जानिये अच्छे माता-पिता बनने के 30 बहुत प्रभावी टिप्स

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बच्चे के जीवन में माता पिता का अभिन्न योगदान है। एक छोटे बच्चे की परवरिश शैली का असर बच्चे पर पूरे जीवन भर रहता है। एक प्रभावी और सकारात्मक परवरिश शैली एक बच्चे के गुणों को निखारने में बहुत सहायक भूमिका निभाती है। जब बच्चे खुद को अपने माता-पिता की नजरों से देखते हैं, तो बच्चे स्वयं के प्रति अपनी समझ विकसित करना शुरू कर देते हैं। माता-पिता की आवाज़, उनकी शारीरिक भाषा, और हर अभिव्यक्ति बच्चों पर प्रभाव डालती है। माता-पिता के रूप में इनके शब्द और कार्य उनके संपूर्ण विकास को किसी भी अन्य चीज़ से अधिक प्रभावित करते हैं।

माता-पिता का ये दायित्‍व है कि वह अपने बच्‍चों की सही तरह से देखभाल करें। अच्छी पेरेंटिंग का अर्थ है कि अपने बच्चों को अच्छे संस्कार दें, प्यार दें, सुरक्षा दें, और अपना समय दें। ज्‍यादातर माता-पिता अपने बच्‍चों का ध्‍यान उस तरीके से नहीं रख पाते हैं जैसा कि उन्‍हें रखना चाहिए। माता-पिता द्वारा बच्चे का पालन-पोषण एक बच्चे के बचपन से वयस्कता तक शारीरिक, भावनात्मक, सामाजिक और बौद्धिक विकास को बढ़ावा देने और परिपक्व करने की प्रक्रिया है। पेरेंटिंग में बहुत कौशल और धैर्य चाहिए होता है और यह एक निरंतर काम है। प्रारंभिक वर्षों के दौरान एक बच्चा जो भी संज्ञानात्मक क्षमता, सामाजिक कौशल और व्यवहारिक कुशलता प्राप्त करता है, वे मौलिक रूप से अपने माता-पिता के साथ बातचीत की गुणवत्ता की वजह से संभव हो पता है।

कैसा व्यवहार करें बच्चों के साथ?

  • बच्चे हर उस काम को करना चाहते हैं, जो उन्हें दुनिया को समझने में मदद करता है। बच्चों की सीमाओं को निर्धारित करके अपना प्यार दिखाएं ताकि आपके बच्चे सुरक्षित रूप से अपनी सीमाओं को जान सकें। घटित घटनाओं या चर्चाओं के बारे में सच्चाई से संवाद करें, क्योंकि माता-पिता के प्रमाण से बच्चों को समझाने में मदद मिलती है।
  • बच्चों के साथ संयमित होना जरूरी है, क्योंकि बच्चों के व्यवहार को ढालने की आवश्यकता होती है। माता-पिता जो नियमित दिनचर्या स्थापित करते हैं, बच्चों की दिनचर्या पर उसका असर दीखता है। बच्चों के खुद के कार्य पर प्रतिबन्ध न रहे तो बच्चे नए नए तरीकों से अपने कार्य को पूरा करने की कोशिश करते हैं। माता-पिता को बच्चे की इन गतिविधियों को देखते रहना चाहिए। जैसे यदि बच्चा टेबल से खाने को साफ करना चाहे तो उसे रोकना नहीं चाहिए। इससे बच्चे को अपनी जिम्मेदारियों का अनुभव होता है। कई माता-पिता यह सोच कर बच्चे को कुछ भी ज़िम्मेदारी वाला काम करने से रोक देते हैं कि वो बहुत छोटा है। हर समय ऐसा नहीं करना चाहिए।
  • बच्चों के साथ जब माता-पिता होते हैं तो उनके हर कार्य को खुद ही सम्पूर्ण करने की कोशिश करते हैं। इस से उस बच्चे में नए विकल्पों को ढूँढने में रुकावट पैदा करती है। बच्चे को अपना कार्य करने की छूट देनी चाहिए। माता-पिता को अपनी देख-रेख अवश्य रखनी चाहिए पर बच्चे को स्वतंत्रता पूर्वक अपनी ज़िम्मेदारी का वहां करने के लिए प्रेरित करना चाहिए. जैसे कि अपना सामान जगह पर रखना, समय पर ब्रश करना, खेलने के बाद हाथ धोना, अपना बिस्तर साफ़ रखना, इत्यादि।
