंचाया गया था।
  • दूरदर्शन के द्वारा भी गुरुदत्त के ऊपर एक लघु फिल्म का निर्माण किया गया था। दूरदर्शन के द्वारा बनाई गई यह छोटी फिल्म 10 अक्टूबर सन 2011 को दूरदर्शन के ऊपर प्रदर्शित की गई।

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