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जापानी शिक्षा प्रणाली की ऐसी 10 विशिष्ट बातें जिससे इनका दुनिया में दबदबा है.

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जापानी लोग अक्सर अपनी बुद्धिमता, स्वस्थ जीवनशैली, सभ्यता और विनम्रता के लिए जाने जाते हैं। लेकिन ये देश इतना अनुठा और दुनिया के बाकी हिस्सों से अलग क्यों है? असल में इसका कारण है उनकी अविश्वसनीय रूप से शानदार शिक्षा प्रणाली। जिसके बारे में आज हमने इस लेख में चर्चा की है।

1. ज्ञान से पहले शिष्टाचार

जापानी स्कुलों के बच्चें चौथी श्रेणी तक पहुंचने से पहले किसी भी तरह की परीक्षा नहीं देते हैं (10 वर्ष की आयु में)। वे सिर्फ छोटे-छोटे इम्तिहान देते हैं। यह माना जाता है कि जापानी स्कुलों का लक्ष्य पहले तीन साल तक बच्चों के ज्ञान और सीखने की क्षमता पर ध्यान न देकर बच्चों के अन्दर अच्छे शिष्टाचार को स्थापित करना तथा उनके चरित्र का विकास करना होता है। बच्चों को अपनों से बड़ों के प्रति सम्मान करना तथा जानवरों व प्रकृति के प्रति अच्छा व्यवहार करना सिखाया जाता है। बच्चों को उदारता, दयालूता और सहानूभूतिपूर्वक व्यवहार करना भी सिखाया जाता है। इसके अलावा बच्चों को धैर्य, आत्मनियंत्रण तथा न्याय जैसे गुण भी सिखायें जाते है।

2. शैक्षणिक वर्ष 1 अप्रेल से शुरू होता है

ज्यादातर स्कुलों में शैक्षणिक वर्ष सितम्बर या अक्टूबर में शुरू होता है, लेकिन जापान के स्कुल अपने शैक्षणिक वर्ष की शुरूआत 1 अप्रेल से करते हैं। स्कूल का पहला दिन अक्सर खूबसूरत प्राकृतिक घटनाओं के साथ शुरू होता है जैसे खिले हुए चेरी के पेड़ के साथ। शैक्षणिक वर्ष तीन भागों में विभाजित होता हैः 1 अप्रेल से 20 जुलाई तक, 1 सितम्बर से 26 दिसम्बर तक, 7 जनवरी से 25 मार्च तक। जापानी छात्रों को गर्मियों के दौरान 6 सप्ताह की छुट्टियां मिलती है। सर्दी और वसंत के मौसम में उन्हें 2 सप्ताह का आराम भी मिलता है।

3. अधिंकाश जापानी स्कूल कोई भी सफाई कर्मचारी को नियुक्त नहीं करते बल्कि छात्र ही स्कूल की सफाई करते हैं।

अन्य स्कुली छात्रों से अलग जापानी स्कुल के छात्रों को अपनी कक्षाओं, कॉफ़ी हाउस तथा शौचालयों को खुद ही साफ करना पड़ता है। सफाई करने के लिए छात्रों को छोटे-छोटे समूहों में बांट दिया जाता है ताकि वे पूरे साल अपने कार्य को सही ढ़ंग से कर सकें। जापानी शिक्षा प्रणाली का मानना है कि छात्रों द्वारा समूंह में कार्य करने से उनमें एक दूसरे की मदद करने की भावना का विकास होता है। मतलब वे एक टीम की तरह काम करना सीखते हैं। बच्चे अपने खुद का काम करने के अलावा. झाडू व पोंछा मारते वक्त एक दुसरे के काम की सराहना भी करते हैं।

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4. जापानी स्कुलो में सभी छात्रों को एक जैसा भोजन दिया जाता है जिसे वे अपनी कक्षा में एक साथ बैठकर खाते हैं

जापानी शिक्षा प्रणाली यह पूणर्तया सुनिश्चित करती है कि सभी छात्रों को स्वस्थ व संतुलित भोजन मिले। लगभग सभी जापानी स्कुलों के लिए दोपहर का खाना एक मेनू के अनुसार पकाया जाता है जिसे न केवल एक अच्छे शेफ द्वारा बनाया जाता है बल्कि स्वास्थ्य की देखभाल करने वाले पेशेवरों द्वारा भी खाने का निरिक्षण किया जाता है। सभी सहपाठी अपनी कक्षा में शिक्षक के साथ मिलकर भोजन करते हैं। यह छात्र व शिक्षक के बीच में एक अच्छा सम्बन्ध बनाने में मदद करता है।