  • अपने बच्चे के साथ कुछ मजेदार करने के लिए एक निश्चित समय निर्धारित करने का प्रयास करें। कभी भी बच्चों के सामने अनुशासन को लेकर ढील न बरतें।
  • बच्चों पर किसी कार्य को लागू करने में सक्षम होने के बिना कभी भी एक आदेश, अनुरोध, या आदेश नहीं देना चाहिए। एक ही जैसे व्यवहार को जितना संभव हो उतना नियमित तरीके से करना चाहिए। आपके बच्चे को ऐसा न लगे कि माता-पिता अप्रत्याशित व्यवहार करते हैं। इससे उसकी मानसिक असुरक्षा की भावना बढ़ेगी और हीन भावना भी आएगी।
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  • इस बात पर सहमत हों कि कौन सा व्यवहार वांछनीय है और कौन सा वांछनीय नहीं है। अवांछनीय व्यवहार का जवाब कैसे दें, इस पर माता-पिता आपस में सदा सहमत हों। यह यथासंभव स्पष्ट करें कि बच्चे के लिए वांछनीय और अवांछनीय व्यवहार क्या है। यह कहना पर्याप्त नहीं है, “आपका कमरा गन्दा है।” गन्दी बात के अर्थ में निर्दिष्ट किया जाना चाहिए, जैसे: “आपने फर्श पर गंदे कपड़े, अपने डेस्क पर गंदी प्लेटें रखी हुई हैं, और अपना बिस्तर नहीं बनाया है।”
  • एक बार जब आपने अपनी स्थिति बता दी और बच्चा उस स्थिति के लिए असहज महसूस करता है, तो अपना बचाव न करें। बस एक बार फिर स्थिति को वैसे ही रहने दें और फिर बच्चे के असहज व्यवहार को प्रतिक्रिया न दें। व्यवहार में धीरे-धीरे बदलाव देखें। बच्चों से बहुत जल्दी बहुत अधिक उम्मीद नहीं करनी चाहिए। इच्छित लक्ष्य के करीब आने वाले व्यवहार पर बच्चे की प्रशंसा उसका हौसला बढाती है। अच्छे माता-पिता होने कि पहली शर्त है कि आप बच्चे का मार्गदर्शन करें और हौसला बढाएं।
  • पेरेंट्स (माता-पिता) का व्यवहार बच्चों के लिए एक आदर्श व्यवहार के रूप में कार्य करता है। बच्चों के लिए सजा अपराध के अनुरूप होना चाहिए। सज़ा ज्यादा या कम होने से अपनी वस्तुता खो देगी। इसके अलावा व्यवहार के मामले में, परिणाम पहले से बताया जाना चाहिए ताकि बच्चे को पता हो कि क्या उम्मीद है। बच्चे के उत्तेजित होने पर उसकी अधिक अवहेलना नहीं करनी चाहिए।
  • बच्चों को पुरस्कार की लत नहीं लगनी चाहिए, क्योंकि बच्चे फिर हर कार्य के लिए अपेक्षा की आदत लगा लेते हैं। उन्हें ये बताइए कि पुरस्कार विशिष्ट उपलब्धि के लिए है- चाहे वो व्यवहार में हो या समाज में।
  • बच्चों के साथ दोस्ताना व्यवहार होना चाहिए क्योंकि जब बच्चों को यह पता चले कि उन्होंने अनुचित व्यवहार किया है तो उन्हें ये डर न हो कि अब उन्हें बहुत अधिक सज़ा मिलेगी । उन्हें भविष्य के परिणामों से बचने के लिए यह याद रखने की कोशिश करने के लिए प्रोत्साहित करें कि उन्हें क्या करना चाहिए। उन्हें बड़ों और छोटों के साथ दोस्ती के दायरे के बारे में बताइए। उन्हें बताइए कि किस तरह समान उम्र वालों से दोस्ती अलग होती है और बेमेल उम्र वालों से अलग।
  • बच्चों के साथ दिलचस्प किताबें पढने की आदत डालिए। यह आदत जीवन भर किताबों के साथ एक रिश्ता बनाने में सहायक होती है। एक शिक्षक या कोच के रूप में अपनी भूमिका अपने बच्चों के लिए रखने से बच्चे में अनुशासन को बनाये रखने में मदद भी मिलती है।
  • बच्चों के खाने को लेकर जिद्द पर नहीं अडें। खाना खाने में दिलचस्पी पैदा करने के लिए खाने में बदलाव करें। बच्चे को खाने से होने वाले लाभ और हानि के बारे में बताएं । किसी खेल का उपयोग कर सकते हैं बच्चे को बार बार खाने के लिए। किसी उपहार या अन्य तरह के लालच से बचना चाहिए, वरना बच्चा इसकी आदत दाल सकता है। बच्चे के साथ पूरे परिवार को एक साथ खाना खाने की आदत से बच्चे में खाने को लेकर जिद में कमी देखी जाती है।
  • बच्चों को शारीरिक स्वास्थ्य की ज़रुरत से अवगत कराएं। उन्हें पोषण तत्वों से भरपूर खाना खाने, योग करने, समय पर बाथरूम जाने, जंक फ़ूड न खाने के लिए प्रेरित करें। उन्हें बताएं कि चलना फिरना शरीर के लिए बहुत ज़रूरी है इसलिए दिन भर एक जगह पर न बैठें।
  • अपने बच्चों को यह बताने के बजाय कि क्या नहीं करना चाहिए, उन्हें सिखाएं और दिखाएं कि उन्हें क्या करना चाहिए। जब वे कुछ अच्छा करते हैं तो वर्णनात्मक प्रशंसा का उपयोग करें। अपने बच्चे को यह बताने में मदद करें कि उसके द्वारा किया गया काम क्यों अच्छा है । एक स्थिति को उस तरह से देखने का प्रयास करें जिस तरह से आपके बच्चे देखते हैं। उनकी बात ध्यान से सुनें। उनकी बातों पर गंभीरता से विचार करें। चाहे तो अपने किसी मित्र से या परिवार के सदस्यों से या डॉक्टर से सलाह लें।
  • जब आपके बच्चे किसी कारणवश परेशान हों तो उन्हें पुनर्निर्देशित करने के लिए नरम, आत्मविश्वास से भरे स्वर का उपयोग करें। एक अच्छा श्रोता बनें, ये बहुत ज़रूरी है। अपने बच्चे को दिलचस्पी वाली भाव-भंगिमा से देखें, जब वो आपसे कुछ बात कर रहा हो। शारीरिक रूप से छोटे बच्चों के स्तर तक नीचे आने से बच्चे अपने पेरेंट्स से खुल कर बात कर सकते हैं। बस उन्हें ये लगना चाहिए कि आप उनके हिसाब से उनकी बात सुनोगे न कि ऐसे जैसे बड़े सुनते हैं।
  • बच्चों से ऐसे सवाल पूछने चाहिए जिनके उत्तर हां या ना में दिए जा सके। आपने जो सुना, उसे फिर से दोहराएं। सुनिश्चित करें कि वे दिशाओं को समझते हैं। जब संभव हो तो उन्हें कब और कैसे एक अनुरोध का अनुपालन करना है, इसके विकल्प दें। व्यवहार में धीरे-धीरे बदलाव देखें। इच्छित लक्ष्य के करीब आने वाले व्यवहार की प्रशंसा करें। एक अशाब्दिक संकेत (इशारा) विकसित करें जिसे आपके बच्चे एक संकेत के रूप में उस समय स्वीकार करेंगे जब वे अनुचित व्यवहार कर रहे होंगे। उस समय वे इस इशारे को देख कर ये समझेंगे कि उन्हें अपने व्यवहार को बदलने की आवश्यकता है। यह उन्हें परेशान किए बिना आपके संकेत का जवाब देने में मदद करता है।
  • बच्चे को प्रकृति से जुड़े रहने के बारे में बताना चाहिए। अपने आस-पास के प्राकृतिक दृष्यों के बारे में बताना चाहिए। उनको बागबानी करना, घास पे चलना, सूर्योदय देखना, फूल चुनना इत्यादि गतिविधियों में लगाना चाहिए। आस-पास की सफाई के लिए अग्रसर होने के लिए प्रेरित करना चाहिए। बच्चे को हमेशा सच बोलें, ये सारे गुण जीवन भर उसके साथ रहेंगे।
  • बच्चों को गले लगाकर आत्मिक प्रेम का अनुभव देने की कोशिश करनी चाहिए।