5. जापान में स्कूल के बाद की कार्यशालाएँ बहुत लोकप्रिय है

अधिकांश जापानी छात्र एक अच्छे जुनियर हाई स्कूल में प्रवेश पाने के लिए एक प्रारंभिक स्कूल या निजी स्कूल की कार्यशालाओं में भाग लेते हैं। इन स्कुलों में कक्षायें सामान्यतः शाम के समय आयोजित की जाती है। जापान में शाम के समय छोटे बच्चों को अतिरिक्त पाठयक्रम गतिविधियों (एकस्ट्रा करिकुलर एक्टिविटी) से वापस लौटते देखना आम बात है। जापान में छात्रों के स्कूल 8 घंटे लगते है। इसके अलावा छुट्टियों या साप्ताहांत के समय भी जापानी छात्र अध्ययन करते हैं। यह कोई आश्चर्य की बात नहीं है कि इस देश में छात्र प्राथमिक, निम्न माध्यमिक या माध्यमिक विद्यालय में कभी भी अपनी श्रेणियों (ग्रेडस) को दोहराते नहीं है।

6. पारंपरिक विषयों के अलावा, जापानी छात्र ‘जापानी सुलेख लेखन (केलिग्राफी)’ और ‘जापानी कविताएं’ भी सीखतें हैं।

जापानी सुलेख जिसे ‘शोडो’ भी कहा जाता है इसमें एक बांस के ब्रश को स्याही में डुबोया जाता है तथा इसका उपयोग चावल से बने कागज पर चित्रलिपि लिखने में इस्तेमाल किया जाता है। जापानी लोगों के लिए, शोडो एक ऐसी कला है जो पारंपरिक चित्रकला से कम लोकप्रिय नहीं है। दूसरी ओर ‘हाइकु’ कविता का एक रूप है जो पाठको को गहरी भावनाओं को व्यक्त करने के लिए सरल अभिव्यक्तियों का उपयोग करता है। कक्षायें बच्चों को अपनी संस्कृति और सदियों पूरानी परंपराओं का सम्मान करना सिखाती है।

7. सभी छात्रों को स्कूल की वर्दी पहननी पड़ती है

लगभग सभी जापानी हाई स्कूल अपने छात्रों को एक वर्दी पहनने के लिए पाबंद जरूर करते हैं। जबकि कुछ जापानी स्कूलों की अपनी विशेष पोशाक होती है। पारंपरिक जापानी स्कूलों में लड़कों के लिए एक सैन्य शैली की और लड़कियों के लिए नाविक शैली की पोशाक होती है। उनका उदेश्य है कि छात्रों के बीच सामाजिक बाधाओं को दूर किया जाए और उन्हें काम करने के मूड में लाया जाए। इसके अलावा स्कुली पोशाक पहनने से बच्चों में समाज की भावना का विकास होता है।

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8. जापानी स्कूलों में छात्रों की उपस्थिति दर लगभग 99 प्रतिशत होती है

शायद हम सभी लोग अपने स्कूली जीवन में कम से कम दो चार बार तो अनुपस्थित जरूर हुए हैं। लेकिन जापानी छात्र कभी कक्षांए छोड़ते नहीं है और स्कूल में भी कभी देरी से नहीं आते है। इसके अलावा जापान में लगभग 91 प्रतिशत विद्यार्थियों ने बताया है कि उन्होंने कभी नहीं या केवल कुछ कक्षाओं में शिक्षक ने जो पढ़ाया है उसे नजरअंदाज किया है। किसी भी अन्य देश में स्चूली शिक्षा में ऐसे शानदार आंकड़े देखने को नहीं मिले हैं।

9. एक एकल परीक्षा छात्रों का भविष्य तय करती है

हाई स्कूल के अन्त में जापानी छात्रों को बहुत ही महत्वपूर्ण परीक्षा देनी होती है, जो उनका भविष्य तय करती है। एक विद्यार्थी एक कॉलेज चुन सकता है लेकिन उस कॉलेज में जाने के लिए उसे एक निश्चित स्कोर की जरूरत पड़ती है। यदि कोई विद्यार्थी इस निश्चित स्कोर तक नहीं पहुंच पाता तो फिर उसे उसके द्वारा चुना गया कॉलेज नही मिल पाता है। जापान में कम्पटीशन बहुत अधिक होने के कारण केवल 76 प्रतिशत स्कूल से पास विद्यार्थी ही अपनी आगे की शिक्षा जारी रख पाते हैं। यह कोई आश्चर्य कि बात नहीं है कि उच्च शिक्षण संस्थानों में प्रवेश परिक्षा की तैयारी के लिए बेहद कम समय मिलता है जिसे ‘परीक्षा नरक’ के नाम से जाना जाता है।

10. कॉलेज के साल किसी व्यक्ति के जीवन की सर्वश्रेष्ठ छुट्टियां होतें है।

‘परीक्षा नरक’ से गुजरने के बाद जापानी छात्र अक्सर थोड़े समय का आनन्द लेते हैं। इस देश में कॉलेज जीवन को किसी भी व्यक्ति के जीवन का सबसे आनन्दमय समय माना जाता है। कभी कभी जापानी लोग इस समय को काम से पहले आनी वाली छुट्टियां भी कहते हैं।

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