  • बच्चों में अच्छी आदतें डालिए। उन्हें प्रेरित करिए कि वो साफ़-सुथरे होने के बाद ही भोजन करें। समय पर भोजन ख़त्म करें। अलार्म क्लॉक का इस्तेमाल कर के सुबह खुद ही पढने के लिए उठें। जानवरों के साथ अच्छा व्यवहार करें। घर में यदि नौकर हैं तो उनके साथ भी समान व्यवहार करें।
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  • बच्चे के साथ सामाजिक बातें करने से बच्चे को समाज से जुड़ने में सहायता मिलती है। उन्हें आसपास और देश दुनिया की वो बातें बताएं जिससे उनमें समझ आये और वो जागरूक बनें।
  • जब कभी संभव हो तो अपने बच्चे को अपने व्यवहार में सुधार करने के लिए प्रेरित करने के लिए पुरस्कार और प्रशंसा का उपयोग करने का प्रयास करें। छोटे बच्चों के लिए आप “दादी के नियम” सिद्धांत का उपयोग कर सकते हैं। कह सकते हैं, “जब आपने अपने सारे कपड़े उठा लिए हैं, तो आप बाहर निकल कर खेल सकते हैं। बच्चे जब भी पेरेंट्स की अवहेलना करें तो यह व्यवहार स्वीकार नहीं करना चाहिए। उसकी असभ्यता को सहज एवं सौम्य दंड से रोकने की कोशिश करनी चाहिए।
  • माता- पिता को अपने बच्चे को किसी भी प्रकार के समूह वाले खेल से जोड़े रखना चाहिए। खेल से बच्चों में एक साथ काम करने की सहज प्रवृत्ति आती है एक दूसरे की मदद करने की इच्छुक भी बनाती है। बच्चों को डर और सतर्कता के बीच का अंतर खेल के जरिये बताने से बच्चों में बहादुरी बिना ईर्ष्या के आती है।
  • बच्चे के मन में किसी भी के प्रति ईर्ष्या, घृणा, तुच्छता की भावनावों को समझदरी से पेश आने पर बच्चे का बौद्धिक विकास होता है। इससे बच्चों में एक दूसरे के प्रति सहायता की भावना आती है। अच्छाई और बुराई के बीच का फर्क आप कहानी या आपबीती वर्णन के माध्यम से समझा सकते हैं।
  • बच्चे को दयालु, उदारता, ईमानदारी और आत्मसम्मान की कीमत समझाएं। उन्हें बताएं कि आप के एक अच्छे कार्य से दूसरे के चेहरे में किस तरह मुस्कान आ जाती है, उनके जीवन में किस प्रकार बदलाव आ सकता है। इन सभी भावनावों को यदि किसी कहानी का तर्क देकर बताएं तो बच्चे अधिक सहजता से स्वीकार करते हैं।
  • बच्चे को टीवी, फ़ोन से दूर रखना ज़रूरी है। पर यदि माता-पिता इन चीज़ों में लगे रहेंगे तो बच्चे का मन तो करेगा ही, और इस जगह बच्चा गलत भी नहीं है। माता-पिता बच्चों के साथ किसी खेल को खेल सकते हैं। बच्चे को बाइक, कार पर घुमाने के बजाय पैदल सैर करा सकते हैं जिससे बच्चे की सेहत पर भी सकारात्मक असर पड़ता है।
  • बच्चे को हलके- फुल्के व्यायाम कराना चाहिए, ताकि उनके शरीर में स्फूर्ति बनी रहे।
  • बच्चे को सारे टीके (वैक्सीन) सही समय पर दिलवाना एक जिम्मेदार माता-पिता का दायित्व है। इससे कभी भी ना चूकें।
  • बच्चे को हो रहे शारीरिक कष्ट को कभी भी अनदेखा न करें, हो सकता है ये किसी गंभीर बीमारी कि वजह से हो। तुरंत डॉक्टर की सलाह लें।
  • बच्चे से उसके स्कूल और दोस्तों के बारे में बातें करते रहे। आप ये जान सकेंगे कि आपके बच्चे के साथ कुछ अनुचित तो नहीं हो रहा है।
  • अपने बच्चे को अच्छे और बुरे ‘स्पर्श’ के बारे में बताएं। आजकल समाज में इन बातों का पता होना बहुत ज़रूरी है। यदि आपको यह समझ नहीं आ रहा है कि ऐसा कैसे करें तो आप बच्चे के टीचर या डॉक्टर से परामर्श ले सकते हैं।

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